शाहजहााँ , दशरथ मााँझी और एकनाथजी रानाडे का " स् टोन लाइफ" ( पत्थरों से जुडा जीवन) के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन । शाहजहााँ , दशरथ मााँझी और एकनाथजी रानाडे का " स् टोन लाइफ" ( पत्थरों से जुडा जीवन) के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन यह दशाभता है कक कैसे इन तीनों महापुरुषों ने पत्थरों को अपने जीवन का माध्यम बनाकर इततहास में अतमट छाप छोडी। जहााँ शाहजहााँ ने वैर्व और प्र े म , दशरथ मााँझी ने सच्चे प्र े म और लोक - कल्याण , वहीं एकनाथ रानाडे ने राष्ट्र - अर्भन और राष्ट्र - एकता के तलए पत्थरों को तराशा । नीर्े इन तीनों के " स् टोन लाइफ " का तवस्तृत और तार्कभक तुलनात्मक तववरण कदया गया है : जीवन और उनके " पत्थर " का मुख्य उद्देश्य शाहजहााँ : इनका उद्देश्य अपनी बेगम मुमताज़ महल की याद में दुतनया की सबसे खूबसूरत इमारत बनाना और मुग़ल साम्राज्य के वैर्व को अमर करना था। उनका पत्थर ( संगमरमर ) तवलातसता और शाही कला का प्र तीक बना। शाहजहााँ और ताजमहल – पत्थरों पर उकेरी गई अमर प्र े म की इबारत यह कहानी सत्रहवीं सदी के र् ारत की है , जब मुग़ल साम्राज्य अपने वैर्व के तशखर पर था। सम्राट शाहजहााँ अपनी बेगम मुमताज़ महल से बेपनाह मोहब्बत करते थे। मुमताज़ न केवल उनकी पत्नी थीं , बतल्क उनकी सबसे र् रोसेमंद राजनीततक सलाहकार र् ी थीं। सन् 1631 में , बुरहानपुर में अपने र् ौदहवें बच्चे को जन्म देते समय मुमताज़ महल का तनधन हो गया। इस तवयोग ने शाहजहााँ को पूरी तरह तोड कदया। ऐसा कहा जाता है कक सम्राट कई कदनों तक रोते रहे , उनके बाल सफेद हो गए और उन्होंने शाही तवलातसता का त् याग कर कदया। अपने इसी गहरे दुख और अमर प्र े म को दुतनया के सामने हमेशा के तलए जीवंत रखने के तलए , उन्होंने यमुना नदी के तट पर एक ऐसी इमारत बनाने का संकल्प तलया , तजसकी कल्पना दुतनया ने कर्ी न की हो। पत्थरों का र् यन और तनमाभण का संघषभ शाहजहााँ के तलए यह केवल एक मकबरा नहीं , बतल्क धरती पर जन्नत का टुकडा बनाने जैसा था। इसके तलए उन्होंने सबसे बेहतरीन पत्थरों की खोज शुरू करवाई : मकराना का संगमरमर: राजस्थान के मकराना से सबसे शुद्ध सफेद संगमरमर मंगवाया गया। इन र् ारी पत्थरों को आगरा तक लाने के तलए बैलों और हातथयों द्व ारा खींर्े जाने वाले तवशेष रथों का तनमाभण ककया गया। दुतनयार्र के रत्न : पत्थरों को सजाने के तलए बगदाद से कफरोजा , र् ीन से जेड ( हररतमतण ) , अफगातनस्तान से लाजवदभ और श्र ीलंका से नीलम जैसे 28 प्र कार के बहुमूल्य रत्न मंगाए गए। श्र म का महाकुंर् : इस तनमाभण में फारस , तुकी और यूरोप के बेहतरीन वास्तुकारों को बुलाया गया। मुख्य खाका उस्ताद अहमद लाहौरी ने तैयार ककया। करीब 20,000 से अतधक मजदूरों , पत्थर तराशों और कारीगरों ने कदन - रात काम ककया। लगर्ग 22 वषों ( 1632-1653 ) के अथक पररश्रम और शाही खजाने के करोडों रु पयों के खर्भ के बाद ' ताजमहल ' बनकर तैयार हु आ। शाहजहााँ ने सफेद संगमरमर के पत्थरों को इस तरह तराशने का आदेश कदया था कक उन पर की गई नक्काशी ( तपएट्रा ड्य ू रा ) सजीव प्र तीत हो। जीवन के अंततम कदनों में जब शाहजहााँ को उनके ही बेटे औरंगज़ेब ने आगरा के ककले में कैद कर कदया , तब र् ी वे ककले की तखडकी से इसी संगमरमर की इमारत को तनहारते हु ए अपनी बेगम को याद करते थे। शाहजहााँ के पत्थरों ने दुतनया को तसखाया कक तवरह के आंसू र् ी दुतनया का सबसे बडा अजूबा बन सकते हैं। दशरथ मााँझी – एक अकेले इंसान का पहाड से महायुद्ध यह कहानी तबहार के गया तजले के एक अत्यंत तपछडे और गरीब गााँव ' गहलोर ' की है। यहााँ रहने वाले दशरथ मााँझी एक र् ू तमहीन मजदूर थे। गााँव और बाहरी दुतनया के बीर् गहलोर घाटी का एक तवशाल , नुकीला और कठोर पत्थरों वाला पहाड दीवार बनकर खडा था। इस पहाड के कारण गााँव के लोगों को अस्पताल या शहर जाने के तलए 55 ककलोमीटर का लंबा र् क्क र लगाना पडता था। सन् 1959 में एक कदन , दशरथ मााँझी की पत्नी फागुनी देवी जब पहाड पार करके उनके तलए दोपहर का खाना ले जा रही थीं , तो उनका पैर कफसल गया। वह पत्थरों से नीर्े तगर गईं और गंर्ीर रू प से घायल हो गईं। सही समय पर अस्पताल न पहुाँर् पाने के कारण फागुनी देवी ने दम तोड कदया। पत्नी की मृत्यु के गहरे सदमे ने दशरथ के र् ीतर एक ऐसी आग सुलगा दी , तजसने इततहास बदल कदया। पत्थरों से अकेले जंग का संघषभ दशरथ मााँझी ने रोने या ककस्मत को कोसने के बजाय उस पहाड की तरफ देखा और कहा — " जब तक तोडेंगे नहीं , तब तक छोडेंगे नहीं। " उन्होंने अपनी बकरी बेर्ी और एक छेनी तथा हथौडी खरीद लाए। गााँव वालों का उपहास: जब उन्होंने पहाड पर पहली छेनी र् लाई , तो पूरे गााँव ने उन्हें ' पागल ' कहा। लोगों का मानना था कक एक अकेला गरीब मजदूर र् ला तवशालकाय र् ट्ट ानी पहाड को कैसे तोड सकता है। प्र कृतत की मार और अकेलापन: दशरथ मााँझी ने हार नहीं मानी। र् ाहे तपती गमी हो , कडकडाती ठंड हो या मूसलाधार बाररश , वह सुबह से शाम तक पत्थरों को तोडते रहे। कई बार पत्थरों के टुकडे उनकी आाँखों और शरीर में घुस जाते , पैर लहूलुहान हो जाते , लेककन उनका संकल्प नहीं तडगा। जब इलाके में सूखा पडा और गााँव वाले पलायन कर गए , तब र् ी वह वहीं रटके रहे और पत्थरों को तोडने के तलए पानी की जगह खुद का पसीना और कर्ी - कर्ी पत्थरों को गमभ करने के तलए सूखी लकतडयों का इस्तेमाल करते रहे। कहानी का अंत एक वषभ नहीं , दो वषभ नहीं ... पूरे 22 वषों ( 1960-1982) तक यह महायुद्ध र् लता रहा। आतखरकार , उस तवशाल तजद्दी पहाड को घुटने टेकने पडे। दशरथ मााँझी ने अकेले ही 360 फीट लंबा , 30 फीट र् ौडा और 25 फीट गहरा रास्ता पहाड के बीर् से र् ीरकर बना कदया। तजस दूरी को तय करने में वषों से घंटों लगते थे , वह अब मात्र 15 तमनट की रह गई। दशरथ मााँझी के इन अनगढ़ पत्थरों ने सातबत कर कदया कक यकद इंसान के पास अटूट इच्छाशति हो , तो वह लोहे की छेनी से पहाडों का सीना र् ी र् ीर सकता है। इनका उद्देश्य ककसी र् व्य इमारत का तनमाभण नहीं , बतल्क एक तवशाल पहाड को काटकर रास्ता बनाना था ताकक उनके गााँव के लोगों को अस्पताल और बुतनयादी सुतवधाएाँ तमल सकें। उनका पत्थर ( गहलोर का पहाड ) एक बाधा था , तजसे उन्होंने जनतहत के तलए तोडा। एकनाथजी रानाडे – समुद्र की लहरों के बीर् राष्ट्र - एकता का तनमाभण यह कहानी र् ारत के सबसे दतिणी छोर , कन्याकुमारी की है। समुद्र के तट से लगर्ग 500 मीटर दूर गहरे पानी में दो तवशाल तशलाएाँ ( र्ट्टानें ) तस्थत हैं। सन् 1892 में , स् वामी तववेकानंद पूरे र् ारत की यात्रा करने के बाद यहााँ पहुाँर्े थे। वे समुद्र में तैरकर उस अंततम तशला पर गए और वहााँ तीन कदनों तक गहरे ध् यान में बैठ गए। इसी तशला पर उन्हें ' तवकतसत और जाग्रत र् ारत ' का कदव्य दशभन हु आ था। सन् 1962 में , स् वामी तववेकानंद की जन्म शताब्दी के अवसर पर राष्ट्रीय स् वयंसेवक संघ ( RSS) के प्र र् ारक एकनाथजी रानाडे ने संकल्प तलया कक समुद्र के बीर् तस्थत इसी पतवत्र पत्थर पर एक र् व्य ' तववेकानंद रॉक मेमोररयल ' का तनमाभण ककया जाएगा , जो आने वाली पीकढ़यों को राष्ट्रर्ति की प्र े रणा दे सके। पत्थरों का संयोजन और देशव्यापी संघषभ एकनाथजी रानाडे का संघषभ शाहजहााँ या दशरथ मााँझी से अलग था। उनका संघषभ र् ौगोतलक , राजनीततक और प्र शासतनक बाधाओं से र् रा था : राजनीततक और धार्मभक तवरोध: तत्कालीन सरकार और स् थानीय स् तर पर इस स् मारक का र् ारी तवरोध हु आ। यह तकभ कदया गया कक समुद्र के बीर् र् ट्ट ान पर तनमाभण करना असंर्व है और इससे पयाभवरण को नुकसान होगा। एकनाथजी ने कदल्ली जाकर देश के सर्ी सांसदों के पास खुद जाकर हस्तािर अतर्यान र् लाया। उन्होंने कुछ ही कदनों में 323 सांसदों के हस्तािर करवाकर सरकार को झुकने पर मजबूर कर कदया। प्र कृतत की तवकट पररतस्थततयााँ : समुद्र की उफनती लहरों और गहरे पानी के बीर् उस तवशाल ग्र े नाइट तशला पर तनमाभण सामग्री पहुाँर्ाना एक बडी र् ु नौती थी। इसके तलए तवशेष नावें तैयार की गईं। जन - आंदोलन और पत्थर : एकनाथजी ने इसे ककसी सरकारी पैसे से नहीं , बतल्क देश के आम नागररक के सहयोग से बनाने का तनणभय तलया। उन्होंने पूरे र् ारत में ₹1, ₹2 और ₹5 के कूपन र् लाकर लगर्ग 30 लाख लोगों से र् ं दा इकट्ठा ककया। उन्होंने देश के कोने - कोने से तवतर्न्न वास्तुकला शैतलयों के पत्थरों और कारीगरों को कन्याकुमारी में एकतत्रत ककया। एकनाथजी रानाडे : इनका उद्देश्य स् वामी तववेकानंद के तवर्ारों को जीवंत रखने के तलए समुद्र के बीर् तस्थत तशला पर तववेकानंद रॉक मेमोरीतयल का तनमाभण करना था। उनका पत्थर ( समुद्र की र् ट्ट ान ) राष्ट्र को जगाने और सांस्कृततक एकता का केंद्र बना। मात्र 6 वषों ( 1964-1970) के ररकॉडभ समय में समुद्र की छाती पर एक अद्र्ुत ग्र े नाइट का स् मारक बनकर खडा हो गया। इस स् मारक को इस तरह तडजाइन ककया गया कक समुद्र के र् यानक तूफान और खारा पानी र् ी इस पत्थर का कुछ न तबगाड सके। एकनाथ रानाडे ने समुद्र के उस तनजीव , एकाकी पत्थर को र् ारत की आध्यातत्मक शति और राष्ट्रीय एकता के वैतिक केंद्र में बदल कदया। पत्थरों का प्र कार औ र उनका उपयोग शाहजहााँ : इन्होंने राजस्थान के मकराना से माँगवाए गए कीमती सफेद संगमरमर ( White Marble) और एतशयार्र से लाए गए 28 प्र कार के बहुमूल्य रत्नों का उपयोग ककया। इन पत्थरों पर ' तपएट्रा ड्य ू रा ' (Pietra Dura) तकनीक से महीन नक्काशी की गई। दशराथ मााँझी : इन्होंने ककसी बाहरी पत्थर का उपयोग नहीं ककया , बतल्क तबहार के गया तजले की गहलोर घाटी के कठोर और अनगढ़ पत्थरों ( Solid Mountain Rocks) को ही अपनी छेनी - हथौडी से काटकर 110 मीटर लंबा रास्ता बना कदया। एकनाथजी रानाडे : इन्होंने कन्याकुमारी के समुद्र तट से दूर गहरे पानी में तस्थत तवशाल ग्र े नाइट तशला ( Granite Rock) को एक र् व्य राष्ट्रीय स् मारक का रू प कदया , तजसमें र् ारतीय मंकदर वास्तुकला की तवतवध शैतलयों का तमश्रण ककया गया। श्र म , साधन और समय की तुलना श्र म और साधनों के मामले में तीनों का संघषभ तबल्कुल अलग था , तजसे इस तातलका के माध्यम से समझा जा सकता है : पैमाना ( Parameters शाहजहााँ ( Taj Mahal) दशरथ मााँझी ( The Mountain Man) एकनाथजी रानाडे ( Vivekananda Rock Memorial) मुख्य साधन ( Tools) शाही खजाना , 20,000+ मजदूर , 1000+ हाथी एकमात्र छेनी और हथौडी ( कोई मशीन नहीं ) जन - सहयोग ( ₹1 का र् ं दा ) , इंजीतनयर और देशव्यापी कायभकताभ लगा समय ( Time Taken) लगर्ग 22 वषभ (1632 से 1653) पूरे 22 वषभ (1960 से 1982) लगर्ग 6 वषभ (1964 से 1970) र् ु नौततयााँ ( Challenges) केवल आर्थभक प्र बंधन और वास्तुकला की बारीककयां समाज का उपहास , अत्यतधक गरीबी और अकेलेपन का ददभ राजनीततक तवरोध , सरकारी बाधाएं और समुद्र की लहरों के बीर् तनमाभण पत्थरों के पीछे की प्र े रणा शाहजहााँ : इनके पत्थरों के पीछे व्य तिगत प्र े म ( Personal Love) और शोक की र् ावना थी। यह प्र े म को एक र् ौततक स् वरूप देने का प्र यास था। दशराथ मााँझी : इनकी प्र े रणा र् ी शुरुआत में पत्नी ( फागुनी देवी ) के प्र तत प्र े म थी , लेककन बाद में वह लोक - कल्याण ( Social Empathy) में बदल गई। उन्होंने तय ककया कक जो ददभ उन्होंने सहा , वह कोई और ग्र ामीण न सहे। एकनाथजी रानाडे : इनकी प्र े रणा राष्ट्र - र् ति ( Nationalism & Spirituality) थी। तववेकानंद ने तजस अंततम तशला पर बैठकर ध् यान लगाया था , उसे देश की एकता का प्र तीक बनाना ही उनका एकमात्र ध् येय था। यहााँ ताज महल के तनमाभण के बाद शाहजहााँ द्व ारा अपने तपता के प्र तत ककए गए व्य वहार और मुख्य तशल्पकार ( आर्कभटेक्ट ) को सजा कदए जाने से जुडी प्र र् तलत कहातनयों और उनके पीछे के ऐततहातसक सर् का पूरा तववरण कदया गया है। शाहजहााँ के जीवन का दूसरा पहलू: सजा और क्र ू रता की कहातनयााँ ताजमहल जैसी खूबसूरत इमारत को बनाने वाले शाहजहााँ के जीवन के साथ कुछ ऐसी कहातनयााँ र् ी जुडी हैं जो बहुत ददभनाक और क्र ू र मानी जाती हैं। आइए जानते हैं इन दोनों घटनाओं के पीछे की पूरी कहानी क् या है : शाहजहााँ का अपने तपता ( जहााँगीर) के प्र तत तवद्रोह और व्य वहार आम तौर पर इततहास में औरंगज़ेब द्व ारा शाहजहााँ को कैद करने की बात मशहूर है , लेककन शाहजहााँ ने खुद अपने तपता सम्राट जहााँगीर के जीतवत रहते हु ए उनके तखलाफ एक बहुत बडा और हहंसक तवद्रोह ककया था। सत्ता की र् ू ख और बगावत: सन् 1622 में , जब जहााँगीर बीमार रहने लगे , तो शाहजहााँ ( तजन्हें तब शहजादा खुरभम कहा जाता था ) को डर था कक उनकी सौतेली मााँ नूरजहााँ उनके छोटे र् ाई शहरयार को गद्दी पर बैठा देगी। सत्ता हतथयाने के तलए शाहजहााँ ने अपने ही तपता के तखलाफ युद्ध छेड कदया। तपता को कदया गया मानतसक ददभ: शाहजहााँ ने शाही सेना से कई युद्ध लडे और साम्राज्य के कई तहस्सों पर कब्जा कर तलया। इस तवद्रोह के कारण बीमार जहााँगीर को गहरा सदमा लगा। उन्हों ने अपनी आत्मकथा ' तुज़़ुक - ए - जहााँगीरी ' में दुख व्य ि करते हु ए शाहजहााँ को ' बेदौलत ' ( अर्ागा / कृतघ्न ) तक कहा था। बच्चों को बंधक बनाना: जब शाहजहााँ यह तवद्रोह हार गए , तो जहााँगीर ने उन्हें माफ करने के तलए एक शतभ रखी। शाहजहााँ को अपने दो बेटों ( दारा तशकोह और औरंगज़े ब ) को अपने ही तपता ( जहााँगीर ) के पास बंधक के रू प में नूरजहााँ की देखरेख में र् े जना पडा था। मुख्य तशल्पकार उस्ताद अहमद लाहौरी के हाथ काटने की कहानी अहम ह 17 मह म , मह , औ म म म ह ह यह र् ारतीय इततहास के सबसे लोकतप्रय तमथकों ( Legends) में से एक है कक ताजमहल पूरा होने के बाद शाहजहााँ ने मुख्य कारीगरों और तशल्पकारों के हाथ कटवा कदए थे ताकक वे दुतनया में दोबारा ऐसी कोई इमारत न बना सकें। प्र र् तलत कहानी: कहा जाता है कक जब ताजमहल पूरी तरह बनकर तैयार हो गया , तो शाहजहााँ उसकी खूबसूरती देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी और अन्य वररष्ठ तशल्पकारों को अपने पास बुलाया। सम्राट ने उनसे पूछा , " क् या तुम ऐसी ही एक और खूबसूरत इमारत दोबारा बना सकते हो ?" कारीगरों ने गवभ से कहा , " हााँ हु ज़ ू र , हम इससे र् ी बेहतर बना सकते हैं। " यह सुनकर शाहजहााँ ईर्षयाभ और असुरिा से र् र गए। उन्होंने तुरंत शाही जल्लादों को आदेश कदया कक इन सर्ी मुख्य तशल्पकारों के हाथ काट कदए जाएं। ऐततहातसक सत्य : आधुतनक इततहासकारों और शोधकताभओं के अनुसार , हाथ काटने की यह कहानी पूरी तरह से एक काल्पतनक तमथक ( मनगढ़ंत कहानी) है। इसके कोई र् ी पुख्ता ऐततहातसक प्र माण नहीं तमलते हैं। इसके तवपरीत , इततहास में तनम्नतलतखत तथ्य दजभ हैं : लाल ककले का तनमाभण: ताजमहल के मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी ही थे। अगर ताजमहल ( 1653) के बाद उनके हाथ काट कदए गए होते , तो कदल्ली के प्र तसद्ध लाल ककले ( Red Fort) और जामा मतस्जद का तनमाभण उन्होंने कैसे ककया ? लाल ककले का तनमाभण ताजमहल के बाद ही उनके द्व ारा ककया गया था। लाल ककले ( Red Fort) के तनमाभण के पूरा होने का वषभ 1648 है। इससे जुडी मुख्य तततथयां इस प्र कार हैं : तनमाभण पूणभ वषभ : 13 मई 1648 ( इसी कदन शाहजहााँ ने पहली बार इस ककले में प्र वेश ककया था ) । तनमाभण शुरू होने का वषभ : 29 अप्रैल 1638 । कुल समय : इसे पूरी तरह तैयार होने में लगर्ग 10 वषभ का समय लगा था शाहजहााँ का पुरस्कार : शाहजहााँ कला के बहुत बडे कद्रदान थे। उन्होंने उस्ताद अहमद लाहौरी को प्र तातडत करने के बजाय उन्हें ' नाकदर - उल- असर ' (Nadir-ul-Asar) यानी ' युग का र् मत्कार ' की शाही उपातध दी थी और उन्हें र् ारी धन - दौलत इनाम में दी थी। कहावत का गलत मतलब : इततहासकारों का मानना है कक शाहजहााँ ने कारीगरों के साथ एक ' कानूनी समझौता ' ककया था और उन्हें जीवनर्र का वजीफा ( पेंशन ) कदया था , इस शतभ पर कक वे ककसी अन्य राजा के तलए काम नहीं करेंगे। इस वादे को मुहावरे के रू प में कहा गया कक " शाहजहााँ ने उनके हाथ बांध कदए ( काम करने से रोक कदया )" , जो समय के साथ बदलते - बदलते लोगों के बीर् " हाथ काट कदए " की अफवाह बन गया। जहााँ दशरथ मााँझी ने अपनी पत्नी की याद में पत्थरों को तोडकर समाज को जीवन कदया और एकनाथ रानाडे ने सबको साथ जोडकर राष्ट्र को प्र े ररत ककया ; वहीं शाहजहााँ का इततहास महलों के पीछे तछपे सत्ता के संघषभ , तपताओं और बेटों के बीर् की कडवाहट और बाद में जनता के बीर् फैली ऐसी ही डरावनी कहातनयों से र् रा रहा। इन तीनों का " स्टोन लाइफ " हमें तसखाता है कक पत्थर केवल एक तनजीव वस्तु नहीं है। यकद राजा शाहजहााँ के पत्थरों ने कला को अमरता दी , तो दशराथ मााँझी के पत्थरों ने मानवीय इच्छाशति और संकल्प का लोहा मनवाया। वहीं , एकनाथजी रानाडे के पत्थरों ने पूरे र् ारत को सांस्कृततक और आध्यातत्मक सूत्र में तपरो कदया। इन तीनों कहातनयों का तनर्ोड यह है : 1. शाहजहााँ के पत्थर तवलास और कला के र् रमोत्कषभ हैं , जो बताते हैं कक सत्ता और धन से क् या सृजन हो सकता है। 2. दशराथ मााँझी के पत्थर मानवीय सीमाओं को पार करने की कहानी हैं , जो बताते हैं कक तनिःस्वाथभ प्र े म और संकल्प के सामने प्र कृतत को र् ी झुकना पडता है। 3. एकनाथजी रानाडे के पत्थर संगठनात्मक शति और राष्ट्र - अर्भन के प्र तीक हैं , जो बताते हैं कक वैर्ाररक दृढ़ता से पत्थरों को र् ी पूजनीय बनाया जा सकता है। : ( एम ए एड .) 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