काव्य संग्रह शीषर्क "जागो मेरे देश" उपशीषर्क: राष्ट ्र की पीड़ा, जनचेतना और नवजागरण का काव्य- संग्रह लेखक रू पेश रंजन mailto:rupesh30091988@gmail.com भूिमका " जागो मेरे देश " क े वल किवताओं का संग ह नही ं है , बिल् क एक बेचैन आत् मा की पुकार , एक जागरू क नागिरक की िचंता और एक संवेदनशील हृ दय का रा क े प ित समिप त संवाद है। यह क ृ ित िकसी व् यिक् त , दल , िवचारधारा या वग क े िवरु द्ध नही ं , बिल् क उन पिरिस् थितयों क े िवरु द्ध है जो हमारे समाज , हमारी संस् क ृ ित , हमारे लोकतंत्र और हमारे मानवीय मूल् यों को धीरे - धीरे कमजोर करती जा रही हैं। भारत िवश् व की सबसे प ाचीन सभ् यताओं में से एक है। यह वह भूिम है जहाँ सत् य , अिहंसा , करु णा , त् याग , ान और सह - अिस् तत् व की परंपराएँ जन् मी हैं। इसी धरती ने बुद्ध , महावीर , कबीर , ग ुरु नानक , स् वामी िववेकानंद , महात् मा गांधी , डॉ भीमराव आंबेडकर और अनेक महान िवभूितयों को जन् म िदया , िजन् होंने मानवता को िदशा देने का काय िकया। िक ं तु समय क े साथ अनेक ऐसी चुनौितयाँ भी सामने आईं िजन् होंने रा की आत् मा को झकझोर िदया। गरीबी , बेरोज ़ गारी , भ ष् टाचार , सामािजक असमानता , पय वरण संकट , िशक्ष ा और स् वास् थ् य की िवषमताएँ , नैितक मूल् यों का क्ष रण , जातीय और सांप दाियक िवभाजन , तथा नागिरक उत्त रदाियत् व में कमी जैसे अनेक प श् न आज हमारे सामने खड़े हैं। इन किवताओं का उ ेश् य क े वल समस् याओं का वण न करना नही ं है। यिद सािहत् य क े वल पीड़ा का िचत्र ण करे और आशा का दीप न जलाए , तो उसका उ ेश् य अधूरा रह जाता है। इसिलए इस संग ह की प त् येक किवता पाठक को आत् ममंथन , सामािजक उत्त रदाियत् व और सकारात् मक पिरवत न की िदशा में प ेिरत करने का प यास करती है। यहाँ िनराशा क े साथ आशा भी है , आलोचना क े साथ आत् मालोचना भी है , और प श् नों क े साथ समाधान की खोज भी है। इस संग ह में विण त भाव िकसी िवशेष घटना या व् यिक् त तक सीिमत नही ं हैं। ये उन अनुभवों , संवेदनाओं और िचंताओं का काव् यात् मक रू प हैं जो एक सजग नागिरक अपने आसपास क े पिरवेश को देखकर अनुभव करता है। प त् येक किवता का उ ेश् य समाज में जागरू कता , संवेदनशीलता , कत व् यबोध और रा प ेम की भावना को सुदृढ़ करना है। रा क े वल सीमाओं से नही ं बनता ; रा अपने नागिरकों क े चिरत्र , उनक े श्र म , उनकी ईमानदारी , उनकी करु णा और उनक े साझा सपनों से िनिम त होता है। जब नागिरक जागते हैं , तब रा प गित करता है। जब नागिरक अपने अिधकारों क े साथ अपने कत व् यों को भी समझते हैं , तभी लोकतंत्र सशक् त होता है। यही िवश् वास इस काव् य - संग ह की आत् मा है। मैं आशा करता हूँ िक " जागो मेरे देश " क े वल पढ़ा नही ं जाएगा , बिल् क महसूस िकया जाएगा ; क े वल सराहा नही ं जाएगा , बिल् क उस पर िवचार भी िकया जाएगा। यिद इन किवताओं का कोई एक शब् द भी िकसी पाठक क े मन में देश , समाज और मानवता क े प ित उत्त रदाियत् व का भाव जगा सक े , तो इस रचना का उ ेश् य सफल माना जाएगा। आइए , हम िशकायतों से आगे बढ़कर समाधान का िहस् सा बनें। आइए , हम अपने भीतर क े नागिरक को जगाएँ। आइए , हम िमलकर ऐसा भारत बनाएँ जहाँ न् याय क े वल पुस् तकों में नही ं , जीवन में िदखाई दे ; जहाँ िवकास क े वल आँकड़ों में नही ं , प त् येक नागिरक क े चेहरे पर मुस् कान बनकर झलक े ; और जहाँ आने वाली पीिढ़याँ गव से कह सक े ं — यह वही भारत है िजसका सपना हमारे पूव जों ने देखा था। इसी िवश् वास , इसी आशा और इसी संकल् प क े साथ यह काव् य - संग ह आपक े हाथों में समिप त है। — रू पेश रंजन लेखक पिरचय रू पेश रंजन एक स् वतंत्र शोधकत , िचंतक , किव और लेखक हैं , िजनकी लेखनी सामािजक चेतना , रा प ेम , मानवीय संवेदनाओं और सकारात् मक पिरवत न क े िवचारों से प ेिरत है। वे सािहत् य को क े वल अिभव् यिक् त का माध् यम नही ं , बिल् क समाज क े आत् ममंथन , जागरण और जनचेतना का सशक् त साधन मानते हैं। उनकी रचनाओं में जीवन क े िविवध आयाम — प ेम , पीड़ा , संघष , आशा , नैितकता , लोकतंत्र , संिवधान , सामािजक न् याय , पय वरण , िशक्ष ा , ग ामीण भारत और मानवीय मूल् यों — का गंभीर एवं संवेदनशील िचत्र ण िमलता है। उनकी किवता का उ ेश् य क े वल भावनाओं को व् यक् त करना नही ं , बिल् क पाठकों को सोचने , प श् न करने और समाज क े प ित अपने उत्त रदाियत् व को समझने क े िलए प ेिरत करना है। " जागो मेरे देश " उनकी इसी सािहित् यक दृि ट का पिरणाम है। इस काव् य - संग ह में रा क े समक्ष उपिस् थत िविभन्न सामािजक , आिथ क और नैितक चुनौितयों को काव् यात् मक रू प में प स् तुत िकया गया है। यह क ृ ित िकसी व् यिक् त , दल या िवचारधारा पर क े ं िद त नही ं , बिल् क रा िहत , जनकल् याण और मानवीय मूल् यों क े प ित समिप त एक रचनात् मक संवाद है। रू पेश रंजन का िवश् वास है िक एक सशक् त रा का िनम ण क े वल सरकारों से नही ं , बिल् क जागरू क , संवेदनशील , ईमानदार और उत्त रदायी नागिरकों से होता है। उनकी लेखनी इसी िवश् वास को शब् द देती है और पाठकों को आत् मिचंतन क े साथ - साथ सकारात् मक पिरवत न की िदशा में आगे बढ़ने का संदेश देती है। वे मानते हैं िक सािहत् य का सव च् च उ ेश् य समाज में आशा , संवेदना और नैितक चेतना का संचार करना है। इसी िवचार क े साथ वे िनरंतर लेखन और अध् ययन क े माध् यम से रा , समाज और मानवता क े पक्ष में अपनी रचनात् मक यात्र ा जारी रखे हुए हैं। — रू पेश रंजन पु स् तक पिरचय " जागो मेरे देश " रा की पीड़ा , जनचेतना और नवजागरण को समिप त एक गंभीर , िवचारोत्त े जक और भावनात् मक काव् य - संग ह है। यह पुस् तक उन प श् नों को स् वर देती है जो आज प त् येक संवेदनशील नागिरक क े मन में उठते हैं। इसमें देश क े सामािजक , आिथ क , नैितक और मानवीय पक्ष ों को गहन संवेदनशीलता क े साथ काव् यात् मक रू प में प स् तुत िकया गया है। इस संग ह की तीस किवताएँ हमारे समय की अनेक महत् वपूण चुनौितयों — गरीबी , भूख , बेरोज ़ गारी , िकसानों की किठनाइयाँ , भ ष् टाचार , िशक्ष ा और स् वास् थ् य की समस् याएँ , पय वरण संकट , सामािजक िवभाजन , लोकतांित्र क मूल् यों , संिवधान क े आदश ं , स् त्र ी - सुरक्ष ा , युवाओं की िदशा , सैिनकों क े त् याग और रा ीय उत्त रदाियत् व — पर गंभीर िचंतन प स् तुत करती हैं। प त् येक किवता क े वल समस् या का िचत्र ण नही ं करती , बिल् क पाठक को आत् ममंथन , संवेदनशीलता और रचनात् मक पिरवत न की ओर प ेिरत करती है। यह पुस् तक िकसी व् यिक् त , संस् था , समुदाय , धम , राजनीितक दल या िवचारधारा क े पक्ष या िवरोध में नही ं िलखी गई है। इसका उ ेश् य लोकतांित्र क मूल् यों , संवैधािनक आदश ं , सामािजक समरसता , मानवीय गिरमा और रा िहत क े प ित जागरू कता उत् पन्न करना है। पुस् तक पाठकों को यह संदेश देती है िक एक सशक् त रा का िनम ण क े वल नीितयों से नही ं , बिल् क जागरू क , ईमानदार , संवेदनशील और उत्त रदायी नागिरकों से होता है। " जागो मेरे देश " उन सभी पाठकों क े िलए है जो किवता को क े वल शब् दों का सौंदय नही ं , बिल् क समाज का दप ण , िवचार का माध् यम और पिरवत न की प ेरणा मानते हैं। यह क ृ ित रा प ेम को भावनात् मक आवेग से आगे बढ़ाकर कत व् य , संवेदना , आत् मिचंतन और सामूिहक उत्त रदाियत् व से जोड़ने का प यास करती है। यिद इस पुस् तक की कोई किवता िकसी एक पाठक क े मन में भी अपने देश , समाज और मानवता क े प ित अिधक संवेदनशील , सजग और उत्त रदायी बनने की प ेरणा जगा सक े , तो यही इस काव् य - संग ह की सबसे बड़ी उपलिब् ध होगी। " जागो मेरे देश " क े वल पढ़ने क े िलए नही ं , बिल् क महसूस करने , िवचार करने और एक बेहतर भारत क े िनम ण क े संकल् प क े साथ आगे बढ़ने क े िलए िलखी गई पुस् तक है। का व् य संग ह शीष क " जागो मेरे देश " उपशीष क : रा की पीड ़ ा , जनचेतना और नवजागरण का का व् य - संग ह अनु क्र मिणका किवताएँ १ सोया हुआ जनमानस २ टूटते हुए सपनों का भारत ३ भूख की चीख ४ िकसान की मौन पुकार ५ बेरोज ़ गार आँखों का सच ६ भ ष् टाचार का अंधेरा ७ िश ा की बुझती लौ ८ अ स् पतालों की क रु ण कथा ९ राजनीित का बदलता चेहरा १० न् याय की प ती ा ११ िबखरते हुए गाँव १२ शहरों की नक ़ ली चमक १३ निदयों का िवलाप १४ जंगलों की अंितम साँस १५ प दूषण का अिभशाप १६ टूटते हुए पािरवािरक सं स् कार १७ युवाओं का भटकता भिव ष् य १ ८ नशे में डूबती पीढ़ी १ ९ स् त्र ी की असुरि त राह २० सीमा पर खड़ा सैिनक २१ धम नही ं , मानवता पुकारती है २२ जाित की दीवारें २३ मीिडया का आईना २४ लोकतं त्र का मौन प श् न २५ संिवधान की पुकार २६ देश की बेटी का प श् न २७ ईमानदार आदमी की हार २ ८ कब जागेगा मेरा भारत ? २ ९ पिरवत न की पहली िकरण ३० िफर से उठेगा मेरा देश पहली किवता सोया हुआ जनमानस कब तक यूँ ही मौन रहेगा , कब तक अपनी पीड़ा सहेगा ? कब तक आँखें मूँद चलेगा , कब तक सत् य से मुँह फ े रेगा ? धरती पूछे अपने बेटों से , क् या तुमने उसका दद सुना ? निदयों ने जो आँसू बहाए , क् या उनका भी कोई मोल चुना ? हवा में घुलती कराह सुनो , आकाश का भी मौन सुनो। सूख रहे हैं सपनों क े वन , टूट रहा है िवश् वास सुनो। िजस िम ी ने जन् म िदया , िजसने चलना हमें िसखाया , आज वही चुपचाप खड़ी है , उसने िकसको नही ं बुलाया ? सड़कों पर थक े हुए चेहरे , आँखों में अनिगनत प श् न िलए। हाथों में श्र म की रेखाएँ , मन में िकतने िवषाद िलए। कही ं िकसान आकाश िनहारे , कही ं मज ़ दूर पसीना रोए। कही ं युवा अवसर को तरसे , कही ं बुज ़ ु ग स् मृितयाँ ढोए। िव ालयों की घंटी बजती , पर िकतने सपने खो जाते। ान का दीप जलने से पहले , िकतने दीपक सो जाते। अस् पतालों की लंबी कतारें , दद की भाषा बोल रही हैं। जीवन की सबसे बड़ी परी ा , मानवता से पूछ रही हैं। निदयाँ अपने तट से पूछें , क् यों इतना मैला जल बहता ? जंगल अपने वृ ों से पूछें , क् यों हर मौसम डर में रहता ? पव त अब भी अटल खड़े हैं , पर मानव का मन डगमग है। िव ान बढ़ा , साधन बढ़े हैं , िफर भी भीतर गहरा भय है। िरश् तों की गम हट कम है , स् वाथ का मौसम गहरा है। चेहरों पर मुस् कान बहुत है , पर मन भीतर से ठहरा है। हर िदन कोई सपना टूटे , हर िदन कोई आशा रोए। िफर भी जीवन आगे बढ़ता , अपने आँसू चुपचाप ढोए। लोकतंत्र की चौखट पर भी , कुछ प श् न अभी अनुत्त िरत हैं। अिधकारों की बातें होती ं , कत व् य कही ं िवस् मृत हैं। संिवधान का गौरव गाता , हर नागिरक का पावन मान। पर उसकी आत् मा जीिवत हो , यह भी तो है सबकी पहचान। देश िकसी एक नाम से बढ़ता , ऐसा इितहास नही ं कहता। देश बढ़े जब साथ चलें सब , यही समय का सत् य रहता। जागो क े वल नारे देकर , जागो अपने कम ं से। देश बदलता भाषण से कम , बदलता सच् चे धम ं से। यिद कही ं अन् याय िदखे तो , मौन कभी मत अपनाना। पर ोध नही ं , िववेक जगाकर , सत् य का दीप जलाना। यिद कही ं भूखा कोई िदखे , अपनी थाली बाँट सको। यिद कोई िनराश िदखाई दे , उसका साहस बन सको। यिद कोई बच् चा पढ़ न पाए , ान का तुम ार बनो। यिद कोई पथ भूल रहा हो , उसक े िलए िवचार बनो। देश क े वल सीमा नही ं है , देश करोड़ों धड़कन है। हर नागिरक का सच् चा चिरत्र , भारत की ही पहचान है। मंिदर , मिस् जद , िगरजाघर हों , या ग ुरु ारे का सम् मान। सबसे ऊपर मानवता हो , यही रहे भारत की शान। जाित , भाषा , वेश अलग हों , िफर भी एक िवचार रहे। िविवध रंग इस भूिम क े हों , पर ितरंगे का प् यार रहे। जनमानस जब जाग उठेगा , अंधकार स् वयं िमट जाएगा। हर घर में िवश् वास जलेगा , हर पथ िफर से जगमगाएगा। िकसी चमत् कार की प ती ा अब करना व् यथ होगा। बदलाव उसी िदन आएगा , जब नागिरक स् वयं जागेगा। उठो , स् वयं से प श् न करो , मैंने देश क े िलए क् या िकया ? क े वल िशकायत ही िलख डाली , या कुछ बेहतर भी रच िदया ? चलो नया संकल् प करें हम , सत् य , श्र म और प ेम चुनें। अपने भीतर दीप जलाकर , भारत का भिवष् य गढ़ें। सोया हुआ जनमानस जब कत व् य का अथ समझेगा , तब भारत क े वल मानिचत्र नही ं , िवश् व क े िलए प ेरणा बनेगा। २ टूटते हुए सपनों का भारत कभी स् विण म स् वप् नों की धरती , आज प श् नों में डूबी खड़ी है। हर िदशा में आशा की िकरण , मानो धुंध क े पीछे पड़ी है। जहाँ कभी पिरश्र म का सम् मान , जीवन का सबसे बड़ा धन था। आज वही इंसान स् वयं से पूछे , क् या यही मेरे सपनों का वन था ? हर सुबह नई उम् मीदें लेकर , घर से िकतने लोग िनकलते हैं। पर साँझ ढले थक े कदमों में , अधूरे सपने ही पलते हैं। िकसी की आँखों में नौकरी का सपना , िकसी की आँखों में खेत हरे हैं। िकसी ने िश ा को पूजा माना , िकसी क े अपने घर उजड़े हैं। िकतनी प ितभाएँ मौन पड़ी हैं , िकतनी मेहनत अनदेखी है। िकतने हाथों में हुनर िछपा है , पर अवसर की राह अधूरी है। गाँवों की पगडंडी पूछ रही , कब लौटेंगे अपने बच् चे ? शहरों की चकाचौंध िनगल गई , उनक े जीवन क े सच् चे कच् चे। िकसान का बेटा खेत छोड़कर , भीड़ भरे चौराहे आया। रोटी की खोज में उसने अपना , बचपन तक िगरवी रखवाया। माँ ने सपनों का दीप जलाया , िपता ने जीवन भर श्र म िकया। बेटे ने िश ा का पथ चुना , पर भाग् य ने िफर भी प श् न िदया। िडिग यों का बोझ बढ़ता जाए , आशाओं का भार भी भारी। कदम बढ़ें तो राह रु की हो , क ै सी यह जीवन की लाचारी ? निदयाँ बहती ं , पव त अिडग हैं , सूरज हर िदन उग जाता है। िफर क् यों मानव का िवश् वास , हर िदन थोड़ा मर जाता है ? ईंटों से ऊ ँ ची इमारत बनती , पर िरश् ते नीचे िगर जाते हैं। सपनों क े बदले बाज ़ ारों में , चेहरे अक् सर िबक जाते हैं। कोई भूखा सोता फुटपाथों पर , कोई महलों में चैन मनाता। एक ही धरती , एक ही सूरज , िफर भी इतना भेद क् यों आता ? िव ालय ान का मंिदर हैं , पर हर बच् चे तक प काश कहाँ ? प ितभा को यिद पंख न िमलें , तो उड़ पाए िवश् वास कहाँ ? अस् पतालों की भीड़ बताती , जीवन िकतना नाज ़ ु क होता। मानव यिद मानव का बन जाए , तो हर संकट हल् का होता। युवा शिक् त यिद िदशा न पाए , तो समय स् वयं रोने लगता। रा का भिवष् य मौन खड़ा , अपने कल को खोने लगता। स् वाथ यिद शासन करने लगे , तो सेवा का अथ बदल जाता। कत व् य यिद पीछे छूट जाए , तो िवश् वास भी ढल जाता। सच बोलना किठन नही ं है , किठन उसे िनभा पाना है। अंधकार से लड़ना आसान , अपने भीतर दीप जलाना है। भारत क े वल इितहास नही ं , यह भिवष् य की भी आशा है। हर नागिरक की ईमानदारी , रा की सबसे बड़ी भाषा है। यिद श्र म का पूरा मान िमले , यिद िश ा सब तक पहुँचे। यिद न् याय समय पर िमल जाए , तो िकतने जीवन िफर से सँवरे। यिद गाँव समृद्ध बन जाएँ , यिद शहर संवेदनशील बनें। यिद अवसर सबको समान िमलें , तो सपने िफर से जीिवत बनें। िकसी एक हाथ से नही ं होगा , यह पिरवत न सबको लाना है। अपने िहस् से का दीप जलाकर , भारत का कल सजाना है। मत पूछो कौन बदलेगा , पहले स् वयं बदलना सीखो। अपने कम ं से रा गढ़ो , सत् य का दीप िनरंतर दीखो। टूटे हुए सपनों की राख में , अब भी िचंगारी जीिवत है। हर िनराशा क े गहरे तम में , एक नई भोर सुरि त है। जब श्र म को सम् मान िमलेगा , जब मानव मानव को समझेगा। जब अिधकारों संग कत व् य चले , तब भारत िफर मुस् काएगा। तब कोई सपना टूटेगा नही ं , कोई आशा रोएगी नही ं। हर घर में िवश् वास िखलेगा , हर आँख िनराश होगी नही ं। उठो मेरे देश क े जागरू क जन , अपने समय की पुकार सुनो। टूटते सपनों को जोड़ने का , अब अपना भी अिधकार चुनो। भारत क े वल मानिचत्र नही ं , यह करोड़ों सपनों का संसार है। इन सपनों की र ा करना , हम सबका प थम धम और दाियत् व है। ३ भूख की चीख भूख कभी क े वल पेट नही ं होती , वह टूटते हुए िवश् वास की आवाज ़ है। वह सूनी आँखों का मौन प श् न है , वह मानवता का सबसे किठन राज ़ है। जब रोटी की सुगंध हवाओं में तैरती है , पर िकसी घर का चू ा ठंडा रहता है। तब क े वल एक पिरवार नही ं रोता , पूरा समाज भीतर से टूटता रहता है। िकसी माँ की हथेली आज भी , अपने आँचल से आँसू पोंछ रही है। अपने िहस् से की रोटी िछपाकर , बच् चे की मुस् कान खोज रही है। वह कहती है —" मुझे भूख नही ं है ", पर उसक े शब् द काँप जाते हैं। बच् चे की तृप् त आँखों क े पीछे , उसक े अपने सपने सो जाते हैं। िकसी िपता क े श्र म से भीगा वस् त्र , सूरज से पहले जाग जाता है। िदनभर पसीना धरती को देता है , िफर भी घर खाली लौट आता है। उसकी हथेिलयों की दरारों में , क े वल िम ी नही ं बसती है। वहाँ अधूरी इच् छाओं की पीड़ा , धीरे - धीरे साँसें लेती है। फुटपाथ पर सोता हुआ बचपन , आकाश को अपना घर मानता है। िजसे िखलौनों से खेलना था , वह जीवन का बोझ उठाता है। िकसी की आँखों में दूध का सपना , िकसी क े होंठों पर सूखी प् यास। कोई अन्न क े दाने िगनता है , कोई िगनता है अपनी साँस। िकतने खेत लहलहाते होंगे , िकतनी निदयाँ बहती होंगी। िफर भी भूख यिद जीिवत है , तो कही ं संवेदनाएँ सोती होंगी। भूख क े वल रोटी नही ं माँगती , वह सम् मान का अिधकार माँगती है। वह श्र म का उिचत मूल् य चाहती है , वह जीवन से प् यार माँगती है। वह नही ं चाहती दया की दृि ट , न ही उपकार का भारी हाथ। उसे चािहए अवसर का सूरज , और पिरश्र म का सच् चा साथ। िजस बच् चे की आँखों में िव ालय था , वह आज चौराहे पर खड़ा िमला। िकताबों की जगह थैले उठाए , उसका बचपन िबखरा िमला। िकसी वृद्ध की काँपती उँगिलयाँ , अब भी श्र म की राह तलाश रही हैं। उम हार चुकी है शरीर से , पर िववशताएँ साँस ले रही हैं। भूख जब इंसान से टकराती है , तो सपनों की भाषा बदल जाती है। किवताएँ मौन हो जाती हैं , और आँखें बोलने लग जाती हैं। रोटी की कीमत वही समझे , िजसने कई रातें जागकर काटी हों। िजसने अपने बच् चों की खाितर , अपनी इच् छाएँ बाँट दी हों। िकसी मंिदर की घंटी बजे , कही ं मिस् जद से अज ़ ान उठे। यिद पड़ोस का कोई भूखा सोए , तो क ै सी पूजा , क ै सी प ाथ ना उठे ? धम का पहला पाठ यही है , मानव का दुःख अपना मानो। भूखे क े चेहरे पर मुस् कान लाकर , ईश् वर का सच् चा सम् मान जानो। समाज तभी समृद्ध कहलाएगा , जब कोई भूखा सोएगा नही ं। जब श्र म का अपमान न होगा , और कोई आँसू खोएगा नही ं। अन्न क े वल खेतों में नही ं उगता , वह िकसान क े िवश् वास में उगता है। वह मज ़ दूर क े पसीने में िखलता है , वह माँ की ममता में बसता है। िजस िदन हर थाली में सम् मान होगा , हर घर में चू ा जलता होगा। उस िदन भारत की धरती पर , सचमुच िवकास पलता होगा। भूख की चीख सुनाई नही ं देती , िफर भी सबसे तीखी होती है। वह िकसी एक व् यि त की नही ं , पूरे युग की पीड़ा होती है। आओ ऐसा समाज बनाएँ , जहाँ करु णा कभी कम न पड़े। जहाँ श्र म का मूल् य सुरि त हो , जहाँ मानवता का दीप न बुझे। िकसी बच् चे की मुस् कान रोटी से जुड़ी न रहे , वह िश ा और सपनों से पहचाना जाए। िकसी माँ की आँखों में िववशता नही ं , संतोष और सम् मान का उिजयारा आए। जब भूख इितहास बन जाएगी , तब सच् ची आज ़ ादी मुस् काएगी। हर नागिरक का िसर ऊ ँ चा होगा , और भारत की आत् मा ग ुनग ुनाएगी। तब कोई रोटी क े िलए नही ं रोएगा , कोई सम् मान क े िलए नही ं झुक े गा। मानवता का दीप जब हर मन में जलेगा , तभी मेरा देश सचमुच आगे बढ़ेगा। ४ िकसान की मौन पुकार भोर अभी आँखें मलती है , वह तब तक खेतों में पहुँच जाता है। सूरज उसक े पीछे चलता है , चाँद भी उसका साथी बन जाता है। धरती उसकी माँ कहलाती है , हल उसका िवश् वास बना रहता। बीजों में वह भिवष् य बोता , पसीने से हर स् वप् न सँवरता। हथेिलयों की कठोर रेखाएँ , समय की कथा सुनाती हैं। िम ी से उसका नाता ऐसा , जैसे साँसें जीवन लाती हैं। वह बादलों की चाल पढ़े , हवा की भाषा समझ लेता। आकाश क े छोटे संक े तों से , ऋतुओं का स् वर पहचान लेता। एक ओर उम् मीद का दीप जले , दूजी ओर अनजाना भय। कभी सूखा उसकी राह रोक े , कभी वष बने िवपदा नई। कभी ओले खेतों पर िगरते , कभी बाढ़ बहा ले जाती है। महीनों की मेहनत का सपना , क्ष ण भर में िम ी हो जाती है। िफर भी अगली सुबह वही िकसान , नए साहस से उठ खड़ा होता। टूटे मन को बाँध हृ दय में , िफर से बीजों पर िवश् वास बोता। उसकी आँखों में धन का लालच , कभी िदखाई नही ं देता। बस इतना चाहे — श्र म का फल , सम् मान सिहत उसे िमल जाता। िजस अन्न से घर - घर दीप जले , िजससे जीवन मुस् काता है। उस अन्न दाता का जीवन क् यों , अक् सर संघष में बीत जाता है ? नगरों की रोशन गिलयों तक , उसकी मेहनत पहुँच जाती है। पर उसक े अपने आँगन में , कई बार रात ठहर जाती है। उसक े बच् चे भी सपने देखें , िव ालय की राह पकड़ें। ान , िव ान और संस् क ृ ित से , अपने जीवन को आगे गढ़ें। उसकी बेटी भी िनभ य होकर , अपने पंख पसार सक े । उसका बेटा भी श्र म क े संग , सम् मान का अिधकार रखे। िकसान क े वल खेत नही ं जोतता , वह भिवष् य का िनम ण करता है। हर ऋतु में अपनी आशाओं से , जीवन का िवस् तार करता है। उसक े श्र म में देश बसता है , उसक े धैय में शिक् त महान। उसकी मौन प ाथ ना से ही , भरता है हर घर का भंडार। जब वह थककर बैठ भी जाए , धरती उसका साथ िनभाती। िम ी की हर मु ी जैसे , उसकी पीड़ा स् वयं सुनाती। वह िशकायत कम ही करता , कम को पूजा मानता है। असफलताओं की धूल झाड़कर , िफर से आगे बढ़ जाता है। देश तभी समृद्ध बनेगा , जब श्र म का सम् मान बढ़ेगा। जब िकसान क े चेहरे पर भी , िनिश् चंतता का प काश चढ़ेगा। जब खेतों में हिरयाली होगी , तो बाज ़ ारों में भी मुस् कान होगी। जब गाँवों में समृिद्ध आएगी , तभी सच् ची उन्न ित की पहचान होगी। आओ ऐसा भारत गढ़ें , जहाँ िकसान कभी अक े ला न हो। जहाँ उसकी मेहनत का मूल् य , कभी भी अधूरा मेला न हो। जहाँ खेतों में आशा उगे , जहाँ निदयाँ जीवन गाएँ। जहाँ हर मौसम क े संग िमलकर , िकसान क े सपने मुस् काएँ। क् योंिक जो धरती को जीवन देता , वह स् वयं सम् मान का अिधकारी है। िजसक े श्र म से रा साँस लेता , वह भारत की सबसे बड़ी शिक् त है। आओ उसक े श्र म को प णाम करें , उसक े साहस का मान करें। उसकी मौन पुकार को सुनकर , एक संवेदनशील रा का िनम ण करें। िजस िदन िकसान क े चेहरे पर संतोष की िनम ल आभा होगी , उस िदन भारत की उन्न ित क े वल आँकड़ों में नही ं , जन - जन की आँखों में होगी। ५ बेरोज ़ गार आँखों का सच सुबह की पहली िकरण क े संग , वह िफर एक आशा लेकर उठता है। हाथों में िडिग यों की गठरी है , मन में भिवष् य का दीप जलता है। माँ की आँखों में िवश् वास है , िपता क े माथे पर मौन पसीना। दोनों ने अपने सपनों को बेचकर , उसक े कल का माग चुना। िव ालय की चौखट से लेकर , िवश् विव ालय क े िवशाल ार तक। उसने वष ं की तपस् या की , ान क े अनिगन िवस् तार तक। रातों को दीपक जलाए रखे , नी ंद से उसने समझौता िकया। हर परीक्ष ा में अपना सव स् व देकर , जीवन से एक वादा िकया। उसने सोचा था — मेहनत कभी व् यथ नही ं जाएगी। एक िदन उसक े श्र म की धूप , हर अँधेरी राह िमटाएगी। पर समय क े लंबे गिलयारों में , प तीक्ष ा ही उसका साथी बनी। आशाओं क े पंख थकने लगे , और आँखों की चमक कही ं खो गई। हर िव ापन एक उम् मीद जगाता , हर पिरणाम एक नया प श् न देता। कभी एक अंक की दूरी , कभी अवसर ही हाथ से रेत - सा बहता। िकतनी बार उसने स् वयं से पूछा — क् या मेरी मेहनत कम थी ? या िफर मेरी तकदीर में , प तीक्ष ा ही हरदम थी ?