पुस्तक का शीषर्क नारी- सांदयर् की अनंत आभा स् त्र ी- सांदयर् पर 20 सुंदर, दीघर्, वणर्नात्मक एवं मौिलक किवताएँ लेखक: Rupesh Ranjan प ा क् कथन नारी - सौंदय की अनंत आभा क े वल सौंदय का वण न करने वाली किवताओं का संग ह नही ं है , बि क यह उस िदव् य प काश का काव् यात् मक उत् सव है जो एक स् त्र ी क े रू प , व् यिक् तत् व , संवेदनशीलता , करु णा , आत् मबल और प ेम में समान रू प से िवद्य मान होता है। इस पुस् तक की प त् येक किवता इस िवश् वास से जन् मी है िक वास् तिवक सौंदय क े वल चेहरे की चमक में नही ं , बि क िवचारों की पिवत्र ता , हृ दय की िवशालता , मुस् कान की आत् मीयता , आँखों की गहराई और आत् मा की िनम लता में भी बसता है। सािहत् य ने सिदयों से नारी को अनेक रू पों में देखा है — ममता , प ेम , शिक् त , करु णा , प ेरणा और सृजन क े रू प में। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह पुस् तक नारी क े बाह्य और आंतिरक सौंदय क े िविवध आयामों को किवता की भाषा में िचित्र त करने का िवनम प यास है। यहाँ प क ृ ित क े रंग , चाँदनी की शीतलता , फ ू लों की कोमलता , वष की ताजगी , निदयों की िनरंतरता और आकाश की िवशालता को स् त्र ी की गिरमा और सौंदय से जोड़ा गया है। इस संग ह की बीसों किवताएँ स् वतंत्र , मौिलक और भावनात् मक रू प से समृद्ध हैं। प त् येक किवता एक अलग अनुभूित प स् तुत करती है। कही ं मुस् कान जीवन का उत् सव बन जाती है , कही ं आँखें अनंत सपनों का आकाश बन जाती हैं , कही ं सादगी सबसे बड़ा आभूषण बनकर उभरती है , तो कही ं प ेम और करु णा सौंदय को आध् याित् मक ऊ ँ चाई प दान करते हैं। इन किवताओं का उ ेश् य क े वल प शंसा करना नही ं , बि क नारी क े सम् मान , उसकी गिरमा और उसक े मानवीय अिस् तत् व का आदर करना है। इस पुस् तक में प युक् त भाषा सरल , प वाहपूण और िचत्र ात् मक है तािक प त् येक पाठक किवता क े भावों को सहजता से अनुभव कर सक े । प त् येक रचना में प क ृ ित , प ेम , सौंदय और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा समन् वय िकया गया है जो पाठक क े मन में सौंदय की एक व् यापक और संतुिलत पिरभाषा स् थािपत करता है। यह संग ह उन सभी पाठकों को समिप त है जो मानते हैं िक सौंदय क े वल देखने की वस् तु नही ं , बि क अनुभव करने की अनुभूित है ; क े वल रू प का आकष ण नही ं , बि क व् यिक् तत् व का प काश है ; क े वल क्ष िणक चमक नही ं , बि क आत् मा की अनंत आभा है। यिद इन किवताओं को पढ़ते समय पाठक क े मन में नारी क े प ित सम् मान , स् नेह , संवेदना और सौंदय क े प ित एक अिधक व् यापक दृि टकोण िवकिसत होता है , तो इस पुस् तक का उ ेश् य सफल माना जाएगा। मैं अपने सभी पाठकों क े प ित हृ दय से आभार व् यक् त करता हूँ , िजनका प ेम और िवश् वास मेरी लेखनी को िनरंतर प ेिरत करता है। आशा है िक यह काव् य - संग ह आपक े हृ दय को स् पश करेगा और आपको सौंदय क े उस रू प से पिरिचत कराएगा जो समय , आयु और पिरिस् थितयों से परे सदैव उज् ज् वल रहता है। — Rupesh Ranjan लेखक क े बारे में रु पेश रंजन एक स् वतंत्र लेखक , किव और सामािजक िवषयों पर गंभीर िचंतन करने वाले रचनाकार हैं। उनकी लेखनी सािहत् य , समाज , संिवधान , लोकतंत्र , मानवीय मूल् यों , प ेम , प क ृ ित और जीवन - दश न जैसे िविवध िवषयों को समान संवेदनशीलता और गहराई से अिभव् यक् त करती है। वे मानते हैं िक सािहत् य क े वल मनोरंजन का माध् यम नही ं , बिल् क िवचार , संवेदना और सामािजक चेतना का सशक् त साधन भी है। उनकी रचनाओं की प मुख िवशेषता मौिलकता , सरल एवं प भावशाली भाषा , भावनात् मक गहराई और मानवीय दृिष् टकोण है। किवता हो या गद्य , वे शब् दों क े माध् यम से मनुष् य क े भीतर िछपी करु णा , प ेम , सम् मान और आशा को स् वर देने का प यास करते हैं। उनकी लेखनी में प क ृ ित की सुंदरता , मानवीय िरश् तों की गिरमा और जीवन क े सकारात् मक मूल् यों का सुंदर समन् वय देखने को िमलता है। " नारी - सौंदय की अनंत आभा " उनक े काव् य - सृजन की एक ऐसी क ृ ित है िजसमें स् त्र ी क े सौंदय को क े वल बाहरी रू प तक सीिमत न रखकर उसकी संवेदनशीलता , आत् मबल , करु णा , सादगी , गिरमा और व् यिक् तत् व की उज् ज् वल आभा क े साथ प स् तुत िकया गया है। इस संग ह की प त् येक किवता नारी क े सम् मान और उसक े बहुआयामी व् यिक् तत् व को समिप त है। रु पेश रंजन का उ ेश् य ऐसी सािहित् यक रचनाएँ प स् तुत करना है जो पाठकों क े हृ दय को स् पश करें , सकारात् मक सोच को प ोत् सािहत करें और मानवता , प ेम , समानता तथा सम् मान जैसे साव भौिमक मूल् यों को सुदृढ़ करें। वे मानते हैं िक सच् चा सािहत् य वही है जो समय की सीमाओं से परे जाकर पाठकों क े मन में संवेदना , प ेरणा और आत् मिचंतन का दीप प ज् विलत करे। वे िनरंतर मौिलक , िवचारो ेजक और पाठक - क े ं िद त सािहत् य क े सृजन में सि य हैं तथा िविभन्न िवषयों पर किवता , शोधपरक पुस् तक े ं , सामािजक िवमश और प ेरणादायक लेखन क े माध् यम से सािहत् य - जगत में अपना योगदान दे रहे हैं। लेखक : Rupesh Ranjan ईमेल : rupesh30091988@gmail.com पु स् तक क े बारे में " नारी - सौंदय की अनंत आभा " स् त्र ी - सौंदय क े िविवध आयामों का एक मौिलक , भावपूण और काव् यात् मक उत् सव है। यह पुस् तक बीस दीघ , वण नात् मक और संवेदनशील किवताओं का संग ह है , िजनमें नारी क े बाह्य आकष ण क े साथ - साथ उसक े व् यिक् तत् व , िवचारों , करु णा , गिरमा , आत् मबल , प ेम और आित् मक प काश का भी सुंदर िचत्र ण िकया गया है। इस काव् य - संग ह की प त् येक किवता स् त्र ी को सम् मान , संवेदना और मानवीय गिरमा क े साथ देखने का प यास करती है। कही ं उसकी मुस् कान जीवन में आशा का प काश बनकर उभरती है , कही ं उसकी आँखों में अनिगनत सपनों का संसार िदखाई देता है , तो कही ं उसकी सादगी , करु णा और आत् मा का उजास उसे प क ृ ित की अनुपम रचना क े रू प में प ितिष् ठत करता है। पुस् तक का उ ेश् य क े वल रू प - सौंदय का वण न करना नही ं , बिल् क उस आंतिरक सौंदय का उत् सव मनाना है जो मनुष् य क े चिरत्र , व् यवहार और प ेमपूण व् यिक् तत् व में प कट होता है। इन किवताओं में प क ृ ित क े अनेक िबंब — चाँद , तारे , फ ू ल , वष , निदयाँ , पव त , समंदर , भोर , संध् या और ऋतुओं क े पिरवत न — स् त्र ी - सौंदय क े रू पकों क े रू प में प युक् त हुए हैं। सरल , प वाहपूण और िचत्र ात् मक भाषा पाठक को प त् येक किवता क े भावलोक में सहजता से प वेश कराती है और सौंदय की एक व् यापक , संतुिलत तथा मानवीय दृिष् ट प दान करती है। यह पुस् तक उन पाठकों क े िलए है जो किवता से प ेम करते हैं , सौंदय को क े वल रू प में नही ं बिल् क संवेदना , सम् मान और आित् मक उजास में भी देखना चाहते हैं। यह प ेम , प शंसा , आदर और मानवीय मूल् यों का ऐसा काव् य - संग ह है जो पाठकों को सौंदय की एक अिधक गहरी और अथ पूण अनुभूित से पिरिचत कराता है। " नारी - सौंदय की अनंत आभा " क े वल किवताओं का संग ह नही ं , बिल् क नारी क े सम् मान , उसकी गिरमा , उसकी कोमलता , उसकी शिक् त और उसक े अनंत सौंदय को समिप त एक िवनम सािहित् यक श्र ांजिल है। आशा है िक इस पुस् तक की प त् येक किवता पाठकों क े हृ दय में सौंदय , प ेम , सम् मान और संवेदनशीलता की नई रोशनी जगाएगी तथा उन् हें यह अनुभव कराएगी िक वास् तिवक सौंदय समय क े साथ नही ं िमटता , बिल् क अच् छे िवचारों , उदार हृ दय और उज् ज् वल आत् मा क े साथ और भी अिधक िनखरता जाता है। पु स् तक का शीष क नारी - सौंदय की अनंत आभा स् ी - सौंदय पर 20 सुंदर , दीघ , वण ना त् मक एवं मौिलक किवताएँ अनु क्र मिणका (Index) 1. तु म् हारी मु स् कान में िखलता हुआ संसार 2. चाँद से भी उजली तु म् हारी आभा 3. तु म् हारी आँखों का अथाह समंदर 4. तु म् हारे चेहरे की शांत चाँदनी 5. क े शों की घटाओं में खोया हुआ सावन 6. तु म् हारे होंठों पर ठहरी हुई मधुरता 7. तु म् हारी हँसी का जादुई संगीत 8. प े म की प ितमा : तु म् हारा अनुपम रू प 9. तु म् हारी चाल में बहती हुई किवता 10. सौंदय और संवेदना की जीिवत मूित 11. तु म् हारे स् पश की कोमल रोशनी 12. तु म् हारे व् यि त त् व का उ ज् ज् वल आकष ण 13. नारी : प क ृ ित की सबसे सुंदर रचना 14. तु म् हारी सादगी का अनुपम वैभव 15. रू प , क रु णा और आ त् मा का अद्भुत संगम 16. तु म् हारी आँखों में बसते अनिगनत सपने 17. तु म् हारी उपि स् थित से महकती हुई दुिनया 18. तु म् हारे प े म से उजला हर मौसम 19. तु म् हारी आ त् मा का िद व् य सौंदय 20. तुम : सृि ट की सबसे सुंदर किवता लेखक : Rupesh Ranjan 1. तु म् हारी मु स् कान में िखलता हुआ संसार जब भी तुम् हारे अधरों पर मुस् कान का पहला फ ू ल िखलता है , लगता है जैसे भोर ने सूरज को नया िनमंत्र ण िदया हो। हवा में एक अनकहा संगीत घुल जाता है , और हर िदशा उजाले की भाषा बोलने लगती है। तुम् हारी मुस् कान क े वल चेहरे की एक सुंदर रेखा नही ं , वह जीवन का वह मधुर संदेश है जो थक े हुए मन को िफर से सपने देखने की शि त देता है। जब तुम मुस् कुराती हो , तो लगता है जैसे ओस की हर बूँद में इंद धनुष उतर आया हो। फ ू ल अपनी पंखुिड़याँ कुछ और खोल देते हैं , निदयाँ और मधुर स् वर में बहती हैं , और आकाश भी अपने नीले िवस् तार पर सुनहरी रोशनी की चादर िबछा देता है। तुम् हारी मुस् कान में कोई बनावट नही ं , कोई अहंकार नही ं , क े वल आत् मीयता की वह िनम ल धारा है जो हर िमलने वाले क े हृ दय को सहज ही अपना बना लेती है। वह मुस् कान िकसी दीपक की लौ की तरह है , जो स् वयं जलकर भी चारों ओर प काश बाँटती रहती है। वह िकसी वसंत की पहली बयार है , जो सूखी डािलयों पर भी नई हिरयाली का िवश् वास जगा देती है। तुम् हारे चेहरे पर िखली हुई हँसी समय को भी कुछ क्ष णों क े िलए रु क जाने पर िववश कर देती है। मानो िक्ष ितज स् वयं तुम् हारे आनंद का उत् सव मना रहा हो। तुम् हारी मुस् कान में करु णा की कोमल छाया है , ममता की गरमाहट है , िवश् वास की दृढ़ता है , और प ेम की वह शीतलता है जो हर बेचैन मन को सुक ू न का िकनारा दे देती है। तुम मुस् कुराती हो तो लगता है जैसे जीवन अपनी सारी किठनाइयों क े बीच भी कह रहा हो — " आशा अभी जीिवत है , प ेम अभी शेष है , और सुंदरता क े वल रू प में नही ं , हृ दय की िनम लता में भी बसती है। " तुम् हारी मुस् कान मेरे िलए िकसी किवता का सबसे सुंदर छंद है , िकसी िचत्र कार का सबसे उजला रंग है , िकसी संगीतकार की सबसे मधुर धुन है , और िकसी प ाथ ना का सबसे पिवत्र स् वर है। यिद संसार की सारी खुिशयों को एक ही क्ष ण में समेटना हो , तो शायद वह क्ष ण वही होगा जब तुम् हारे होंठों पर िनष् कलुष मुस् कान िखलती है और समूची सृिष् ट उसक े प काश में एक नए उत् सव की तरह दमक उठती है। तुम् हारी मुस् कान सचमुच एक ऐसा संसार है जहाँ प ेम िखलता है , िवश् वास साँस लेता है , संवेदनाएँ महकती हैं , और मनुष् य को अपने भीतर की सबसे सुंदर रोशनी पहचानने का अवसर िमलता है। 2. चाँद से भी उजली तु म् हारी आभा रात क े िनस् तब् ध आकाश में जब पूिण मा का चाँद अपनी शीतल िकरणें धरती पर िबखेरता है , तब भी मन अनायास तुम् हारी स् मृित की ओर चला जाता है। क् योंिक चाँद की उजास क े वल आँखों को भाती है , पर तुम् हारी आभा सीधे हृ दय को प कािशत कर देती है। तुम् हारे चेहरे पर ठहरी हुई वह सहज चमक िकसी आभूषण की देन नही ं , वह तो तुम् हारे िनम ल मन , सौम् य िवचारों और स् नेह से भरे हृ दय का प काश है। उसी प काश में हर िमलन आत् मीय बन जाता है , हर क्ष ण मधुर हो उठता है। कहते हैं चाँद रात का सबसे सुंदर यात्र ी है , पर मैंने देखा है — तुम् हारी उपिस् थित से िदन भी अिधक उजला हो जाता है। तुम् हारे आने भर से घर की दीवारों पर मुस् कानों क े दीप जल उठते हैं , और वातावरण में िवश् वास की सुगंध फ ै ल जाती है। तुम् हारी आभा में न कोई चकाचौंध है , न कोई िदखावा , क े वल एक शांत , गंभीर और पिवत्र उजाला है जो िबना कुछ कहे सबक े मन को छू लेता है। जब तुम मुस् कुराती हो , तो लगता है जैसे भोर की पहली िकरण कमल की पंखुिड़यों पर उतर आई हो। जब तुम मौन रहती हो , तब भी तुम् हारा व् यिक् तत् व एक पूण किवता की तरह अपना अथ स् वयं कह देता है। तुम् हारी आँखों में आकाश की गहराई है , तुम् हारी वाणी में झरने का मधुर संगीत , और तुम् हारे व् यवहार में वह शीतलता है जो तपते हुए मन को भी सुक ू न का स् पश दे देती है। चाँद की रोशनी बादलों में िछप जाती है , िकन् तु तुम् हारी आभा िवपरीत पिरिस् थितयों में भी अपनी गिरमा नही ं खोती। तुम् हारा धैय , तुम् हारी करु णा , तुम् हारा आत् मिवश् वास तुम् हारे सौंदय को और अिधक उज् ज् वल बना देते हैं। तुम् हारी सादगी सोने से अिधक मूल् यवान है , तुम् हारी िवनम ता िकसी मुकुट से अिधक शोभायमान है। तुम् हारा प ेम वह दीप है जो िबना शोर िकए जीवन क े अंधेरों को धीरे - धीरे िमटाता चलता है। प क ृ ित ने फ ू लों को रंग िदए , निदयों को गित दी , पव तों को ऊ ँ चाई दी , और चाँद को शीतलता दी ; पर तुम् हें उसने इन सबका सुंदर संगम बना िदया। इसीिलए तुम् हारी उपिस् थित हर ऋतु को एक नया अथ दे देती है। तुम् हारी आभा में आत् मा की िनम लता है , िवचारों की पिवत्र ता है , प ेम की गहराई है , और जीवन को सुंदर बनाने की एक अद्भुत शिक् त है। यही कारण है िक तुम् हारा सौंदय समय क े साथ कम नही ं होता , बिल् क अनुभव , संवेदना और आत् मिवश् वास क े साथ और भी अिधक िनखरता जाता है। यिद कभी चाँद स् वयं धरती पर उतरकर सौंदय की पिरभाषा पूछे , तो मैं मुस् कुराकर कहूँगा — " आकाश में तुम् हारा स् थान महान है , िकन् तु मनुष् य क े हृ दय में एक ऐसी उज् ज् वल आभा भी रहती है जो तुमसे भी अिधक शीतल , अिधक आत् मीय और अिधक जीवनदायी है। " वह आभा तुम् हारे व् यिक् तत् व की है , तुम् हारी करु णा की है , तुम् हारी मुस् कान की है , तुम् हारी आत् मा की है। और इसिलए जब भी मैं सौंदय का अथ खोजता हूँ , चाँद की ओर नही ं , तुम् हारी ओर देखता हूँ — क् योंिक तुम् हारी आभा िसफ ़ आँखों को नही ं , जीवन को भी प कािशत कर देती है। 3. तु म् हारी आँखों का अथाह समंदर तुम् हारी आँखों में मैंने क े वल दो नयन नही ं देखे , मैंने देखा है एक ऐसा अथाह समंदर िजसकी गहराइयों का अनुमान शब् द कभी नही ं लगा सकते। जब पहली बार तुम् हारी आँखों से मेरी नज ़ र िमली , समय कुछ पल क े िलए मानो ठहर - सा गया। चारों ओर का कोलाहल धीरे - धीरे मौन में बदल गया , और उस मौन में क े वल तुम् हारी आँखों की भाषा बोल रही थी। वे आँखें िकसी िनम ल झील की तरह शांत भी हैं , और िकसी अनंत सागर की तरह असीम भी। उनमें धैय की गहराई है , प ेम की मधुर लहरें हैं , करु णा की नमी है , और िवश् वास का अटूट िवस् तार है। तुम् हारी आँखों में भोर की पहली िकरण भी बसती है , साँझ की कोमल शांित भी। कभी वे हँसते हुए फ ू लों जैसी लगती हैं , तो कभी िकसी ऋिष क े ध् यान - सी गंभीर और िनस् संग। जब तुम मुस् कुराती हो , तब तुम् हारी आँखों में हज ़ ारों दीप जल उठते हैं। उन दीपों की रोशनी चेहरे तक सीिमत नही ं रहती , वह सामने वाले क े मन में भी उजाला भर देती है। तुम् हारी पलकों की छाँव में मानो अनेक ऋतुएँ िव ाम करती हैं। वसंत का उल् लास , सावन की ताजगी , शरद की िनम लता , और हेमंत की शांत गिरमा — सब एक साथ तुम् हारी दृिष् ट में समाए हुए प तीत होते हैं। कभी - कभी तुम् हारी आँखें कुछ कहे िबना ही पूरी कहानी सुना देती हैं। उनमें शब् दों की आवश् यकता नही ं होती , क् योंिक भावनाएँ स् वयं अपनी भाषा चुन लेती हैं। जब करु णा उमड़ती है , तो वे िकसी िनम ल नदी की तरह धीरे - धीरे बहती हैं। जब आत् मिवश् वास जागता है , तो वे पव त - िशखरों की तरह अिडग िदखाई देती हैं। और जब प ेम झलकता है , तो लगता है जैसे पूरा आकाश तारों से भर गया हो। तुम् हारी आँखों का रंग चाहे जैसा भी हो , उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनकी सच् चाई है। वहाँ छल नही ं , दंभ नही ं , क े वल िनम ल भावनाओं का स् वच् छ आकाश है। मैंने अक् सर सोचा है , यिद समंदर बोल सकता , तो शायद उसकी आवाज ़ भी तुम् हारी आँखों िजतनी गहरी और शांत होती। यिद आकाश मुस् कुरा सकता , तो उसकी मुस् कान भी तुम् हारी दृिष् ट जैसी अनंत होती। तुम् हारी आँखों में सपनों की उड़ान है , आशाओं का सूय दय है , जीवन की िजजीिवषा है , और भिवष् य का उज् ज् वल िवश् वास है। वे क े वल देखती नही ं , वे प ेिरत भी करती हैं — बेहतर बनने क े िलए , प ेम करने क े िलए , और जीवन को और अिधक सुंदर बनाने क े िलए। जब कभी मन थक जाता है , मैं कल् पना करता हूँ तुम् हारी उन् ही ं शांत आँखों की , जहाँ हर बेचैनी धीरे - धीरे िवलीन हो जाती है। उनकी गहराई में एक अद्भुत सुक ू न है , मानो समंदर की लहरें हृ दय की सारी थकान अपने साथ बहा ले जाती हों। यिद िकसी िदन मुझसे पूछा जाए िक दुिनया का सबसे सुंदर दृश् य क् या है , तो मैं िकसी पव त , िकसी झरने , या िकसी चाँदनी रात का नाम नही ं लूँगा। मैं कहूँगा — सबसे सुंदर दृश् य है तुम् हारी आँखों में प ेम , करु णा और िवश् वास का एक साथ चमक उठना। क् योंिक तुम् हारी आँखें िसफ ़ चेहरा नही ं सजाती ं , वे आत् मा का दप ण हैं। उनमें समाया हुआ अथाह समंदर हर उस व् यिक् त को अपनी ओर खी ंच लेता है जो सच् चे सौंदय की तलाश में हो। और सच तो यह है — उस समंदर का कोई िकनारा नही ं , कोई अंत नही ं। िजतना उसे देखो , उतनी ही नई गहराइयाँ िमलती हैं ; िजतना उसे समझो , उतना ही नया प काश िमलता है। तुम् हारी आँखों का यह अथाह समंदर जीवन की सबसे सुंदर पहेली भी है , सबसे मधुर किवता भी , और ईश् वर की उन दुल भ रचनाओं में से एक है जो हर बार देखने पर पहले से अिधक सुंदर प तीत होती है।