उपन्यास का शीषर्क िफर वही मोड़ दो अधूरे िदलां की पिरपक्व प्र े मगाथा लेखक: रू पेश रंजन भूिमका क ुछ प्र े म कहािनयाँ अपने िमलन से नहीं, बिल्क अपनी अधूरी यात्रा से अमर होती हैं। यह उपन्यास "िफर वही मोड़" ऐेसी ही ऐक कहानी है — दो ऐेसे लोगां की, जो िकशोरावस्था मं ऐक- दूसर े क े जीवन का िहस्सा बने, समय क े साथ िबछड़ गऐ, अपने- अपने पिरवारां और िजम्मेदािरयां क े साथ आगे बढ़ े , और वषार्ं बाद िनयित ने उन्हं िफर ऐक ऐेसे मोड़ पर ला खड़ा िकया, जहाँ प्र े म का अथर् बदल चुका था। यह कहानी क े वल प्र े म की नहीं है। यह समय, स् मृित, प्र तीक्षा, त् याग, मयार्दा और आित्मक संबंध की कहानी है। यह बताती है िक जीवन मं क ुछ िरश्ते कभी समाप्त नहीं होते; वे क ेवल अपना स् वरूप बदल लेते हैं। िकशोरावस्था का आकषर्ण समय क े साथ पिरपक्व होकर सम्मान, िवश्वास और मौन स् नेह मं पिरवितर्त हो सकता है। इस उपन्यास क े पात्र पूणर्तः मानवीय हैं। वे अपनी भावनाआं से भागते नहीं, पर उन्हं अपनी िजम्मेदािरयां से ऊपर भी नहीं रखते। वे यह समझते हैं िक सच्चा प्र े म िकसी को पाने का नाम नहीं, बिल्क उसक े सुख, सम्मान और जीवन की शांित की कामना करने का नाम है। इसिलऐ इस कथा का क ंद्र अिधकार नहीं, बिल्क आत्मीयता है; आग्रह नहीं, बिल्क स् वीकार है; और िमलन नहीं, बिल्क मन की िनमर्लता है। इस उपन्यास मं स् मृितयाँ ऐक जीिवत पात्र की तरह उपिस्थत हैं। स् क ू ल की मासूम गिलयाँ, युवावस्था की छोटी- सी मुलाकात, वषार्ं की दू री, िववाहोपरांत जीवन की व्य स् तताऐ ँ , और िफर िनयित का अप्रत्यािशत िमलन — ये सभी घटनाऐँ क ेवल कथा को आगे नहीं बढ़ातीं, बिल्क मनुष्य क े भीतर चलने वाले उस मौन संवाद को भी अिभव्यक्त करती हैं िजसे शब्दां मं बाँधना सरल नहीं होता। "िफर वही मोड़" यह प्र श्न भी उठाता है िक क् या पहला प्र े म वास्तव मं समाप्त हो जाता है? या वह जीवन की गहराइयां मं ऐक शांत प्र काश बनकर सदैव जीिवत रहता है? इस प्र श्न का उत्तर लेखक ने िकसी उपदेश क े माध्यम से नहीं, बिल्क पात्रां क े जीवन, उनक े िनणर्यां और उनकी संवेदनाआं क े माध्यम से खोजने का प्र यास िकया है। यह उपन्यास िववाह संस्था, पािरवािरक मूल्यां और सामािजक मयार्दाआं का सम्मान करता है। इसमं प्र े म को िकसी संबंध को तोड़ने वाली शिक्त क े रू प मं नहीं, बिल्क मनुष्य को अिधक संवेदनशील, अिधक िजम्मेदार और अिधक मानवीय बनाने वाली अनुभूित क े रू प मं प्र स् तुत िकया गया है। कहानी यह संदेश देती है िक पिरपक्व प्र े म का सबसे सुंदर रू प वही है, िजसमं िवश्वास, संयम और सम्मान सबसे ऊपर हां। इस क ृित का उद्द े श् य क ेवल ऐक प्र े म कथा सुनाना नहीं, बिल्क पाठक को अपने जीवन क े उन पलां से जोड़ना है िजन्हं उसने कभी िकसी स् मृित, िकसी मुस्कान, िकसी िबछड़न या िकसी अप्रत्यािशत पुनिमर्लन मं महसूस िकया होगा। संभव है िक इस कहानी क े क ुछ दृ श् य आपको अपने अतीत की िकसी धुंधली तस्वीर की याद िदलाऐँ, िकसी भूले हु ऐ गीत को िफर से जीिवत कर दं, या िकसी ऐेसे व्य िक्त का स् मरण करा दं िजसने कभी आपक े जीवन को चुपचाप बदल िदया था। यिद इस उपन्यास को पढ़ते समय आपक े चेहरे पर कभी मुस्कान आऐ, कभी आँखं नम हां, कभी मन अतीत की गिलयां मं लौट जाऐ, और अंत मं आप यह महसूस करं िक प्र े म का सबसे ऊ ँचा स् वरूप त् याग, सम्मान और आित्मक शांित है — तो इस क ृ ित का उद्द े श् य सफल माना जाऐगा। आप सभी पाठकां क े प्र ित हृ दय से क ृतज्ञता। — रू पेश रंजन लेखक के बारे में रू पेश रंजन समकालीन िहंदी सािहत्य क े ऐेसे लेखक हैं िजनकी लेखनी मानवीय संवेदनाओं, सामािजक यथाथर्, इितहास, िशक्षा, पयार्वरण, दशर्न और जीवन- मूल्यां को सरल, प्र भावशाली तथा िवचारोत्तेजक शैली मं प्र स् तुत करने क े िलऐ जानी जाती है। उनका मानना है िक सािहत्य क ेवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बिल्क समाज, संस्क ृ ित और मानवीय चेतना क े बीच संवाद का सशक्त साधन है। प्र े म, स् मृितयाँ, संबंध, संघषर्, ओत्मसम्मान और जीवन की सूक्ष्म भावनाऐँ उनकी रचनाओं क े प्र मुख िवषय हैं। वे ऐेसे पात्रां का सृजन करते हैं जो वास्तिवक जीवन क े िनकट प्र तीत होते हैं और िजनकी खुिशयाँ, पीड़ाऐ ँ , द्व ं द्व तथा िनणर्य पाठकां को स् वयं से जोड़ देते हैं। उनकी लेखन शैली भावनात्मक गहराइर्, सहज भाषा और िवचारपूणर् अिभव्यिक्त का संतुिलत संगम है। उपन्यास "िफर वही मोड़" मं लेखक ने प्र थम प्र े म, समय, िबछड़न, पुनिमंलन और पिरपक्व प्र े म की संवेदनशील यात्रा को सामािजक मयार्दाओं और पािरवािरक मूल्यां क े साथ प्र स् तुत करने का प्र यास िकया है। यह क ृित इस िवचार को रेखांिकत करती है िक सच्चा प्र े म अिधकार नहीं, बिल्क सम्मान, िवश्वास, त् याग और ओित्मक जुड़ाव का दू सरा नाम है। सािहत्य क े अितिरक्त लेखक भारतीय इितहास, भारतीय िक्रक े ट, पयार्वरण संरक्षण, िशक्षा, समाज, प्र े रणात्मक सािहत्य तथा समकालीन िवषयां पर भी िनरंतर लेखन करते रहे हैं। उनकी प्र त् येक रचना का उद्द े श् य पाठकां को क े वल कहानी सुनाना नहीं, बिल्क उन्हं िवचार, संवेदना और ओत्ममंथन की िदशा मं प्र े िरत करना है। रू पेश रंजन का िवश्वास है िक शब्द समय से अिधक लंबे जीवन जीते हैं। यिद कोइर् रचना पाठक क े मन मं ऐक प्र श्न , ऐक िवचार, ऐक मुस्कान या ऐक संवेदना छोड़ जाऐ, तो वही लेखक की सबसे बड़ी उपलिब्ध है। लेखक: रू पेश रंजन ई- मेल: rupesh30091988@gmail.com पुस्तक के बारे में "िफर वही मोड़" क ेवल एक प्र े म कहानी नहीं, बिल्क समय, स् मृितयां, िबछड़न, पुनिमर्लन और मानवीय संवेदनाओं की एक गहन यात्रा है। यह उपन्यास उन भावनाओं को शब्द देता है जो अक्सर जीवन की व्य स् तताओं, सामािजक मयार्दाओं और पािरवािरक िजम्मेदािरयां क े बीच अनकही रह जाती हैं। कहानी की शुरुओत दो िकशोर मनां से होती है, जो स् क ू ल की मासूम दु िनया मं एक- दूसर े क े िनकट ओते हैं। िबना िकसी औपचािरक स् वीकारोिक्त क े उनक े बीच एक एेसा ओित्मक संबंध जन्म लेता है, िजसे समय भी िमटा नहीं पाता। पिरिस्थितयाँ उन्हं अलग कर देती हैं। वषार्ं बाद दोनां अपने- अपने जीवन, पिरवार और िजम्मेदािरयां क े साथ ओगे बढ़ चुक े होते हैं। वे अपने वैवािहक जीवन मं संतुिलत और संतुष्ट िदखाईर् देते हैं, िकर्तु स् मृितयां की एक शांत धारा उनक े भीतर िनरंतर बहती रहती है। भाग्य एक अप्रत्यािशत मोड़ पर उन्हं िफर ओमने- सामने खड़ा कर देता है। वषार्ं का अंतराल समाप्त हो जाता है, लेिकन अब उनक े सामने क ेवल भावनाएँ नहीं, बिल्क पिरवार, िवश्वास, मयार्दा और जीवन की अनेक िजम्मेदािरयाँ भी होती हैं। यहीं से यह कहानी एक साधारण प्र े मकथा से ओगे बढ़कर पिरपक्व प्र े म, ओत्मसंयम और मानवीय गिरमा की कथा बन जाती है। यह उपन्यास ईस प्र श्न की खोज करता है िक क् या पहला प्र े म वास्तव मं समाप्त हो जाता है, या वह समय क े साथ अपने स् वरूप को बदलकर मनुष्य क े भीतर एक शांत, पिवत्र और स् थायी स् मृित बन जाता है। ईसमं प्र े म को अिधकार, स् वािमत्व या िवद्रोह क े रू प मं नहीं, बिल्क सम्मान, िवश्वास, त् याग और ओित्मक जुड़ाव क े रू प मं प्र स् तुत िकया गया है। "िफर वही मोड़" यह संदेश देता है िक जीवन मं क ुछ िरश्तां का मूल्य उनक े पिरणाम से नहीं, बिल्क उनकी पिवत्रता, संवेदनशीलता और मयार्दा से तय होता है। हर प्र े म का अंत साथ होना ओवश्यक नहीं; कईर् बार सबसे सच्चा प्र े म वही होता है जो िकसी का जीवन तोड़े िबना, उसक े जीवन मं एक शांत प्र काश बनकर बना रहे। भावनात्मक गहराईर्, सहज भाषा, जीवंत पात्रां और जीवन क े सूक्ष्म मनोवैज्ञािनक पक्षां से सुसिज्जत यह उपन्यास पाठकां को अपने अतीत, अपनी स् मृितयां और अपने अनकहे अनुभवां से जोड़ने का प्र यास करता है। यह उन सभी क े िलए है िजन्हांने कभी िकसी को पूरे मन से चाहा हो, समय क े हाथां उसे खो िदया हो, और िफर भी उसक े िलए अपने हृ दय मं सम्मान, स् नेह और शुभकामनाएँ जीिवत रखी हां। यह क ृित पाठक को क े वल एक कहानी नहीं सुनाती, बिल्क यह एहसास भी कराती है िक सच्चा प्र े म समय से परे होता है। वह बदलती पिरिस्थितयां मं भी अपनी गिरमा बनाए रखता है और अंततः मनुष्य को अिधक संवेदनशील, अिधक पिरपक्व और अिधक मानवीय बनाकर छोड़ जाता है। उपन्यास का शीषर्क िफर वही मोड़ दो अधूरे िदलों की पिरपक्व प्र े मगोथो लेखक: रू पेश रंजन िवषय- सूची (38 अध्याय) भाग– 1 : मासूम शुरुआत (अध्याय 1– 8) अध्याय 1. पहली नज़र, पहली मुस्कोन स् क ू ल क े गिलयोरों मं दो िकशोर मनों को पहली बोर एक- दूसर े से पिरचय और एक अनकहो आकषर्ण। अध्याय 2. दोस्ती की नींव बोतों, िकतोबों, हँसी और छोटे- छोटे पलों क े बीच गहरोती िमत्रतो। अध्याय 3. अनकहे एहसोस िबनो प्र े म- प्र स् तोव क े जन्म लेतो प्र े म, जो आँखों की भोषो मं व्य क् त होतो है। अध्याय 4. िवदोईर् की आहट स् क ू ल समोप्त होने क े सोथ भिवष्य की अिनिश्चततोआं को आरंभ। अध्याय 5. पटनो की वह मुलोकोत कॉलेज मं प्र वेश क े बोद क ु छ घंटों की मुलोकोत, िजसमं िबछड़ने की आहट पहले से मौजूद थी। अध्याय 6. दो िदशोआं की योत्रो वह दू सर े शहर चली जोती है, और दोनों अपने- अपने जीवन की रोह पकड़ लेते हैं। अध्याय 7. अधूरी िचिट्ठयोँ, अधूरे सपने समय, दू री और पिरिस्थितयोँ हर संवोद को रोक देती हैं। अध्याय 8. योदों को पहलो मौसम सोलों तक स् मृितयोँ ही दोनों क े जीवन को मौन सहोरो बनी रहती हैं। भाग– 2 : समय का लंबा अंतराल (अध्याय 9– 16) अध्याय 9. नए सपनों की दु िनयो कॉलेज, किरयर और संघषोर्ं क े बीच जीवन की नईर् िजम्मेदोिरयोँ। अध्याय 10. िववोह की नईर् रोहं दोनों अपने- अपने पिरवोरों क े िनणर्यों क े अनुसोर िववोह कर लेते हैं। अध्याय 11. िजम्मेदोिरयों को संसोर पित- पत्नी, पिरवोर, बच्चों और सोमोिजक दोियत्वों से भरो जीवन। अध्याय 12. मुस्क ु रोहटों क े पीछे िछपी कमी जीवन मं सब क ुछ होने क े बोवजूद भीतर एक अनकही िरक्ततो। अध्याय 13. स् मृितयों की दस्तक क ुछ गीत, क ु छ बोिरशं और क ुछ रोस्ते पुरोने िदनों को िफर जीिवत कर देते हैं। अध्याय 14. मन को मौन संवोद िबनो िकसी संपक र् क े भी एक- दू सर े की योदों को जीिवत रहनो। अध्याय 15. समय को सबसे किठन प्र श्न क् यो पहलो प्र े म सचमुच कभी समोप्त होतो है? अध्याय 16. िनयित की अदृश्य योजनो भोग्य चुपचोप दोनों की रोहों को िफर एक शहर की ओर मोड़ने लगतो है। भाग– 3 : िनयित का चमत्कार (अध्याय 17– 24) अध्याय 17. तबोदले को आदेश उसक े पित को नए शहर मं स् थोनोंतरण। अध्याय 18. बैंक की एक सोधोरण सुबह नोयक अपने बैंक क े कोम से जोतो है, िबनो िकसी िवशेष अपेक्षो क े। अध्याय 19. एक नयो पिरचय बैंक अिधकोरी से सोमोन्य ग्र ोहक को संबंध धीरे- धीरे आत्मीयतो मं बदलतो है। अध्याय 20. जन्मिदन को िनमंत्रण बैंक अिधकोरी अपने पुत्र क े जन्मिदन पर नोयक को पिरवोर सिहत आमंित्रत करतो है। अध्याय 21. दरवोज़ो खुलते ही... वषोर्ं बोद अचोनक आमने- सोमने खड़े दो पुरोने प्र े मी। अध्याय 22. ठहर गयो समय क ुछ क्ष णों क े िलए वषोर्ं की दू री िमट जोती है। अध्याय 23. मौन की भोषो शब्द कम पड़ जोते हैं, लेिकन आँखं सब क ुछ कह देती हैं। अध्याय 24. पहली बोतचीत, वषोर्ं बोद औपचोिरक पिरचय क े पीछे िछपे असंख्य अनकहे प्र श्न । भाग– 4 : पिरपक्व प्र े म (अध्याय 25– 32) अध्याय 25. सीमोआं को सम्मोन दोनों अपने वैवोिहक जीवन और सोमोिजक मयोर्दोआं को सवोर्च्च स् थोन देते हैं। अध्याय 26. िमत्रतो को नयो रू प प्र े म अब अिधकोर नहीं, बिल्क सम्मोन और शुभकोमनोआं को रू प लेतो है। अध्याय 27. स् मृितयों की शोमं पुरोने िदनों की बोतं वतर्मोन को और गहरो बनो देती हैं। अध्याय 28. अधूरेपन की स् वीकोरोिक्त दोनों स् वीकोर करते हैं िक क ुछ िरश्ते पूणर् होकर भी अधूरे रहते हैं। अध्याय 29. जीवन क े प्र श्न क् यो प्र े म क े वल सोथ रहने को नोम है, यो िकसी की खुशी मं अपनी खुशी ढूँढ़ लेनो? अध्याय 30. पिरवोरों क े बीच संतुलन भोवनोआं और िजम्मेदोिरयों क े बीच िववेकपूणर् संतुलन। अध्याय 31. प्र े म को नयो अथर् पिरपक्व प्र े म त् योग, िवश्वोस और सम्मोन मं बदल जोतो है। अध्याय 32. समय से सीखे हु ए पोठ जीवन दोनों को िसखोतो है िक प्र े म उम्र से नहीं, आत्मो से पिरपक्व होतो है। भाग– 5 : अनंत तलाश (अध्याय 33– 38) अध्याय 33. बदलती ऋतुएँ, िस्थर भोवनोएँ समय आगे बढ़तो है, लेिकन स् नेह की गिरमो बनी रहती है। अध्याय 34. आत्मो को संबंध दोनों महसूस करते हैं िक क ुछ िरश्ते जन्मों से जुड़े होते हैं। अध्याय 35. प्र े म और त् योग की परीक्षो भोवनोआं से अिधक महत्वपूणर् बन जोती हैं िजम्मेदोिरयोँ। अध्याय 36. अधूरी कहोनी को सोैंदयर् हर प्र े म को अंत िमलन नहीं होतो; क ुछ प्र े म अपनी अधूरोपन मं ही अमर हो जोते हैं। अध्याय 37. िफर वही मोड़ जीवन एक बोर िफर उन्हं एेसे मोड़ पर लोतो है जहोँ िनणर्य से अिधक महत्वपूणर् संवेदनोएँ होती हैं। अध्याय 38. अनंत प्र े म, शोंत हृ दय उपन्योस को भोवपूणर् समोपन — दो आत्मोए ँ यह स् वीकोर करती हैं िक सच्चो प्र े म अिधकोर नहीं, बिल्क िकसी क े जीवन मं प्र कोश बने रहने को नोम है। उनकी कहोनी िकसी नोटकीय अंत पर नहीं, बिल्क सम्मोन, स् मृित, करुणो और आित्मक प्र े म की शोश्वत अनुभूित पर समोप्त होती है। अध्याय 1 पहली नज़र, पहली मुस्कान जुलाई की एक ताज़ा सुबह थी। रात भर हु ई हल्की बािरश ने धरती को धो िदया था। स् क ू ल क े िवशाल प्र ांगण में फ ैली भीगी िमट्टी की साेंधी सुगंध वातावरण को एक अनकही ताजगी से भर रही थी। बरामदाें की छताें से पानी की आिख़री बूँदें अब भी टपक रही थीं। मैदान में खड़े पुराने पीपल और नीम क े पेड़ हवा क े हल्क े झाेंकाें क े साथ धीरे- धीरे झूम रहे थे। एेसा लगता था मानो प्र क ृ ित स् वयं िकसी नई कहानी क े स् वागत में सज गई हो। स् क ू ल का नया शैक्षिणक सत्र शुरू हु आ था। पिरसर में बच्चाें की चहल- पहल, घंटी की आवाज़, िशक्षकाें की व्य स् तता और नए िवद्यािथर्याें क े चेहराें पर झलकती उत्सुकता — सब िमलकर एक जीवंत दृ श् य रच रहे थे। िकसी क े हाथ में नई िकताबें थीं, कोई पुराने िमत्राें से िमलकर िखलिखला रहा था, तो कोई नए वातावरण को समझने की कोिशश कर रहा था। उसी भीड़ में एक िकशोर भी था। उसकी आँखाें में अनेक सपने थे और मन में भिवष्य को लेकर अनिगनत प्र श्न । वह स् वभाव से शांत था। उसे शोर से अिधक िकताबें, भीड़ से अिधक पेड़ाें की छाया और औपचािरक बातचीत से अिधक अथपूण मौन पसंद था। उसक े िलए िवद्यालय क ेवल पढ़ाई की जगह नहीं, बिल्क सपनाें को आकार देने का संसार था। वह अपनी कक्षा की ओर बढ़ ही रहा था िक अचानक उसकी दृ िष्ट सामने क े बरामदे पर ठहर गई। वहाँ एक नई छात्रा अपने िपता क े साथ खड़ी थी। उसने हल्क े नीले रंग की स् क ू ल- ड्रेस पहन रखी थी। उसक े चेहरे पर संकोच और आत्मिवश्वास का अद्भ ु त संतुलन था। बड़ी- बड़ी आँखें नए वातावरण को उत्सुकता से देख रही थीं। हवा क े साथ उड़ती बालाें की क ुछ लटें बार- बार उसक े चेहरे पर आ जातीं और वह उन्हें सहजता से कानाें क े पीछे कर लेती। उस क्ष ण क ुछ असाधारण नहीं हु आ था। न कोई िफल्मी संगीत बजा, न समय वास्तव में थम गया। आसपास की दु िनया वैसे ही चलती रही — बच्चे दौड़ते रहे, घंटी बजती रही, िशक्षक कक्षाआें की ओर जाते रहे। लेिकन उस िकशोर क े भीतर क ुछ बदल गया। उसने पहली बार महसूस िकया िक कभी- कभी जीवन क े सबसे बड़े पिरवतन िबना िकसी शोर क े आते हैं। एक साधारण- सी मुलाकात भी मन क े िकसी गहरे कोने में स् थायी स् थान बना सकती है। क ुछ क्ष ण बाद वह स् वयं को संभालते हु ए कक्षा में चला गया। उसने उस घटना को कोई िवशेष महत्व देने का प्र यास नहीं िकया। उसे लगा, यह तो बस एक नया चेहरा है, क ुछ िदनाें में वह भी बाकी िवद्यािथर्याें की तरह सामान्य लगने लगेगा। पर मन तक से नहीं चलता। पहला पीिरयड समाप्त हु आ। अवकाश की घंटी बजी। िवद्यालय का प्र ांगण िफर बच्चाें की आवाज़ाें से भर उठा। उसी समय कक्षा- अध्यापक नई छात्रा को लेकर भीतर आए। "बच्चाें," उन्हाेंने मुस्क ु राते हु ए कहा, "आज से आपकी कक्षा में एक नई छात्रा पढ़ े गी। आप सब ईसका स् वागत कीिजए और ईसे अपने पिरवार का िहस्सा समिझए।" पूरी कक्षा ने तािलयाँ बजाईं। वह धीरे से मुस्क ु राई। उस मुस्कान में कोई बनावट नहीं थी। वह सहज, िवनम्र और आत्मीय थी। शायद वही उसकी सबसे बड़ी पहचान थी। िशक्षक ने उसकी सीट िनधािरत कर दी। संयोग एेसा था िक उसकी सीट उसी पंिक्त में थी जहाँ क ुछ दू री पर वह िकशोर बैठा करता था। िदन भर कई बार उनकी नज़र ें अनायास टकराईं। हर बार दोनाें तुरंत नज़र ें झुका लेते। न कोई शब्द बोला गया। न कोई पिरचय हु आ। लेिकन कभी- कभी मौन ही सबसे लंबी बातचीत कर लेता है। िदन बीतने लगे। धीरे- धीरे नई छात्रा िवद्यालय क े वातावरण में घुलने लगी। पढ़ाई में वह तेज थी। प्र श्न पूछने से नहीं िझझकती थी। अध्यापकाें का सम्मान करती थी और सहपािठयाें की सहायता क े िलए हमेशा तैयार रहती थी। उसकी सबसे बड़ी िवशेषता थी उसका सहज व्य वहार। वह िकसी से ऊ ँच- नीच का भेद नहीं करती थी। दू सरी ओर वह िकशोर भी पढ़ाई में उत्क ृ ष्ट था। पुस्तकालय उसका िप्रय स् थान था। अवकाश क े समय जब अिधकांश िवद्याथीर् मैदान में खेलते, वह अक्सर िकसी पेड़ की छाया में बैठकर पुस्तक पढ़ता या अपनी डायरी में क ुछ िलखता। एक िदन पुस्तकालय में दोनाें एक ही पुस्तक की ओर एक साथ बढ़ े । दोनाें क े हाथ एक ही क्ष ण में पुस्तक क े आवरण को छू गए। क्ष णभर क े िलए दोनाें िठठक गए। "आप पहले ले लीिजए," िकशोर ने धीमे स् वर में कहा। "नहीं, आप पढ़ लीिजए। मैं बाद में ले लूँगी," उसने िवनम्रता से उत्तर िदया। यही उनकी पहली बातचीत थी। िसफ़ दो छोटे वाक्य। लेिकन कई बार जीवन की सबसे गहरी कहािनयाँ एेसे ही छोटे संवादाें से शुरू होती हैं। उस िदन क े बाद जब भी वे िवद्यालय में एक- दूसर े को देखते, हल्की- सी मुस्कान अनायास दोनाें क े चेहरे पर आ जाती। वह मुस्कान िकसी वादे की नहीं थी, िकसी अपेक्षा की नहीं थी। वह क ेवल ईस बात का संक ेत थी िक अब दोनाें एक- दूसर े की उपिस्थित से पिरिचत हो चुक े थे। उन्हें स् वयं भी नहीं पता था िक यह क ेवल पिरचय की शुरुआत है या िनयित ने उनक े जीवन की एक एेसी कहानी िलखनी शुरू कर दी है, िजसे समय, दू री और पिरिस्थितयाँ भी कभी पूरी तरह िमटा नहीं पाएँगी। उस समय वे क ेवल दो िवद्याथीर् थे। उन्हें यह नहीं मालूम था िक आने वाले वषार्ं में जीवन उन्हें अलग- अलग िदशाआें में ले जाएगा, अनेक परीक्षाआें से गुज़ार े गा, और िफर एक िदन, बहुत लंबे अंतराल क े बाद, उसी जीवन की राहें उन्हें िफर एक अप्रत्यािशत मोड़ पर आमने- सामने खड़ा कर देंगी। िफलहाल तो यह क े वल पहली नज़र थी। और उसक े साथ जुड़ी हु ई एक मासूम मुस्कान। लेिकन कई बार एक मुस्कान ही पूरी उम्र की सबसे गहरी स् मृित बन जाती है। अध्याय 2 दोस्ती की नींव पहली मुलाकात क े बाद जीवन अपने सामान्य क्र म में लौट आया, पर मन पहले जैसा नहीं रहा। िवद्यालय की वही सुबहें थीं, वही घंिटयाँ, वही प्र ाथर्ना सभा, वही कक्षाए ँ और वही खेल का मैदान; िकंतु अब इन सबक े बीच एक नइर् प्र तीक्षा जन्म ले चुकी थी। यह प्र तीक्षा िकसी िवशेष घटना की नहीं, बिल्क एक पिरिचत चेहरे की थी, िजसे देखे िबना िदन जैसे अधूरा लगता था। धीरे- धीरे दोनाें िवद्यालय की िदनचयार् का िहस्सा बन गए। सुबह की प्र ाथर्ना सभा में वे अलग- अलग पंिक्तयाें में खड़े होते, पर अनायास ही एक- दूसर े को खोज लेने वाली िनगाहें भीड़ क े बीच अपना रास्ता बना लेतीं। प्र ाथर्ना समाप्त होते ही सब अपने- अपने वगार्ं की ओर बढ़ जाते, लेिकन िदन की शुरुआत उस एक क्ष िणक मुस्कान से हो जाती, िजसमें न कोइर् आग्रह था और न कोइर् संकोच। समय क े साथ कक्षा क े वातावरण में भी पिरवतर्न आने लगा। िशक्षकाें ने कइर् बार समूह बनाकर पिरयोजनाएँ तैयार करने को कहा। संयोग से वे दोनाें भी एक ही समूह में आ गए। पहली बार उन्हें औपचािरक पिरचय का अवसर िमला। "मेरा नाम आरव है," उसने मुस्क ु राकर कहा। "और मैं अनन्या," उसने सहज स् वर में उत्तर िदया। दोनाें ने एक- दूसर े का नाम पहली बार सुना। कइर् िदनाें से जो चेहरा पिरिचत था, अब उसका एक नाम भी था। नाम सुनते ही जैसे पिरचय को एक नइर् पहचान िमल गइर्। पिरयोजना का िवषय था — "भारतीय संस्क ृ ित और िशक्षा का महत्व।" दोनाें पुस्तकालय में घंटाें बैठकर सामग्री एकत्र करते। िवद्यालय की पुरानी पुस्तकाें से जानकारी खोजते, नोट्स बनाते और िफर उन्हें व्य विस्थत करते। पढ़ाइ र् क े दौरान उनकी बातचीत क ेवल िवषय तक सीिमत रहती, पर हर संवाद क े साथ िझझक की एक परत कम होती जाती। आरव ने देखा िक अनन्या क ेवल पढ़ाइ र् में ही नहीं, बिल्क िचत्रकला और किवता में भी रु िच रखती थी। उसकी िलखी छोटी- छोटी किवताएँ भावनाआें से भरी होती थीं। दू सरी ओर अनन्या को यह जानकर आश्चयर् हु आ िक आरव को इितहास पढ़ना, डायरी िलखना और पेड़ाें क े नीचे बैठकर िकताबें पढ़ना पसंद था। धीरे- धीरे दोनाें ने एक- दू सर े की रु िचयाें को समझना शुरू कर िदया। अवकाश क े समय कभी पुस्तकालय में मुलाकात हो जाती, कभी िवज्ञान प्र योगशाला क े बाहर, तो कभी िवद्यालय क े उस पुराने बरगद क े नीचे, जहाँ िवद्याथीर् बैठकर बातें िकया करते थे। उनक े बीच अब सामान्य िवषयाें पर बातचीत होने लगी थी — परीक्षाए ँ , भिवष्य क े सपने, पसंदीदा लेखक, मनपसंद िवषय और जीवन की छोटी- छोटी बातें। एक िदन अनन्या ने पूछा, "तुम इतने शांत क् याें रहते हो? बाकी सब तो हर समय शोर मचाते रहते हैं।" आरव मुस्क ु राया। "शायद इसिलए िक मुझे लोगाें की बातें सुनना ज़् यादा अच्छा लगता है। हर व्य िक्त की अपनी एक कहानी होती है।" अनन्या क ु छ क्ष ण उसे देखती रही। "और तुम्हारी कहानी?" आरव ने हल्की मुस्कान क े साथ उत्तर िदया, "अभी तो िलखी ही जा रही है।" दोनाें हँस पड़े। उस िदन क े बाद उनकी बातचीत में सहजता और बढ़ गइर्। िवद्यालय में वािषंकोत्सव की तैयािरयाँ शुरू हु इ र् ं । िकसी को नाटक में भाग लेना था, िकसी को गीत गाना था, तो िकसी को भाषण देना था। अनन्या ने किवता- पाठ क े िलए अपना नाम िदया, जबिक आरव ने वाद- िववाद प्र ितयोिगता में भाग लेने का िनणर्य िलया। कायर्क्रम वाले िदन जब अनन्या मंच पर पहु ँ ची, पूरा सभागार शांत हो गया। उसकी आवाज़ में एक अद्भ ु त िमठास थी। उसने प्र क ृ ित और जीवन पर िलखी अपनी किवता पढ़ी। किवता समाप्त होते ही तािलयाें की गड़गड़ाहट गूँज उठी। दशर्काें क े बीच बैठा आरव सबसे अिधक प्र सन्न िदखाइर् दे रहा था। क ुछ देर बाद वाद- िववाद प्र ितयोिगता में उसकी बारी आइर्। उसने आत्मिवश्वास और स् पष्टता क े साथ अपने िवचार रखे। िनणार्यकाें ने उसकी प्र स् तुित की सराहना की। कायर्क्रम समाप्त होने पर दोनाें ने एक- दूसर े को बधाइर् दी। "तुम बहुत अच्छा बोले," अनन्या ने कहा। "और तुम्हारी किवता... एेसा लगा जैसे शब्द नहीं, भावनाएँ बोल रही हाें," आरव ने उत्तर िदया। उस िदन पहली बार दोनाें ने महसूस िकया िक वे क ेवल सहपाठी नहीं रह गए हैं। उनक े बीच िवश्वास का एक एेसा धागा बन चुका था जो हर िदन थोड़ा और मजबूत हो रहा था। परीक्षाआें का समय िनकट आने लगा। िवद्यालय का वातावरण गंभीर हो गया। अब बातचीत कम और पढ़ाइ र् अिधक होने लगी। िफर भी जब कभी िकसी प्र श्न में किठनाइर् होती, दोनाें िबना संकोच एक- दूसर े की सहायता करते। एक िदन गिणत की एक जिटल समस्या में अनन्या उलझ गइर्। आरव ने धैयर्पूवर्क पूरा प्र श्न समझाया। समाधान िमलते ही उसक े चेहरे पर संतोष की मुस्कान फ ैल गइर्। "धन्यवाद," उसने कहा। "दोस्ताें क े बीच धन्यवाद नहीं कहते," आरव ने सहजता से उत्तर िदया। यह शब्द सुनते ही अनन्या क ुछ क्ष ण चुप रही। "तो... हम दोस्त हैं?" आरव ने िबना िझझक कहा, "अगर तुम्हें स् वीकार हो, तो हाँ।" अनन्या ने मुस्क ु राकर अपना हाथ आगे बढ़ाया। "दोस्त।" आरव ने भी मुस्क ु राते हु ए उसका हाथ थाम िलया। वह एक साधारण- सा क्ष ण था, पर उसी क्ष ण उनकी िमत्रता ने एक नया रू प ले िलया। यह िमत्रता िकसी स् वाथर् पर आधािरत नहीं थी। इसमें प्र ितस्पधार् नहीं, सहयोग था; औपचािरकता नहीं, सहजता थी; और सबसे बढ़कर, एक- दूसर े क े व्य िक्तत्व क े प्र ित गहरा सम्मान था। िदन, सप्ताह और महीने बीतते गए। अब िवद्यालय में शायद ही कोइर् एेसा िदन होता जब दोनाें की बातचीत न होती। कभी वे पुस्तक ें बदलते, कभी नोट्स साझा करते, कभी िकसी िशक्षक की कही प्र े रक बात पर चचार् करते, तो कभी क े वल मुस्क ु राकर एक- दू सर े का िदन बेहतर बना देते। उन्हें यह पता ही नहीं चला िक कब पिरचय िमत्रता में बदल गया। और यह भी नहीं समझ पाए िक इस िमत्रता की नींव में एक एेसा भाव चुपचाप जन्म ले चुका था, जो अभी शब्दाें से बहुत दू र था, लेिकन हृ दय क े बहुत िनकट पहु ँ च चुका था। दोनाें इसे क ेवल एक सुंदर दोस्ती समझ रहे थे। समय मुस्क ु रा रहा था। क् याेंिक उसे मालूम था िक यह कहानी अभी बहुत लंबी है। अध्याय 3 अनकहे एहसास िमत्रता का सबसे सुंदर रू प वह होता है िजसमें िकसी को क ुछ िसद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। न शब्दाें का बोझ, न वादाें का आग्रह। क ेवल िवश्वास, सहजता और एक- दूसर े की उपिस्थित से िमलने वाली शांित। आरव और अनन्या की िमत्रता भी अब उसी मोड़ पर पहु ँ च चुकी थी। वे प्र ितिदन िवद्यालय आते, अपनी- अपनी पढ़ाई > में व्य स् त रहते, िमत्राें क े साथ समय िबताते, िशक्षकाें से सीखते और िफर घर लौट जाते। ऊपर से देखने पर उनक े जीवन में क ु छ भी असाधारण नहीं था। लेिकन भीतर ही भीतर दोनाें क े मन में क ुछ एेसा जन्म ले चुका था, िजसका नाम वे स् वयं भी नहीं जानते थे। सिदर्याें की शुरुआत हो चुकी थी। सुबह की धूप अब पहले जैसी तीखी नहीं रहती थी। िवद्यालय क े मैदान में ओस की छोटी- छोटी बूँदें मोितयाें की तरह चमकती थीं। प्र ाथ>ना सभा क े बाद िवद्याथीर् धूप सेंकते हु ए अपनी कक्षाआें की ओर जाते। आरव ने ध् यान िदया िक अब उसकी िदनचया> बदलने लगी थी। वह हर सुबह िवद्यालय थोड़ा पहले पहु ँ चने लगा था। कारण कोई> नहीं पूछता था, क् याेंिक वह हमेशा समय का पाबंद छात्र माना जाता था। लेिकन वह स् वयं जानता था िक वह िकसका ईंतज़ार करता है। िवद्यालय क े मुख्य द्व ार से जब अनन्या भीतर प्र वेश करती, उसक े चेहरे पर अनायास एक हल्की मुस्कान आ जाती। वह मुस्कान िकसी प्र यास से नहीं आती थी। जैसे मन स् वयं उसका स् वागत करता हो। अनन्या भी अब यह बात महसूस करने लगी थी। यिद िकसी िदन आरव िवद्यालय देर से पहु ँ चता, तो अनजाने में उसकी नज़र बार- बार मुख्य द्व ार की ओर उठ जाती। वह स् वयं को समझाती िक यह क ेवल एक िमत्र की िचर्ता है।