पुस्तक का प्र स् तािवत शीषर्क "युवा क्र ांित: बदलाव की आग" लेखक: रु पेश रंजन भूिमका युवा ांित : बदलाव की आग हर युग में पिरवत न की शुरु आत कुछ बेचैन आत् माओं से हुई है। वे लोग जो पिरिस् थितयों से समझौता नही ं करते , जो अन् याय क े सामने मौन नही ं रहते , और जो यह िवश् वास रखते हैं िक भिवष् य िकसी चमत् कार से नही ं , बिल् क जागृत चेतना , साहस और कम से बनता है। ऐसे ही युवाओं को समिप त है यह किवता - संग ह — " युवा ांित : बदलाव की आग " । यह पुस् तक क े वल किवताओं का संकलन नही ं है , बिल् क एक िवचार - यात्र ा है। यह उन युवाओं की आवाज ़ है जो अपने भीतर सपने , साहस और संकल् प लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं। यह उन आँखों की चमक है जो एक ऐसे भारत और ऐसे िवश् व की कल् पना करती हैं जहाँ न् याय , समान अवसर , ईमानदारी , करु णा और मानवीय गिरमा सव च् च मूल् य हों। आज का समय अनेक चुनौितयों से भरा है। बेरोज ़ गारी , भ ष् टाचार , सामािजक असमानता , पय वरणीय संकट , नैितक पतन , िडिजटल भ म , घृणा की राजनीित और िनराशा का फ ै लता वातावरण युवाओं क े सामने किठन प श् न खड़े करता है। ऐसे समय में यह आवश् यक है िक युवा स् वयं को असहाय न समझें , बिल् क अपने भीतर िछपी पिरवत नकारी शि त को पहचानें। इितहास इस बात का सा ी है िक जब युवा जागते हैं , तो समाज की िदशा बदलती है , रा नई ऊज प ाप् त करता है और आने वाली पीिढ़यों का भिवष् य सुरि त होता है। इस संग ह की प त् येक किवता एक पुकार है — डर को हराने की , आलस् य को त् यागने की , सत् य क े साथ खड़े होने की , किठनाइयों से संघष करने की और अपने जीवन को क े वल व् यि तगत सफलता तक सीिमत न रखकर समाज और रा क े िनम ण में योगदान देने की। इन किवताओं में ांित का अथ िहंसा नही ं , बिल् क िवचारों की स् वतंत्र ता , चिरत्र की दृढ़ता , कम की ईमानदारी और सकारात् मक पिरवत न का संकल् प है। यिद इन किवताओं को पढ़कर कोई युवा अपने जीवन का उ ेश् य खोजने क े िलए प ेिरत होता है , यिद कोई िव ाथ किठनाइयों क े बीच भी हार न मानने का िनश् चय करता है , यिद कोई नागिरक अन् याय क े िवरु द्ध संवैधािनक और नैितक साहस क े साथ खड़ा होने की प ेरणा पाता है , तो इस पुस् तक का उ ेश् य सफल होगा। मैं मानता हूँ िक कलम क े वल शब् द नही ं िलखती , वह समय की चेतना भी िलखती है। किवता क े वल भावनाओं की अिभव् यि त नही ं , बिल् क समाज क े िववेक को जगाने का माध् यम भी है। इसिलए इस संग ह का प त् येक शब् द युवाओं क े आत् मिवश् वास , आत् मसम् मान और रा िनम ण की भावना को समिप त है। आइए , हम िशकायतों से अिधक समाधान की बात करें। िनराशा से अिधक आशा की बात करें। िवभाजन से अिधक एकता की बात करें। क े वल सपने देखने क े बजाय उन् हें साकार करने का साहस जुटाएँ। पिरवत न िकसी और से नही ं , हमसे शुरू होता है। यिद इस पुस् तक की कोई किवता िकसी थक े हुए मन में आशा जगा दे , िकसी डरे हुए हृ दय में साहस भर दे , िकसी भटक े हुए कदम को सही िदशा दे , या िकसी युवा क े भीतर समाज और रा क े प ित उत्त रदाियत् व की भावना को और प बल कर दे , तो यही इस पुस् तक की सबसे बड़ी उपलिब् ध होगी। आइए , अपने िवचारों को स् वतंत्र , अपने चिरत्र को दृढ़ , अपने कम को ेष् ठ और अपने संकल् प को अिडग बनाकर एक ऐसे भिवष् य का िनम ण करें िजस पर आने वाली पीिढ़याँ गव कर सक े ं । ांित का आरंभ बाहर नही ं , भीतर होता है। जब िवचार जागते हैं , तभी इितहास बदलता है। — रु पेश रंजन लेखक क े बारे में रु पेश रंजन एक स् वतंत्र शोधकत , लेखक , किव और सामािजक िचंतक हैं। िव ान , प ौ ोिगकी , समाज , अथ व् यवस् था , इितहास , दश न , रा िनम ण और समकालीन मु ों पर उनकी गहरी रु िच और िनरंतर अध् ययन उनकी लेखनी को एक िविशष् ट पहचान प दान करता है। उन् होंने रा ीय प ौ ोिगकी सं स् थान (NIT), पटना से बी टेक तथा मोतीलाल नेह रू रा ीय प ौ ोिगकी सं स् थान (MNNIT), प यागराज से एम बी ए की िश ा प ाप् त की है। तकनीकी पृष् ठभूिम क े साथ - साथ सािहत् य और सामािजक िचंतन क े प ित उनका समप ण उन् हें बहुआयामी लेखक बनाता है। रु पेश रंजन ने िविभन्न िवषयों पर 40 से अिधक पु स् तकों का लेखन िकया है। उनकी रचनाओं में शोधपरक दृिष् ट , मानवीय संवेदनाएँ , रा ीय चेतना और सामािजक पिरवत न की आकां ा का सशक् त समन् वय िदखाई देता है। उनकी किवताएँ क े वल भावनाओं की अिभव् यिक् त नही ं , बिल् क आत् मिवश् वास , नैितक साहस , सामािजक उत्त रदाियत् व और सकारात् मक पिरवत न का संदेश भी देती हैं। " युवा ांित : बदलाव की आग " उनकी ऐसी काव् य - क ृ ित है जो युवाओं क े भीतर िछपी ऊज , संकल् प और रा िनम ण की भावना को जागृत करने का प यास करती है। इस संग ह की किवताएँ अन् याय क े िवरु द्ध संवैधािनक और नैितक साहस , सत् य , ईमानदारी , पिरश्र म , आत् मसम् मान और जन - जागरण की प ेरणा देती हैं। यह पुस् तक युवा शिक् त को रचनात् मक पिरवत न की िदशा में आगे बढ़ने का आ ान करती है। लेखक का िवश् वास है िक िकसी भी रा की सबसे बड़ी शिक् त उसक े जागरू क नागिरक और उसक े प ेिरत युवा होते हैं। जब िवचार स् वतंत्र होते हैं , चिरत्र दृढ़ होता है और कम ईमानदार होते हैं , तभी समाज स् थायी प गित की ओर अग सर होता है। रु पेश रंजन की लेखनी का उ ेश् य क े वल सािहत् य रचना नही ं , बिल् क िवचारों को जागृत करना , संवाद को प ोत् सािहत करना और एक अिधक न् यायपूण , समावेशी तथा प गितशील समाज क े िनम ण में सकारात् मक योगदान देना है। पु स् तक क े बारे में " युवा ांित : बदलाव की आग " क े वल एक किवता - संग ह नही ं , बिल् क जागरू कता , आत् मिवश् वास और सकारात् मक पिरवत न का घोष है। यह पुस् तक उस युवा पीढ़ी को समिप त है जो अपने सपनों को क े वल शब् दों तक सीिमत नही ं रखना चाहती , बिल् क उन् हें कम , साहस और समप ण क े माध् यम से वास् तिवकता में बदलने का संकल् प रखती है। इस संग ह की तीस किवताएँ युवाओं क े भीतर िछपी ऊज , स् वािभमान और उत्त रदाियत् व को जागृत करने का प यास करती हैं। प त् येक किवता जीवन की चुनौितयों से जूझने , अन् याय क े सामने साहसपूव क खड़े होने , िनराशा को आशा में बदलने और रा तथा समाज क े प ित अपने दाियत् व को समझने की प ेरणा देती है। इन रचनाओं में संघष है , लेिकन िनराशा नही ं ; आ ोश है , लेिकन घृणा नही ं ; पिरवत न की तीव आकांक्ष ा है , लेिकन उसका माग िवचार , संवैधािनक मूल् यों , सत् य , नैितक साहस और रचनात् मक कम से होकर ग ुजरता है। आज का युवा अनेक चुनौितयों क े बीच अपना भिवष् य गढ़ रहा है। बेरोज ़ गारी , भ ष् टाचार , सामािजक असमानता , नैितक संकट , पय वरणीय चुनौितयाँ , तकनीकी बदलाव और तेज ़ ी से बदलती दुिनया उसक े सामने किठन प श् न खड़े करती हैं। यह पुस् तक इन समस् याओं का क े वल उल् लेख नही ं करती , बिल् क पाठक को यह िवश् वास भी िदलाती है िक पिरवत न की सबसे बड़ी शिक् त जागरू क नागिरक , सशक् त िवचार और सतत कम हैं। इस संग ह की किवताएँ रा प ेम को संकीण ता नही ं , बिल् क मानवता , न् याय , समान अवसर , ईमानदारी , करु णा और लोकतांित्र क मूल् यों क े साथ जोड़ती हैं। इनमें युवा शिक् त को समाज क े िनम ण , िशक्ष ा , िव ान , नवाचार , सेवा , संवेदनशीलता और नैितक नेतृत् व की िदशा में आगे बढ़ने का संदेश िदया गया है। पुस् तक का उ ेश् य पाठकों में ऐसा आत् मिवश् वास जगाना है जो उन् हें किठन पिरिस् थितयों में भी सत् य और न् याय क े माग पर अिडग रहने की प ेरणा दे। " युवा ांित : बदलाव की आग " उन सभी पाठकों क े िलए है जो मानते हैं िक इितहास क े वल पढ़ा नही ं जाता , बिल् क साहस , चिरत्र और सतत प यास से िलखा भी जाता है। यह पुस् तक िव ािथ यों , युवाओं , िशक्ष कों , सामािजक काय कत ओं , सािहत् य प ेिमयों और उन सभी नागिरकों क े िलए समान रू प से प ेरणा ोत बनने का प यास है जो एक अिधक न् यायपूण , समावेशी , प गितशील और मानवीय समाज क े िनम ण में अपनी भूिमका िनभाना चाहते हैं। यिद इस पुस् तक की कोई किवता िकसी युवा क े मन में आत् मिवश् वास जगा सक े , िकसी पाठक को िनराशा से बाहर िनकलने की शिक् त दे सक े , िकसी नागिरक को समाज क े प ित अपने दाियत् व का स् मरण करा सक े , या िकसी व् यिक् त को सत् य , पिरश्र म और सकारात् मक पिरवत न क े माग पर आगे बढ़ने क े िलए प ेिरत कर सक े , तो यही इस क ृ ित की सबसे बड़ी सफलता होगी। यह पु स् तक एक संदेश है — बदलाव िकसी और का इंतज ़ ार नही ं करता। जब युवा जागता है , तभी समाज बदलता है ; और जब समाज बदलता है , तभी इितहास एक नया अ ध् याय िलखता है। पु स् तक का प स् तािवत शीष क " युवा ांित : बदलाव की आग " लेखक : रु पेश रंजन िवषय - सूची (30 प े रणादायक एवं ांितकारी किवताएँ ) 1. अब बस बहुत हुआ 2. उठो नौजवान 3. खून अभी िज ़ ं दा है 4. ांित की मशाल 5. डर क े उस पार 6. व ़ त तु म् हें पुकार रहा है 7. तूफ ़ ानों से दो स् ती कर लो 8. झुकना हमें मंज ़ ू र नही ं 9. हम इितहास िलखेंगे 10. जब युवा जागता है 11. सपनों की नही ं , संघष की बात करो 12. िसंहासन िहलने दो 13. वतन की पुकार 14. मौत से मत डर 15. बदलाव का िबग ुल 16. लहू की आिख ़ री बूँद तक 17. आग बनो , राख नही ं 18. नई सुबह का सैिनक 19. अंधेरों क े िखलाफ ़ यु द्ध 20. इंक ़ लाब का सफ ़ र 21. हम चुप नही ं रहेंगे 22. कलम और कम की ांित 23. ताज नही ं , पिरवत न चािहए 24. जब जनता उठ खड़ी होगी 25. मेरी आवाज ़ हिथयार है 26. युवाओं का घोषणा - प त्र 27. ज ़ ं जीरें टूटेंगी 28. एक नया भारत गढ़ेंगे 29. िवजय हमारा अिधकार है 30. ांित अभी बाकी है अ ध् याय 1 : अब बस बहुत हुआ अब बस बहुत हुआ , चुि पयों का यह लंबा सफ ़ र , अब शब् दों को तलवार नही ं , सत् य का उजाला बनना होगा। अब बस बहुत हुआ , डर की दीवारों क े पीछे जीना , अपने ही सपनों से हारना , अपनी ही शि त को भूल जाना। युवाओं ! समय तुम् हें पुकार रहा है , इितहास की धड़कनें तुम् हारे कदमों की आहट सुनना चाहती हैं। यह धरती कायरों की कहानी नही ं िलखती , यह उन् ही ं क े नाम याद रखती है जो किठन रास् तों पर भी मुस् कुराकर चलते हैं। मत पूछो िकतनी अँधेरी है यह रात , अपने भीतर एक दीप जलाओ , रात स् वयं हार जाएगी। मत िगनो िकतनी ऊ ँ ची हैं दीवारें , पहले अपने इरादों को ऊ ँ चा करो , दीवारें छोटी पड़ जाएँगी। यिद व् यवस् था में किमयाँ हैं , तो िशकायत से पहले स् वयं को बदलने का साहस पैदा करो। यिद समाज में अन् याय है , तो नफ ़ रत मत बोओ , न् याय , संवेदना और साहस की फसल उगाओ। ांित का अथ क े वल नारों की गूँज नही ं , ांित वह है जब चिरत्र िबकना बंद हो जाए। ांित वह है जब ईमानदारी शम नही ं , सम् मान बन जाए। ांित वह है जब युवा यह कहे — मैं िरश् वत नही ं दूँगा , मैं िरश् वत नही ं लूँगा। मैं झूठ क े सामने िसर नही ं झुकाऊ ँ गा। मैं जाित से पहले मानवता को पहचानूँगा। मैं धम से पहले कत व् य िनभाऊ ँ गा। मैं अिधकार माँगूँगा , पर अपने कत व् यों से कभी नही ं भागूँगा। अब बस बहुत हुआ , नफ ़ रत की राजनीित , झूठ का व् यापार , और सपनों की नीलामी। अब समय है ान को हिथयार बनाने का। अब समय है िव ान को िवकास का आधार बनाने का। अब समय है िशक्ष ा को हर घर तक पहुँचाने का। अब समय है बेिटयों को समान अवसर देने का। अब समय है प क ृ ित को बचाने का। अब समय है कमज ़ ोर का हाथ थामने का। याद रखो — देश क े वल सीमाओं से नही ं बनता , देश अपने नागिरकों क े चिरत्र से बनता है। रा क े वल इमारतों से नही ं बनता , रा िवश् वास से बनता है। भिवष् य क े वल योजनाओं से नही ं बदलता , भिवष् य कम से बदलता है। यिद तुम बदलोगे , तो पिरवार बदलेगा। पिरवार बदलेगा , तो समाज बदलेगा। समाज बदलेगा , तो देश बदलेगा। और जब देश बदलेगा , तो दुिनया भी बदलेगी। युवाओं ! अपने भीतर सोए हुए िवश् वास को जगाओ। अपने सपनों को सुिवधाओं की क ै द से आज ़ ाद करो। हार को िशक्ष क बनाओ। संघष को िमत्र बनाओ। अनुशासन को आदत बनाओ। सेवा को सम् मान बनाओ। और सत् य को अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाओ। तुम् हारे हाथों में क े वल मोबाइल नही ं , एक युग का भिवष् य भी है। तुम् हारी आँखों में क े वल सपने नही ं , एक नए भारत की तस् वीर भी है। तुम् हारी आवाज ़ में क े वल शब् द नही ं , करोड़ों लोगों की आशाएँ भी हैं। उठो ! अपने भीतर की आग को पहचानो। अपने िववेक को जगाओ। अपनी प ितभा को रा क े नाम समिप त करो। इितहास तुम् हारा इंतज ़ ार नही ं करेगा। समय िकसी क े िलए नही ं रु कता। जो आज जागता है , वही कल िदशा देता है। इसिलए — आज ही संकल् प लो , हम सत् य क े साथ चलेंगे। हम संिवधान और मानवता क े मूल् यों का सम् मान करेंगे। हम मेहनत को अपना धम बनाएँगे। हम ान को अपनी शि त बनाएँगे। हम एक ऐसे भारत क े िनम ण में योगदान देंगे जहाँ न् याय , समान अवसर , करु णा और ईमानदारी िसफ ़ शब् द नही ं , जीवन का आधार हों। और िफर पूरी दुिनया से कहेंगे — अब बस बहुत हुआ। अब पिरवत न होगा। अब युवा जाग चुका है। अब भिव ष् य हमारी प ती क्ष ा नही ं करेगा — हम स् वयं भिव ष् य का िनम ण करेंगे। अ ध् याय 2 उठो नौजवान उठो नौजवान , ि ितज तुम् हें पुकार रहा है , समय की धड़कनों में तुम् हारे कदमों की आहट गूँज रही है। उठो , क् योंिक इितहास प ती ा नही ं करता , वह उन् ही ं क े नाम िलखता है जो सपनों को कम में बदल देते हैं। कब तक देखोगे दूसरों क े बनाए रास् ते ? कब तक कहोगे — " कोई आएगा और सब बदल देगा ?" सुनो ! कोई और नही ं आएगा। तुम् ही ं वह पीढ़ी हो िजसे भिवष् य ने चुना है। तुम् ही ं वह दीप हो िजसे अँधेरों क े बीच जलना है। तुम् ही ं वह बीज हो िजससे आने वाला कल जन् म लेगा। डर को अपने दरवाज ़ े पर छोड़ दो। संदेह को अपनी राह से हटा दो। हार को अपनी पहचान मत बनने दो। संघष को अपना ग ुरु बना लो। याद रखो — निदयाँ च ानों से टकराकर अपना रास् ता बनाती हैं। बाज ़ आँिधयों से भागते नही ं , उन् ही ं हवाओं पर उड़ना सीखते हैं। सोना आग में तपकर ही कु ं दन बनता है। और इंसान िवपि यों से जूझकर ही महान बनता है। यिद मंिज ़ ल ऊ ँ ची है , तो पसीना भी बहाना होगा। यिद पिरवत न चािहए , तो स् वयं बदलना होगा। यिद सम् मान चािहए , तो पहले चिरत्र गढ़ना होगा। युवा ! अपने हाथों को िसफ ़ ताली बजाने क े िलए नही ं , िनम ण करने क े िलए तैयार करो। अपनी आँखों को िसफ ़ सपने देखने क े िलए नही ं , उन् हें साकार करने क े िलए जगाओ। अपनी आवाज ़ को िसफ ़ िशकायत तक सीिमत मत रखो , उसे समाधान का माध् यम बनाओ। तुम् हारी िश ा िसफ ़ नौकरी पाने क े िलए नही ं , समाज को िदशा देने क े िलए है। तुम् हारा ान िसफ ़ प माणपत्र नही ं , रा की सबसे बड़ी पूँजी है। तुम् हारी ऊज िसफ ़ तुम् हारी नही ं , आने वाली पीिढ़यों की धरोहर है। उठो नौजवान , क् योंिक खेत तुम् हें बुला रहे हैं। प योगशालाएँ तुम् हें बुला रही हैं। िव ालय तुम् हें बुला रहे हैं। सीमाएँ तुम् हें बुला रही हैं। अस् पताल तुम् हें बुला रहे हैं। न् यायालय तुम् हें बुला रहे हैं। कारखाने तुम् हें बुला रहे हैं। गाँव और शहर दोनों तुम् हारी प ती ा कर रहे हैं। जहाँ अ ान है , वहाँ ान लेकर जाओ। जहाँ िनराशा है , वहाँ आशा बनकर जाओ। जहाँ अन् याय है , वहाँ साहस क े साथ खड़े हो जाओ। जहाँ िवभाजन है , वहाँ संवाद और सद्भाव लेकर जाओ। जहाँ अंधिवश् वास है , वहाँ िववेक की मशाल जलाओ। याद रखो — देशभिक् त क े वल नारों में नही ं , ईमानदार कम में िदखाई देती है। ांित क े वल भाषणों से नही ं , चिरत्र से जन् म लेती है। िवजय क े वल इच् छा से नही ं , अनुशासन से िमलती है। यिद िगरो , तो उठना सीखो। यिद हारो , तो सीखना सीखो। यिद थको , तो उ ेश् य याद करो। और यिद अक े ले रह जाओ , तो सत् य का साथ कभी मत छोड़ो। युवा ! तुम् हारी सबसे बड़ी ताक ़ त तुम् हारी उम नही ं , तुम् हारा दृिष् टकोण है। तुम् हारा सबसे बड़ा हिथयार ोध नही ं , तुम् हारा ान है। तुम् हारी सबसे बड़ी पहचान तुम् हारा नाम नही ं , तुम् हारा कम है। चलो , ऐसा भारत बनाएँ जहाँ अवसर जन् म से नही ं , योग् यता से िमले। जहाँ सम् मान धन से नही ं , ईमानदारी से िमले। जहाँ प गित क े वल कुछ लोगों की नही ं , हर नागिरक की हो। जहाँ िव ान और संवेदना साथ - साथ आगे बढ़ें। जहाँ संिवधान क े आदश जीवन का व् यवहार बनें। जहाँ हर बच् चा सपने देखने का अिधकार रखे। जहाँ हर बेटी िनभ य होकर उड़ सक े । जहाँ हर युवा अपनी प ितभा से देश का भिवष् य गढ़ सक े । तो उठो नौजवान ! समय की पुकार सुनो। अपने भीतर क े संदेह को हराओ। अपने िवचारों को ऊ ँ चा उठाओ। अपने कम को महान बनाओ। और ऐसा जीवन िजयो िक आने वाली पीिढ़याँ कहें — " यही वह पीढ़ी थी , िजसने िशकायतों का युग समा प् त िकया , कत व् य का युग शु रू िकया , और अपने साहस , स त् य तथा पिर श्र म से एक नए भारत की नी ंव रखी। " अ ध् याय 3 खून अभी िज ़ ं दा है खून अभी िज ़ ं दा है , रगों में िसफ ़ रक् त नही ं , सिदयों क े सपनों की धारा बह रही है। हर धड़कन कह रही है — अभी हारना नही ं। आँिधयाँ चाहे िजतनी तेज ़ हों , हमने पव तों से अिडग रहना सीखा है। समुद चाहे िकतना भी गहरा हो , हमने िक्ष ितज तक तैरना सीखा है। हमें मत समझो िक हम थक गए हैं। हमारी ख ़ ामोशी को कमज ़ ोरी मत समझो। जब युवा मौन रहता है , वह सोच रहा होता है। और जब सोच जागती है , तो इितहास करवट बदलता है। हमारे हाथों में क े वल भिवष् य नही ं , पूरे रा की आशाएँ हैं। हमारी आँखों में क े वल सपने नही ं , एक नए युग का सूय दय है। हमारे कदमों में क े वल गित नही ं , पिरवत न की िदशा िछपी है। खून अभी िज ़ ं दा है। इसिलए हम झूठ से समझौता नही ं करेंगे। हम भ ष् टाचार को अपनी िनयित नही ं मानेंगे। हम अन् याय को अपना भाग् य नही ं कहेंगे। हम डर क े कारण सत् य का साथ नही ं छोड़ेंगे। हम नफ ़ रत क े बदले संवाद चुनेंगे। िवभाजन क े बदले एकता का माग चुनेंगे। िहंसा क े बदले िवचारों की शिक् त चुनेंगे। क् योंिक हम जानते हैं — सबसे बड़ी ांित मनुष् य क े भीतर जन् म लेती है। िजस िदन चिरत्र जागता है , उसी िदन समाज बदलना शुरू हो जाता है। िजस िदन युवा अपने स् वाथ से ऊपर उठता है , उसी िदन रा आगे बढ़ता है। हमारे लहू में पिरश्र म की गम है। हमारी साँसों में आत् मिवश् वास की लय है। हमारे इरादों में असंभव को संभव बनाने का साहस है। हम िगरेंगे , पर रु क े ं गे नही ं। हम हारेंगे , पर टूटेंगे नही ं। हम थक े ं गे , पर अपने लक्ष् य से मुँह नही ं मोड़ेंगे। क् योंिक खून अभी िज ़ ं दा है। युवा सािथयों ! िकताबों को अपना िमत्र बनाओ। ान को अपनी ढाल बनाओ। िव ान को अपनी शिक् त बनाओ। संिवधान क े आदश ं को अपने आचरण का आधार बनाओ। देशभिक् त का अथ क े वल जयघोष नही ं , ईमानदारी से अपना काय करना भी है। िकसान का सम् मान , मज ़ दूर का सम् मान , िशक्ष क का सम् मान , वै ािनक का सम् मान , सैिनक का सम् मान , हर ईमानदार नागिरक का सम् मान — यही सच् चे रा िनम ण की पहचान है। आओ , ऐसी पहचान बनाएँ िजस पर आने वाली पीिढ़याँ गव करें। ऐसा समाज बनाएँ जहाँ अवसर सबको िमले। जहाँ मेहनत का मूल् य हो। जहाँ प ितभा को पहचान िमले। जहाँ बेिटयाँ िनभ य होकर आगे बढ़ें। जहाँ कोई बच् चा भूख या भय क े कारण अपने सपनों से वंिचत न रहे। जहाँ पय वरण िवकास का शत्र ु नही ं , उसका साथी बने। जहाँ तकनीक मानवता की सेवा करे। जहाँ राजनीित