नरेंद मोदी : रा समप ण क े 27 काव् य पुष् प लेखक : रु पेश रंजन भूिमका (Preface) " नरेंद मोदी : रा समप ण क े 27 का व् य पु ष् प " क े वल किवताओं का संग ह नही ं , बिल् क रा , नेतृत् व , सेवा , संघष , आशा , िवकास और भारतीय सांस् क ृ ितक चेतना क े िविवध आयामों को काव् यात् मक अिभव् यिक् त देने का एक िवनम प यास है। इस पुस् तक की प त् येक किवता स् वतंत्र रू प से रची गई है और िकसी अन् य सािहित् यक क ृ ित , किवता अथवा प काशन की प ितिलिप नही ं है। भारत का लोकतंत्र अनेक िवचारों , व् यिक् तत् वों और जनआंदोलनों से समृद्ध रहा है। समय - समय पर ऐसे नेतृत् व उभरते हैं जो समाज में व् यापक चच , समथ न , आलोचना और िवमश का िवषय बनते हैं। श्र ी नरेंद मोदी भी समकालीन भारत क े ऐसे ही प मुख साव जिनक नेताओं में से एक हैं। इस काव् य - संग ह में उनक े व् यिक् तत् व , नेतृत् व , रा सेवा , िवकास की अवधारणा , जनभागीदारी , सांस् क ृ ितक चेतना तथा आधुिनक भारत की आकां ाओं को काव् यात् मक रू प में प स् तुत िकया गया है। इस संग ह की किवताएँ िकसी राजनीितक बहस का िनष् कष प स् तुत करने का प यास नही ं करती ं , बिल् क एक सािहित् यक दृिष् ट से प ेरणा , पिरश्र म , संकल् प , आत् मिवश् वास , रा प ेम और जनसेवा जैसे िवषयों को शब् द देती हैं। किवता का स् वभाव भावनाओं को अिभव् यक् त करना है , और यही इस पुस् तक का मूल उ ेश् य भी है। इस पुस् तक की सत्त ाईसों किवताएँ भारत की िविवधता , लोकतांित्र क परंपराओं , संिवधान क े आदश ं , सामािजक समरसता , िव ान , तकनीक , पय वरण , क ृ िष , युवाशिक् त , मिहला सशिक् तकरण , सैिनकों क े साहस और िवकिसत भारत की कल् पना जैसे व् यापक िवषयों को भी अपने भीतर समािहत करती हैं। इस प कार यह संग ह क े वल एक व् यिक् त क े प ित सम् मान का काव् य नही ं , बिल् क रा िनम ण में योगदान देने वाले करोड़ों भारतीयों क े श्र म , सपनों और संकल् प को भी नमन करता है। लेखन का उ ेश् य िकसी पर िवचार थोपना नही ं , बिल् क पाठकों को िचंतन , प ेरणा और सकारात् मक संवाद क े िलए आमंित्र त करना है। प त् येक पाठक अपने अनुभव , दृिष् टकोण और समझ क े आधार पर इन किवताओं का अथ ग हण कर सकता है। सािहत् य की यही िवशेषता है िक वह अनेक अथ ं और भावनाओं को अपने भीतर समेटे रहता है। मैं आशा करता हूँ िक यह काव् य - संग ह िव ािथ यों , शोधािथ यों , सािहत् यप ेिमयों तथा उन सभी पाठकों क े िलए उपयोगी िसद्ध होगा जो समकालीन भारत , रा भिक् त और नेतृत् व िवषयक िहन् दी काव् य का आनंद लेना चाहते हैं। यिद इस पुस् तक की कोई भी किवता िकसी पाठक क े मन में रा क े प ित उत्त रदाियत् व , सकारात् मक सोच , पिरश्र म , ईमानदारी और सेवा की भावना को और अिधक सुदृढ़ करती है , तो इस लेखन का उ ेश् य साथ क माना जाएगा। अंत में , मैं अपने सभी पाठकों का हृ दय से आभार व् यक् त करता हूँ। आपका स् नेह , िवश् वास और सुझाव ही मेरी लेखनी की सबसे बड़ी प ेरणा हैं। ईश् वर से प ाथ ना है िक भारत िनरंतर प गित , शांित , समृिद्ध और मानवीय मूल् यों क े माग पर अग सर रहे तथा हम सभी उसक े उज् ज् वल भिवष् य क े सहभागी बनें। — रु पेश रंजन लेखक लेखक पिरचय रु पेश रंजन एक स् वतंत्र लेखक , शोधकत और िविध , शासन , संिवधान , लोक प शासन तथा समकालीन भारत से जुड़े िवषयों क े गंभीर अध् येता हैं। उनकी लेखनी का उ ेश् य जिटल रा ीय और सामािजक िवषयों को सरल , मौिलक , िवश् लेषणात् मक तथा पाठक - क े ं िद त शैली में प स् तुत करना है। लेखक की िवशेष रु िच भारतीय संिवधान , न् याियक सुधार , सुशासन , साव जिनक नीित , लोकतंत्र , मानवािधकार , रा ीय िवकास , सामािजक पिरवत न तथा समकालीन नेतृत् व पर आधािरत सािहत् य क े सृजन में रही है। उनक े लेखन में तथ् यपरक अध् ययन , सािहित् यक अिभव् यिक् त और रचनात् मक दृिष् टकोण का संतुिलत समन् वय देखने को िमलता है। " नरेंद मोदी : रा समप ण क े 27 का व् य पु ष् प " लेखक का एक मौिलक िहन् दी काव् य - संग ह है , िजसमें रा प ेम , सेवा , नेतृत् व , पिरश्र म , िवकास , सांस् क ृ ितक चेतना और भारत क े उज् ज् वल भिवष् य की कल् पना को काव् यात् मक रू प में अिभव् यक् त िकया गया है। इस संग ह की प त् येक किवता स् वतंत्र रू प से रिचत है और सािहित् यक सृजन क े माध् यम से प ेरणा तथा सकारात् मक िचंतन को प ोत् सािहत करने का प यास करती है। रु पेश रंजन का िवश् वास है िक सािहत् य क े वल मनोरंजन का माध् यम नही ं , बिल् क समाज में संवेदनशीलता , जागरू कता , संवाद और सकारात् मक पिरवत न का सशक् त साधन भी है। इसी िवश् वास क े साथ वे िविभन्न िवषयों पर मौिलक , कॉपीराइट - मुक् त और शोधपरक पुस् तकों क े लेखन में िनरंतर सि य हैं। लेखक अपने पाठकों क े सुझावों और रचनात् मक प िति याओं का सदैव स् वागत करते हैं , क् योंिक उनका मानना है िक प त् येक पुस् तक लेखक और पाठक क े बीच एक जीवंत संवाद का माध् यम होती है। लेखक : रु पेश रंजन ई - मेल : Rupesh30091988@gmail.com पु स् तक पिरचय (About the Book) " नरेंद मोदी : रा समप ण क े 27 का व् य पु ष् प " एक मौिलक , िवस् तृत , सािहित् यक और वण नात् मक िहन् दी काव् य - संग ह है , िजसमें समकालीन भारत , रा प ेम , नेतृत् व , सेवा , िवकास , लोकतंत्र , संस् क ृ ित और जनभागीदारी जैसे िविवध िवषयों को काव् यात् मक अिभव् यिक् त प दान की गई है। यह संग ह 27 स् वतंत्र एवं मौिलक किवताओं का संकलन है , िजनमें प त् येक किवता एक अलग िवषय , भावना और दृिष् टकोण को प स् तुत करती है। इस पुस् तक का उ ेश् य क े वल एक साव जिनक नेता क े व् यिक् तत् व का काव् यात् मक िचत्र ण करना नही ं है , बिल् क उन आदश ं , मूल् यों और रा ीय आकां ाओं को भी शब् द देना है जो आधुिनक भारत की यात्र ा से जुड़े हुए हैं। किवताओं में संघष , पिरश्र म , आत् मिवश् वास , अनुशासन , रा सेवा , िव ान , तकनीक , क ृ िष , पय वरण , मिहला सशिक् तकरण , युवाशिक् त , सांस् क ृ ितक िवरासत और िवकिसत भारत की पिरकल् पना जैसे अनेक िवषयों को सािहित् यक भाषा में अिभव् यक् त िकया गया है। यह काव् य - संग ह भावनात् मक अिभव् यिक् त क े साथ - साथ िचंतन का भी आमंत्र ण देता है। इसमें प युक् त भाषा सरल , प वाहपूण और प भावशाली है , िजससे सामान् य पाठक से लेकर सािहत् य क े गंभीर अध् येता तक सभी इससे जुड़ सक े ं । प त् येक किवता स् वतंत्र रू प से रची गई है और िकसी भी पूव प कािशत सािहत् य , किवता या क ृ ित की प ितिलिप नही ं है। यह पुस् तक िकसी राजनीितक घोषणा - पत्र या ऐितहािसक दस् तावेज ़ क े रू प में नही ं , बिल् क समकालीन भारत क े कुछ प मुख िवषयों और एक प मुख साव जिनक व् यिक् तत् व से प ेिरत सािहित् यक रचना क े रू प में प स् तुत की गई है। पाठक इन किवताओं को प ेरणा , रा भिक् त , नेतृत् व , सामािजक उत्त रदाियत् व और सकारात् मक िचंतन की दृिष् ट से पढ़ सकते हैं तथा अपने स् वतंत्र िवचारों क े साथ उनका मूल् यांकन कर सकते हैं। " नरेंद मोदी : रा समप ण क े 27 का व् य पु ष् प " उन सभी पाठकों क े िलए समिप त है जो िहन् दी किवता , रा िचंतन , समकालीन भारत और प ेरणादायी सािहत् य में रु िच रखते हैं। यह संग ह सािहत् य क े माध् यम से रा क े प ित प ेम , कत व् यबोध , आशा , आत् मिवश् वास और सकारात् मक दृिष् टकोण को अिभव् यक् त करने का एक िवनम प यास है। लेखक का िवश् वास है िक किवता समय की सीमाओं से परे जाकर मनुष् य क े िवचारों और भावनाओं को जोड़ने की शिक् त रखती है। यिद इस पुस् तक की कोई भी किवता पाठकों क े मन में रा क े प ित समप ण , समाज क े प ित उत्त रदाियत् व , सत् यिनष् ठा , पिरश्र म और मानवीय मूल् यों क े प ित सम् मान की भावना को सुदृढ़ करती है , तो यही इस काव् य - संग ह की सबसे बड़ी उपलिब् ध होगी। अ ध् याय 1 जननायक का उदय वडनगर की गिलयों से रा नेतृ त् व तक की प े रणादायक या ा वडनगर की शांत पगडंिडयों पर , जब सूरज पहली िकरणें िबखेरता था , तब एक बालक अपनी आँखों में सपनों का िवस् तृत आकाश िलए चलता था। न धन का अिभमान , न वैभव की छाया , क े वल श्र म की पूजा , संघष की माया। रेल की सीटी जब दूर गूँजती , जीवन की गित का संदेश सुनाती , चाय की भाप में उठते थे स् वप् न , जो सीमाओं से कही ं आगे जाते। हर मुस् कान में िवश् वास था , हर किठनाई में एक नया प यास था। साधारण जीवन की सरल कहानी , बनती गई असाधारण िनशानी। धूल भरी राहों ने िसखाया धैय , समय ने िदया साहस का वैभव। कम बना सबसे बड़ा पिरचय , और सेवा बनी जीवन का उ ेश् य। नन् हे कदमों ने सीखा िक सफलता कभी उपहार नही ं होती , वह तप , त् याग और अनुशासन की धीरे - धीरे िखलती हुई ज् योित होती। जो स् वयं जलना सीख लेता है , वही दूसरों क े िलए प काश बनता है। समय बदलता गया , दाियत् व बढ़ते गए , छोटे नगर की सीमाएँ रा की िवशाल आकां ाओं में बदलती गईं। हर चुनौती एक नया अध् याय बनी , हर संघष ने नई शि त दी। नेतृत् व क े वल पद का नाम नही ं , वह िवश् वास की या ा है। जहाँ लाखों आँखें एक आशा की िकरण खोजती हैं , और करोड़ों हृ दय भिवष् य क े स् विण म स् वप् न बुनते हैं। जननायक वही कहलाता है , जो स् वयं से पहले रा को रखे , जो आलोचना में धैय रखे , और प शंसा में िवनम ता। जो िनण यों का भार उठाए , पर श्र े य जन - जन को दे जाए। यह या ा क े वल एक व् यि त की नही ं , यह उन असंख् य भारतीयों की कहानी है जो साधारण पिरिस् थितयों से उठकर असाधारण उपलि धयों का इितहास रचते हैं। यह िवश् वास का गीत है , िक पिरश्र म कभी व् यथ नही ं जाता। वडनगर की गिलयों से चली वह प ेरणा आज भी अनेक युवाओं को पुकारती है — सपने देखो , संघष से मत डरो , कत व् य को अपना धम बनाओ , और भारत की सेवा को अपने जीवन का सव च् च सम् मान मानो। जब तक इस धरती पर मेहनत करने वाले हाथ रहेंगे , जब तक आँखों में नवभारत क े स् वप् न पलते रहेंगे , तब तक यह संदेश अमर रहेगा — िक महान या ाएँ हमेशा छोटे कदमों से ही प ारंभ होती हैं। यही है जननायक क े उदय की कथा — साहस की , संकल् प की , सेवा की , समप ण की , और उस अटूट िवश् वास की जो कहता है िक रा की उन्न ित ही व् यि त की सबसे बड़ी उपलि ध है। यह किवता उसी िवश् वास को प णाम करती है , जो हर भारतीय क े हृ दय में एक बेहतर भारत का स् वप् न जगाता है , जहाँ पिरश्र म सम् मान बने , कत व् य संस् क ृ ित बने , और रा प ेम जीवन का सबसे उज् ज् वल अलंकार बने। अ ध् याय 2 चाय की भाप से उठता स् व प् न संघष , श्र म और आ त् मिव श् वास का गीत सुबह की पहली िकरण जब धरती क े माथे को छूती थी , एक छोटे से नगर की गिलयों में जीवन अपनी गित से चलता था। िकसी क े हाथों में औज ़ ार थे , िकसी क े माथे पर पसीना था , और एक बालक की आँखों में भिवष् य का उज् ज् वल नगीना था। चाय की क े तली से उठती भाप क े वल जल की गम हट न थी , वह श्र म का संगीत थी , पिरश्र म का पिवत्र यज्ञ थी। हर प् याले में क े वल चाय नही ं , जीवन का अनुभव घुलता था ; हर मुस् कान क े साथ आत् मिवश् वास का दीप जलता था। छोटे हाथों ने सीखा था िक सम् मान कभी माँगा नही ं जाता , वह ईमानदार श्र म से अिज त होता है। किठन राहें थकाती अवश् य हैं , पर वही मंिज ़ ल का अथ भी िसखाती हैं। जो पसीने से िमत्र ता कर ले , वह समय से हार नही ं मानता। रेल की पटिरयों पर दौड़ती गािड़याँ मानो जीवन का संदेश सुनाती थी ं — चलते रहो , रु कना मत , हर पड़ाव एक नई शुरु आत है। िक्ष ितज िजतना दूर िदखता है , संकल् प उतना ही आगे बढ़ता है। जो स् वप् न जागती आँखों से देखे जाएँ , वे कम से एक िदन साकार भी होते हैं। चाय की भाप में िकसी महल का सपना नही ं था , वहाँ था क े वल एक िवश् वास — िक जीवन का मूल् य जन् म से नही ं , कम से तय होता है। साधारण पिरवार की चौखट से भी असाधारण यात्र ाएँ प ारंभ हो सकती हैं। हर ग ाहक एक कहानी था , हर मुसािफ ़ र एक अनुभव। लोग आते , बातें करते , देश , समाज और जीवन पर िवचार रखते। उन शब् दों ने िसखाया िक सुनना भी एक साधना है , और लोगों का मन समझना नेतृत् व की पहली सीढ़ी है। संघष ने कभी िशकायत नही ं की , उसने क े वल धैय िसखाया। अभावों ने कभी िनराश नही ं िकया , उन् होंने आत् मिनभ र बनना िसखाया। जहाँ संसाधन कम थे , वहाँ साहस अिधक था ; जहाँ सुिवधाएँ सीिमत थी ं , वहाँ संकल् प असीम था। चाय की भाप क्ष णभर में उड़ जाती है , िकन् तु उसका संदेश अमर रहता है — िक श्र म कभी छोटा नही ं होता , और कोई काय तुच् छ नही ं होता। जो अपने कम का सम् मान करता है , समय स् वयं उसका सम् मान करता है। यही भाप धीरे - धीरे स् वप् नों का बादल बनी , और वही बादल आशाओं की वष लेकर आया। एक छोटे नगर का संघष करोड़ों युवाओं की प ेरणा बन गया — िक पिरिस् थितयाँ चाहे जैसी हों , यिद आत् मिवश् वास अटल हो , तो मंिज ़ ल दूर नही ं रहती। आओ , इस किवता से हम भी एक संकल् प लें — कम को पूजा मानेंगे , श्र म को सम् मान देंगे , हर छोटे काय में महानता खोजेंगे , और अपने स् वप् नों को ईमानदारी , अनुशासन और िनरंतर प यास से सी ंचेंगे। क् योंिक इितहास यही कहता है — महान यात्र ाएँ अक् सर साधारण शुरु आत से जन् म लेती हैं ; और कभी - कभी एक छोटी - सी चाय की क े तली से उठती भाप पूरे रा क े िलए प ेरणा का अनंत आकाश बन जाती है। अ ध् याय 3 कम योगी का संक ल् प कत व् य , अनुशासन और रा सेवा का का व् य प भात की प थम अरु िणमा में , जब नभ स् विण म रंगों से भर जाता है , तब कम का पुजारी मौन खड़ा होकर अपने दाियत् व का स् मरण करता है। न यश की अिभलाषा , न िवश्र ाम की चाह , क े वल कत व् य की ओर बढ़ते हुए अथक कदम। कम ही पूजा है , कम ही साधना है , कम ही जीवन का सच् चा संगीत है। जो अपने श्र म को ईश् वर का अप ण समझे , वही समय की कसौटी पर अटल और अमर बनता है। अनुशासन वह दीप है जो अंधकार में भी िदशा िदखाता है। जब इच् छाएँ भटकने लगती हैं , तब िनयम उन् हें संयम िसखाते हैं। जब पिरिस् थितयाँ किठन हो जाती हैं , तब आत् मिवश् वास उनका हाथ थाम लेता है। कम योगी वह नही ं जो क े वल िवजय क े क्ष णों में मुस् कुराए , बिल् क वह है जो पराजय से भी सीख लेकर नए उत् साह क े साथ आगे बढ़ जाए। िजसक े िलए हर चुनौती एक नई िशक्ष ा बन जाए। रा सेवा क े वल शब् द नही ं , यह जीवन का सव च् च व त है। िजसमें अपना सुख छोटा पड़ जाता है , और जनकल् याण सबसे बड़ा लक्ष् य बन जाता है। जहाँ प त् येक िनण य में करोड़ों लोगों का भिवष् य बसता है , वहाँ प त् येक क्ष ण कत व् य का नया आ ान बन जाता है। पसीने की प त् येक बूँद सफलता का बीज बनती है। त् याग का प त् येक क्ष ण चिरत्र का िनम ण करता है। संकल् प का प त् येक कदम इितहास की नई िदशा िलखता है। और धैय का प त् येक पल समय को भी झुकना िसखा देता है। जो स् वयं को अनुशासन में बाँध लेता है , वही स् वतंत्र ता का वास् तिवक अथ समझता है। जो समय का सम् मान करता है , समय भी उसी का सम् मान करता है। जो अपने वचन का पालन करता है , िवश् वास उसी क े चरण चूमता है। कम योगी क े िलए िदन और रात का भेद नही ं होता। उसकी थकान भी मुस् कुराती है , क् योंिक उसका लक्ष् य व् यिक् तगत उपलिब् ध नही ं , सामूिहक उन्न ित होता है। जब रा की प गित उसक े मन का स् वप् न बन जाती है , तब प त् येक गाँव , प त् येक नगर , प त् येक िकसान , प त् येक श्र िमक , प त् येक युवा और प त् येक माता उसकी िचंता का क े ं द बन जाते हैं। वह जानता है — िवकास क े वल भवनों का िनम ण नही ं , बिल् क िवश् वास का िनम ण है। समृि क े वल संपित्त नही ं , बिल् क अवसरों की समानता है। शिक् त क े वल साम य नही ं , बिल् क सेवा का संकल् प है। कम योगी कभी रु कता नही ं , क् योंिक उसक े िलए हर सुबह एक नया दाियत् व है , हर संध् या आत् ममंथन का अवसर , और हर नया िदन रा क े िलए कुछ और करने की प ेरणा। आओ , हम भी यह संकल् प लें — अपने काय को ईमानदारी से करेंगे , अपने समय का सम् मान करेंगे , अपने समाज क े प ित उत्त रदायी बनेंगे , और अपने रा की उन्न ित में अपना िवनम योगदान देंगे। यही कम योग है। यही अनुशासन का प काश है। यही सेवा का माग है। और यही वह अमर संकल् प है जो एक साधारण मनुष् य को असाधारण प ेरणा का ोत बना देता है। जब तक भारत की धरा पर कत व् यिनष् ठ हाथ काम करते रहेंगे , जब तक सत् य , सेवा और समप ण मानव जीवन क े आदश बने रहेंगे , तब तक कम योग का यह संदेश पीढ़ी - दर - पीढ़ी गूँजता रहेगा — " कम ही सबसे बड़ा पिरचय है , सेवा ही सबसे बड़ा स म् मान है , और रा ही सबसे बड़ा पिरवार है। " अ ध् याय 4 लोकतं त्र की नई सुबह 2014 क े जनादेश और पिरवत न की आशा जब लोकतंत्र क े आकाश पर एक नया प भात उगा , करोड़ों मतों की आस् था ने इितहास का नया पृष् ठ िलखा। मतपेिटयों में क े वल मत नही ं थे , वहाँ सपनों का िवश् वास था ; हर उँगली पर लगी स् याही में भिवष् य का एक उज् ज् वल प काश था। गाँव की पगडंिडयों से लेकर महानगरों की व् यस् त सड़कों तक , एक ही प श् न हवा में तैरता था — क ै सा हो भारत का कल ? क ै सी हो िवकास की गित ? क ै सी हो जनसेवा की नीित ? और क ै सा हो वह नेतृत् व , जो सबको साथ लेकर चले ? लोकतंत्र की यही तो मिहमा है — यह िसंहासन नही ं चुनता , यह सेवा का दाियत् व सौंपता है। यह िकसी व् यिक् त का नही ं , जनता क े िवश् वास का उत् सव है। जहाँ प त् येक मतदाता रा क े भिवष् य का िनम ता होता है। जनादेश आया , और उसक े साथ आई अनिगनत अपेक्ष ाओं की धारा। युवाओं ने अवसर माँगे , िकसानों ने समृि की आशा की , मिहलाओं ने सम् मान और सुरक्ष ा की , श्र िमकों ने श्र म क े उिचत मूल् य की , और देश ने प गित की नई िदशा की। नई सुबह क े वल सूय दय नही ं होती , वह िवचारों का पिरवत न भी होती है। वह िवश् वास िदलाती है िक यिद संकल् प दृढ़ हो , तो किठन से किठन चुनौितयाँ भी रा की शिक् त क े आगे छोटी पड़ जाती हैं। लोकतंत्र में िवजय अंितम पड़ाव नही ं होती , वह तो यात्र ा का आरम् भ है। क् योंिक जनादेश क े साथ उत्त रदाियत् व भी बढ़ता है। हर िनण य में करोड़ों जीवनों की आशा होती है , हर नीित में आने वाली पीिढ़यों का भिवष् य। संसद की चौखट पर जब जनिवश् वास पहुँचता है , तो संिवधान मुस् कुराता है। वह याद िदलाता है — सत्त ा अिधकार नही ं , जनसेवा का दाियत् व है ; नेतृत् व सम् मान नही ं , कत व् य का दूसरा नाम है। लोकतंत्र की नई सुबह क े वल एक वष की कहानी नही ं , यह उस िनरंतर िवश् वास का प तीक है जो हर चुनाव में जनता अपने प ितिनिधयों को सौंपती है। यह िवश् वास कहता है — काम बोलना चािहए , वचन और कम में सामंजस् य होना चािहए। नए भारत का स् वप् न िसफ ़ इमारतों में नही ं बसता , वह िव ालयों की मुस् कान में , िकसानों की हिरयाली में , युवाओं क े नवाचार में , वै ािनकों क े अनुसंधान में , और सैिनकों क े अदम् य साहस में बसता है। लोकतंत्र का दीप तभी उज् ज् वल रहता है जब मतदाता जागरू क हो , जब संवाद जीिवत रहे , जब असहमित का सम् मान हो , और जब संिवधान सबसे ऊ ँ चा माग दश क बना रहे। यह किवता िकसी एक क्ष ण की नही ं , बिल् क उस लोकतांित्र क चेतना की है जो भारत को िवश् व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाती है। जहाँ प त् येक नागिरक का मत रा क े भिवष् य का आधार बनता है। आओ , हम भी यह प ण लें — मतािधकार का सम् मान करेंगे , संिवधान क े आदश ं का पालन करेंगे , कत व् य और अिधकार दोनों को समान महत्त् व देंगे , और लोकतंत्र की इस पिवत्र परंपरा को आने वाली पीिढ़यों तक सशक् त रू प में पहुँचाएँगे। क् योंिक नई सुबह क े वल सूय क े उदय से नही ं आती , वह तब आती है जब जनता का िवश् वास , कत व् यिनष् ठ नेतृत् व , संवैधािनक मय दा और रा िहत का संकल् प एक साथ आगे बढ़ते हैं। तभी लोकतंत्र सचमुच मुस् कुराता है , तभी भारत आगे बढ़ता है , और तभी हर नागिरक क े हृ दय से एक स् वर उठता है — " जन - जन का िव श् वास ही रा की सबसे बड़ी शि क् त है ; और लोकतं त्र की सबसे सुंदर सुबह जनता की जाग रू कता से ही ज न् म लेती है। "