1 उधेड़ - बुन राहुल उपाध् याय 2 मेरे हाथों की लकीरों में अगर मुक़द् दर होता मैं अपने ही हाथों क े हुनर से बेख़ बर होता 3 क्र माांक प्र स् तावना ................................ ................................ 9 प्र ाक्कथन ................................ ................................ 15 मौसम ................................ ................................ ... 17 अहसास ................................ ................................ .. 19 मसला ................................ ................................ ... 20 अमर प्र े म ................................ ............................... 21 प्र ततभा पलायन ................................ ......................... 24 करवा चौथ ................................ .............................. 25 कलांक ................................ ................................ .... 28 क़हर ................................ ................................ ..... 30 क्र क्र समस ................................ ................................ 32 जन्म ................................ ................................ ..... 34 जी - पी - एस ................................ ............................... 36 चुनाव ................................ ................................ .... 38 हम सब एक हैं ................................ ......................... 40 तुम सोचती होगी ................................ ...................... 42 4 मैं भूल जाता हूूँ अक् सर ................................ ............... 44 उससे बात हो और बात न हो ................................ ....... 45 पहली मोहब्बत ................................ ......................... 46 झूठी - सच्ची कहानी ................................ ..................... 48 हम हैं तो ख़ ु शियाूँ हैं ................................ .................. 51 दीवाली की िुभकामनाएूँ ................................ .............. 54 प्र श् न कई हैं ................................ ............................. 55 कभी - कभी दुआओां का जवाब आता है .............................. 58 भगवान ................................ ................................ .. 59 मांददर ................................ ................................ ..... 60 धमम रक्षक ................................ ............................... 62 मूततम पूजा ................................ ............................... 65 ॠषिवर ................................ ................................ .. 67 धुआूँ करे अहांकार ................................ ...................... 69 नए जूते ................................ ................................ 71 बांजर ................................ ................................ ..... 73 मरते दम तक ................................ .......................... 75 मस्त मौला चाूँद ................................ ....................... 76 5 मरे शमले करोड़ ................................ ......................... 77 मृग तृष् णा ................................ .............................. 78 मेरा 6 साल का बेटा ................................ .................. 79 मेरे नाना ................................ ................................ 81 डाक थी सुस् त ................................ .......................... 83 क्र कताबें ................................ ................................ ... 85 4 इांच की स् क्र ीन ................................ ....................... 86 माताएां खलनायकों की ................................ ................ 88 मैं ईश् वर क े बांदों से डरता हूूँ ................................ ......... 89 ममम बर् म का ................................ ............................ 90 महल एक रेत का ................................ ...................... 94 मुझे सर् ाई पसांद है ................................ ................... 96 मैं अपनी माूँ से दूर ................................ ................... 98 मैं ऑगैतनक नहीां हूूँ ................................ ................. 101 वतन और वेतन ................................ ...................... 105 वापसी ................................ ................................ 108 हाथी क े दाांत ................................ .......................... 111 स् वाथम हेतु मैं जड़ें काट भी दूूँगा ................................ ... 113 6 मनाओ होली , मनाओ सेंट पैदिक्स डे ............................. 115 हम अमेररका में रहते हैं ................................ ............ 120 भूलते नहीां हम ................................ ....................... 122 मैं कषव हूूँ ................................ ............................. 124 मेरे ददल की बात ................................ .................... 127 मैं ग़ाशलब हूूँ , मैं मीर हूूँ ................................ ............. 130 डॉक्टर ग़ज़ल प्र साद ................................ ................. 131 तीस पतझड़ बीते यहाूँ मेरे ................................ ......... 134 दुख का सुख ................................ .......................... 136 रचतयता ................................ ................................ 138 पहले प्र तीक्षा रहती थी विम क े आरम्भ की ...................... 139 क्र कनारे - क्र कनारे ................................ ......................... 141 तुम नए ज़माने की हो ................................ .............. 143 तुम हो भी और नहीां भी ................................ ............ 146 ओल्ड फ् लेम ................................ .......................... 148 महज बातों ही से क् या मन की बात होती है ................... 150 शमटती है हर बीमारी ................................ ................ 151 शमलोगी तुम ................................ .......................... 152 7 उन्नीस ददन ................................ .......................... 153 िुभकामनाओां की शमयाद ................................ ........... 155 िुभकामनाएूँ ................................ .......................... 156 दीवाली की यादें ................................ ...................... 157 नव - विम ................................ ................................ 158 वापसी पे मनते दीपोत्सव नहीां ................................ .... 160 21 वीां सदी ................................ ........................... 162 गुरू गोषवन् द दोऊ खड़े ................................ .............. 163 ज़ज़ांदगी , मौत और तलाक़ ................................ ........... 164 हम सब ग़रीब हैं ................................ ..................... 165 पांचलाइन ................................ .............................. 167 इक अरसा हुआ ................................ ...................... 169 रोिनी है इतनी ................................ ...................... 170 वो जो हममें - तुममें समाया है ................................ ...... 171 ये र् ोन नहीां रक़ीब है ................................ ............... 172 जो ित आह भर क े भी ................................ ............ 174 तब और अब ................................ ......................... 175 तू अनादद है , अनन्त है ................................ ............. 176 8 सोते हैं हम सभी ................................ ..................... 178 जड़ें हों गहरी ................................ ......................... 180 बदनाम है मौसम ................................ .................... 181 डायबबटीज़ ................................ ............................. 182 आजकल ................................ ............................... 183 दुआ है क्र क ................................ ............................ 184 र् ू ल और काांटे ................................ ........................ 185 जवानी में षप्रयतम ................................ ................... 186 एक हूक सी उठती है ................................ ................ 188 याचना ................................ ................................ 189 सृज़ष् ट का तनमामण ................................ .................... 190 सफ़र ................................ ................................ ... 192 जो गुज़र गया ................................ ........................ 193 9 प्र स् तावना राहुल उपाध् याय जी अनेक दिकों से कषवताएूँ और पैरोडी शलखते रहे हैं। इनकी एक अनोखी षविेिता है क्र क ये बबना नागा प्र ततददन कम से कम एक कषवता अवश्य शलखते हैं और व् हाट्सैप पर पोस्ट कर देते हैं। इस तरह हमें रोज़ इनकी रचनाएूँ पढ़ने का अवसर प्र ाप्त होता रहता है। आज इनका ' उधेड़ - बुन ' काव्य - सांग्र ह पुस् तक क े रू प में मेरे हाथ में आया तो मन एक आश्चयमजनक आह्लाद से भर उठा। इनकी "उधेड़ - बुन" को समझना िुरू क्र कया तो अांत आने से पहले बीच में छोड़ ही नहीां पाई। पूरी पुस् तक एक बैठक में पढ़ गई। राहुल जी की सांवेदनिीलता व कल् पनािीलता दोनों ही बराबर नज़र आईं । एक ओर कल् पना की ऊ ूँ ची उड़ान है तो दूसरी ओर सांवेदना ददल में उतनी ही गहराई तक उतर जाती है। वे पुराने जूतों क े प्र तत भी क ै से भावुक हो उठते हैं , उसकी बानगी देखखए - "घर क े बाहर पड़े - पड़े राह तकते थे दरवाज़ा खुलने पर साथ ले जाने की राह तकते थे" अनुप्र ास और यमक अलांकार का एक ही स् थान पर प्र योग क्र कतना सुांदर बन पड़ा है - "हर मसला मसल से मसला नहीां जाता"। 10 राहुल जी की रचनाधशममता अनूठी है। कहीां पर ये "क ै लेंडर में भुलाने का ररमाइांडर लगाना" नहीां भूलते तो कहीां कहते हैं क्र क "माइक्रोवेव में तो ररश्ता पकता नहीां"। नवीन प्र योगों की षवषवधता आपको इनकी रचनाओां में हर जगह नज़र आएगी। "क्रकताबें पहले दरवाज़ा रोकने क े काम आती थीां आजकल मॉतनटर ऊ ूँ चा करने में" आधुतनक तकनीकों क े भी गुलाम नहीां हैं ये। यह उदाहरण आपको इस बात का बख़ ू बी सबूत देगा। - "जी - पी - एस साथ लेकर चलना रास्ता बताने क े शलए नहीां वरन ् जब वो कहे - यहाूँ मुड़ो मैं न मुड़ूूँ और क ु छ क्ष णों क े शलए महसूस कर सक ू ूँ - अपनी मज़़ी का माशलक होना क्र कसे कहते हैं"। आज की पीढ़ ी की सच् चाई देखखए राहुल जी क्र कतनी सहजता से कह जाते हैं - "पीडड़त है यहाूँ की पीढ़ी टीबी से नहीां , टीवी से एल - एस - डी से नहीां , एल - सी - डी से" 11 धमाांधता और रू दढ़ वाददता पर भी कटाक्ष करने से ये नहीां चूकते हैं - "पांडडत क े सुलाने से सो जाते हैं जो क्र कस्मत हमारी जगाएूँगे वो ? पलक झपकते ही षवसज़जमत हो जाते हैं जो भवसागर पार कराएूँगे वो" ? वृक्ष से पतझड़ में झरे पीले पत्त े और वृक्ष पर लहराते हरे - भरे पत्त ों क े माध् यम से भारतीय दिमन भी इनकी रचनाओां से अछ ू ता नहीां रह सका - "मौसम से सीखो इसमें राज़ बड़ा है जो जड़ से जुड़ा है वो अब भी खड़ा है रांग ज़जसने बदला वो क ू ड़े में पड़ा है" प्र कृतत को भी बहुत ख़ ू बसूरती से इन् हों ने अपनी कृततयों में स् थान ददया है। एक ओर वे भारतीय - सांस् कृतत क े नाते चांद्र मा को जीवन क े हर पहलू से जोड़ कर चलते हैं - "जवानी में षप्रयतम , बचपन में मामा सारे त् यौहार तुमसे बाूँधे" होली - दीवाली , राखी - भैयादूज सबका सांबांध चाूँद से है। दूसरी ओर मस्तमौला चाूँद का नई कषवता में प्र योग देखखए - 12 "एक राज़ की बात बताऊ ूँ चाूँद है तनभ़ी क और सूरज है डरपोक तभी तो रात को बाहर नहीां तनकलता। चाूँद अपनी मज़़ी का माशलक अरे भाई! क्र कसी क े बाप क े नौकर थोड़े ही हैं जो रोज़ - रोज़ अपनी सूरत ददखाते क्र र् रें ?” राहुल जी एक अत् यांत सांवेदनिील इांसान हैं। यहाूँ तक क्र क एक चट् टान क े प्र तत भी वे भावुक हो उठते हैं - "एक समय चट्टान थी चोट खाकर वक्त की मार खाकर लहर की टूट - टूट कर बन गई वो रेत थी" ये रहते तो षवदेि में हैं लेक्रकन ददल भारत में ही बसता और धड़कता है। माूँ क े प्र तत उनक े भाव देखखए - "मैं अपनी माूँ से दूर अमेररका में रहता हूूँ बहुत ख़ ु ि हूूँ यहाूँ , मैं उनसे कहता हूूँ" और भला श् ृ ां गार रस को क ै से छोड़ सकते थे राहुल जी। क् या ख़ ू बसूरत चचत्र ात् मक िैली है – "शमलोगी तुम तो करू ूँ गा बांद - आूँखें तुम् हारी अपनी हथेशलयों से - पीछे से आकर" "मेरे तो होि ही उड़ जाएूँगे 13 तुम् हारी ज़ुल् फ़ ों क े साए में" राहुल जी िब् दों क े जादूगर हैं। वे िब् दों क े जादू से नवीन बबम् ब क ै से उत्पन्न कर देते हैं उसक े अनोखे रू प देखखए - "यह बहुत अच् छा हुआ इनक े नागररकता त् यागने से देि हमारा नाग - ररक् त हुआ" एक अन् य प्र योग भी क्र कतना ख़ ू बसूरत बन पड़ा है - "सुना है इन ददनों तुम बहुत हाथ धो रही हो चाहे क्र कतनी ही कोशिि कर लो मुझसे हाथ धो न सकोगी" राहुल जी ने अनेक बबम् बों क े साथ - साथ प्र योगवादी कषवता और नई कषवता को अपने सादहत् य में प्र चुरता से स् थान ददया है। तुकाांत - अतुकाांत , छांद बद्ध - छांदमुक् त और आलांकाररक सरल भािा का बड़ी सहजता से प्र योग क्र कया है। इनकी रचनाएूँ बेजोड़ , लीक से हटकर और अद् षवतीय हैं। जहाूँ भारतीय सांस् कार बहुत गहरे तक कषव में समाए हैं वहीां पाश् चात् य सांस् कृतत का समागम भी बहुत ही सहज है। मैं तो कहूूँगी क्र क मेरी तरह अन् य पाठक भी इस ' उधेड़ - बुन ' को जब पढ़ना आरांभ करेंगे तो आद्योपान्त पढ़ने का लोभ सांवरण नहीां कर पाएूँगे। मुझे पूणम आिा तथा षवश् वास है क्र क इस पुस् तक को सभी का स् नेह शमलेगा। कषव का प्र यास अत्यांत सराहनीय व मनोरांजक है। ित रचनाओां से युक् त ' उधेड़ - बुन ' अवश्य ही सादहत्य क े मैदान में ितक जड़ेगा और एक कीततममान स् थाषपत 14 करेगा। राहुल उपाध् याय जी को प्र थम काव् य - सांकलन की सर्लता क े शलए समस् त हाददमक िुभकामनाएूँ व असांख् य बधाइयाूँ। राहुल जी का द् षवतीय काव् य - सांग्रह भी िीघ्र आए ऐसी मांगलकामना करते हैं। प्र शमला कौशिक - कवतयत्री , शिक्षाषवद द् वारका , नई ददल्ली , भारत भारतीय प्र तततनचध - "स्पाइल दपमण" दहांदी - नावेज़जयन द् षवभािीय पबत्रका ओस्लो , नावे Pramilasms 411 @gmail.com 15 प्र ाक्कथन क्र कताबें उपयोगी हैं। इनका मानव षवकास में उतना ही योगदान है ज़जतना क्र क आग का या पदहए क े आषवष्कार का। क्र कताबें अब शसफ़ म काग़ज़ पर छपी नहीां रह गई हैं। मैंने स् वयां कोई भी रचना काग़ज़ पर कलम से नहीां शलखी है। िुरू से या तो डेस्कटॉप पर शलखी , या ब् लैक बेरी या क्र कसी स् माटम र् ोन पर। पढ़ ता भी हूूँ तो ऑनलाइन ही पढ़ ता हूूँ। षप्र ां ट की हुई क्र कताब पढ़ े अरसा हो गया। जब मैं ऐम्स्टरडम में था , एक ददन अजय ब्र ह् मात्मज जी से मुलाक़ात हो गई। उनक े आग्र ह पर अपनी चुतनांदा सौ रचनाएूँ आपक े सामने प्र स् तुत हैं। हर रचना मेरे ब् लॉग पर भी सहज उपलब्ध है। रचनाएूँ मैंने बहुत देर से शलखनी िुरू की। जब मैं तीस बरस पार कर चुका था। सोचा था क ु छ ऐसा शलखूूँ जो नया हो , नये षविय पर हो , ज़जस पर कम शलखा गया हो , ज़जस दृ ज़ष्टकोण पर आमतौर से नहीां शलखा जाता है , और िब्दों का खेल भी हो। जैसे कबीर का - मन का मनका। रचनाएूँ बहुत सी शलखी हैं। कौन सी सौ प्र स् तुत करू ूँ ? सोचने बैठा तो छब् बीस ही याद आईं । ब् लॉग पर ढूूँढने गया तो एक सौ बीस हो गई। छूँटनी की तो एक सौ आठ हो गई। 16 गुणी पाठकों से कहा तो एक सौ पच् चीस हो गईं । जैसे - तैसे सौ की ितम पूरी की। अजय जी और गुणी पाठकों को असीम धन् यवाद ज़जनक े बबना यह कायम सम्भव नहीां था। राहुल उपाध् याय | 11 अप्रैल 2025 | शसएटल 17 मौसम पतझड़ क े पत्ते जो ज़मीां पे चगरे हैं चमकते दमकते सुनहरे हैं पत्ते जो पेड़ पर अब भी लगे हैं वो मेरे दोस्त , सुन , हरे हैं मौसम से सीखो इसमें राज़ बड़ा है जो जड़ से जुड़ा है वो अब भी खड़ा है रांग ज़जसने बदला वो क ू ड़े में पड़ा है घमांड से र् ू ला घना कोहरा सोचता है देगा सूरज को हरा 18 हो जाता है भस्म शमट जाता है ख़ ु द सूरज की गम़ी से हार जाता है युद् ध मौसम से सीखो इसमें राज़ बड़ा है घमांड से भरा ज़जसका घड़ा है क ु दरत ने उसे तमाचा जड़ा है 19 अहसास अहसास होता है ज़जसका हर दम हर वक़्त ज़जसका साया है क् यूूँ न अब तक मुझे वो कहीां शमल पाया है वेद , पुराण , बुद् ध और ईसा सब ने यही बताया है ज़जसे मैं छ ू पाता नहीां उसे मैंने ही कहीां छ ु पाया है न जाने क्र कस भूल को हम भूल बैठे हैं हज़ारों पैगम्बरों क े बाद भी याद नहीां क ु छ आया है गोया याद नहीां है क ु छ भी पर उसकी याद ने बहुत सताया है यही मुझे चगला है उससे क् यूूँ न दीवाना मुझे बनाया है जब तक ये होि है बाकी जब तक मेरा सरमाया है तब तक चलेगा ये सफ़र जीते जी कौन इसे तय कर पाया है 20 मसला हर मसला ' मसल ' से मसला नहीां जाता हो चौखट पे सैलाब तो उससे लड़ा नहीां जाता जब से सुना क्र क लकीरों में तक़दीर है मेरी मेरे हाथों से मेरा हाथ मला नहीां जाता समांदर में मांददर कहीां छ ु पा है ज़रू र बबन जूते उतारे उसमें उतरा नहीां जाता जब भी सूँवरती हैं , बहुत बबगड़ती हैं ज़ुल् फ़ ें कहती हैं क् यों आज़ाद हमें रखा नहीां जाता ? मुझे होती समझ तो तुम् हें न बताता ? क्र क क ु छ होती हैं बातें ज़जन्हें कहा नहीां जाता