शीषर्क: िसंहनाद उपशीषर्क: राष्ट ्र प्र े म, स् वािभमान और जागृत चेतना की ओजस्वी किवताएँ लेखक: रु पेश रंजन लेखक पिरचय रु पेश रंजन एक लेखक, किव और स् वतंत्र शोधकतार् हैं। वे सामािजक चेतना, राष्ट ्र िनमार्ण, इितहास, दशर्न, िवज्ञान, अथर्व्यवस्था और समकालीन िवषयां पर गंभीर अध्ययन एवं लेखन क े िलए जाने जाते हैं। उनकी लेखनी का मूल उद्द े श् य क े वल िवचार प्र स् तुत करना नहीं, बिल्क पाठकां क े भीतर सकारात्मक पिरवतर्न, आत्मिवश्वास, कतर्व्यबोध और राष्ट ्र प्र े म की भावना जगाना है। रु पेश रंजन ने राष्ट ्र ीय प्र ौद्योिगकी संस्थान (NIT) पटना से बी.टेक. तथा मोतीलाल नेहरू राष्ट ्र ीय प्र ौद्योिगकी संस्थान (MNNIT) इलाहाबाद से एम.बी.ए. की उपािध प्र ाप्त की है। तकनीकी और प्र बंधकीय िशक्षा क े साथ- साथ सािहत्य, समाज और सावर्जिनक नीित मं उनकी गहरी रु िच उनक े लेखन को बहुआयामी दृ िष्ट प्र दान करती है। उन्हांने िविभन्न िवषयां पर 40 से अिधक पुस्तकां का लेखन िकया है। उनकी रचनाआं मं राष्ट ्र प्र े म, सामािजक उत्तरदाियत्व, मानवता, समानता, िशक्षा, ग्र ामीण िवकास, िवज्ञान, क ृ ित्रम बुिद्धमत्ता, क ृ िष, अथर्शास्त्र और नैितक मूल्यां जैसे िवषय प्र मुखता से उभरते हैं। उनकी किवताएँ ओज, संवेदना और जागृत चेतना का संगम हैं तथा युवाआं को आत्मसम्मान, अनुशासन, पिरश्रम और राष्ट ्र सेवा क े िलए प्र े िरत करती हैं। रु पेश रंजन का िवश्वास है िक िकसी भी राष्ट ्र की वास्तिवक शिक्त उसक े नागिरकां क े चिरत्र, ज्ञ ान, पिरश्रम और नैितक मूल्यां मं िनिहत होती है। इसी िवचारधारा को उन्हांने अपनी रचनाआं का आधार बनाया है। "िसंहनाद" उनकी एेसी ही एक क ृ ित है, जो साहस, स् वािभमान, कतर्व्य, राष्ट ्र प्र े म और जागृत चेतना का ओजस्वी आह्वान करती है। यह संग्रह पाठकां को िनराशा से आशा, भय से साहस और िनिष्क्रयता से कमर् की ओर प्र े िरत करने का िवनम्र प्र यास है। — रु पेश रंजन इस किवता- संग्रह के बारे में "यह केवल किवताओें का संग्रह नहीं, बिल्क जागृत चेतना की ओवाज़ है।" इस संग्रह की प्र त् येक किवता साहस, स् वािभमान, राष्ट ्र प्र े म, कतर्व्य, त् याग, संघषर् और आत्मसम्मान की भावना से प्र े िरत है। इन रचनाआं का उद्द े श् य िनराशा मं आशा, भय मं साहस और िनिष्क्रयता मं कमर् की चेतना जगाना है। यहाँ व्य क् त "क्रांित" का अथर् िहंसा नहीं, बिल्क िवचारां, चिरत्र, अनुशासन, इर्मानदारी और राष्ट ्र िनमार्ण की क्र ांित है। इन किवताआं मं िहंदी और उदू र् क े प्र भावशाली शब्दां का संयोजन भावनाआं को गहराइर् और ओज प्र दान करता है। प्र त् येक पंिक्त पाठक को अपने भीतर झाँकने, अपने कतर्व्यां को पहचानने और समाज तथा राष्ट ्र क े प्र ित उत्तरदाियत्व का बोध कराने का प्र यास करती है। यह संग्रह िवशेष रू प से उन युवाआं, िवद्यािथंयां, कमर्योिगयां और जागरूक नागिरकां को समिपंत है, जो क ेवल पिरवतर्न की प्र तीक्षा नहीं करते, बिल्क स् वयं पिरवतर्न का माध्यम बनने का साहस रखते हैं। यिद इन किवताआं को पढ़ने क े बाद िकसी पाठक क े भीतर सत्य क े प्र ित िनष्ठा, अन्याय क े िवरुद्ध खड़े होने का नैितक साहस, राष्ट ्र िहत क े प्र ित समपर्ण और मानवता क े प्र ित करुणा का भाव जागृत होता है, तो यही इस संग्रह की सबसे बड़ी सफलता होगी। आइए, शब्दां को क े वल पढ़ ं नहीं — उन्हं अपने चिरत्र, अपने कमर् और अपने जीवन का िहस्सा बनाएँ। क् यांिक इितहास उन्हीं को याद रखता है जो किठन समय मं भी अपने मूल्यां से समझौता नहीं करते। यह संग्रह एक संदेश है — डर नहीं, साहस चुिनए। घृणा नहीं, मानवता चुिनए। िशकायत नहीं, िनमार्ण चुिनए। और अपने जीवन को राष्ट ्र , समाज तथा ओने वाली पीिढ़याें के िलए प्र े रणा बनाइए। अब बस बहुत हु आ अब बस बहुत हु आ, अब और नहीं सहेंगे। अन्याय की हर दीवार से, सीना तानकर कहेंगे। डर की हर बेड़ी टूटेगी, झूठ का हर िसंहासन डोलेगा। िजसने मानवता को बाँटा है, वह अपने ही बोझ से रोएगा। मार दो — यिद यही तुम्हारा उत्तर है, स् वीकार है हमें वह प्र हार भी। पर याद रहे, िवचाराें का रक्त कभी नहीं बहता, वह बन जाता है अगली पीढ़ी की िचंगारी। अब न मरेंगे बार- बार, हर रोज़ थोड़ा- थोड़ा नहीं। जीएँगे पूरे स् वािभमान से, झुक ें गे िकसी भय क े आगे नहीं। हमारे हाथाें में पत्थर नहीं, सत्य की मशाल होगी। हमारे शब्दाें में नफ़रत नहीं, पिरवतर्न की हु ं कार होगी। जो आँिधयाँ हमें डराती थीं, अब वही हमारी राह बनेंगी। जो ज़ ं जीर ें हमें बाँधती थीं, अब वही िवजय की धुन कहेंगी। हम लड़ेंगे — हिथयाराें से नहीं, अपने चिरत्र की शिक्त से। हम जीतेंगे — घृणा से नहीं, अपने अटूट साहस की भिक्त से। हर िगरती हु ई र् उम्मीद को, हम िफर से आकाश देंगे। हर टूटे हु ए ईंसान को, जीने का िवश्वास देंगे। क्र ांित क ेवल तलवार नहीं, क्र ांित एक जागा हु आ िववेक है। जब जन- जन अन्याय क े िवरुद्ध खड़ा हो जाए, वहीं सच्चे पिरवतर्न का आरंभ है। तो उठो, अपने भीतर क े सूयर् को पहचानो। डर क े अंधेराें से िनकलकर, अपने अिस्तत्व का सम्मान जानो। अब बस बहुत हु आ — ईितहास नया िलखना होगा। हर अन्याय क े सामने सत्य का दीपक रखना होगा। यिद संघषर् ही भाग्य िलखा है, तो मुस्क ु राकर उसे स् वीकार करेंगे। पर याद रहे — हम टूट सकते हैं, िबक नहीं सकते। अब बस बहुत हु आ... अब नहीं करेंगे अन्याय का समझौता। जीवन एक ही बार िमलता है — उसे झुककर नहीं, स् वािभमान क े साथ िजएँगे। तमाशा नहीं, इितहास बनना है मौत की महिफ़ल सजा दो, यिद सत्य की यही कीमत है। पर याद रहे — झुककर जीने से बेहतर, स् वािभमान की इबादत है। हमें तमाशा नहीं बनना, हमें इितहास बनना है। इस िमट्टी की हर साँस में, एक नया िवश्वास बनना है। जब सीमा पर बादल गरजें, हम वज्र बनकर खड़े रहेंगे। जब संकट देश को ललकारे, हम पवर्त बनकर अड़े रहेंगे। हमने गंगा का जल िपया है, िहमालय का अिभमान िलया है। भारत माँ की इस धरती से, जीने का वरदान िलया है। न तलवाराें का मोह हमें, न सत्ता का अिभमान चािहए। बस इतना सम्मान रहे — भारत का ऊ ँचा मान चािहए। यिद चलना है, तो आगे चलो, रास्ताें से मत घबराना। जो राष्ट ्र क े िलए जी उठे, उसे कोइर् नहीं हरा पाना। दीप बनो उस अँधेरे में, जहाँ उम्मीद ें बुझ जाती हैं। वृक्ष बनो उस बंजर में, जहाँ पीिढ़याँ सूख जाती हैं। क्र ांित का अथर् िवनाश नहीं, क्र ांित जागृत िवचार है। राष्ट ्र प्र े म का अथर् यही — हर नागिरक से प् यार है। चलो उठें, संकल्प करें, भारत को और महान बनाएँ। जाित, धमर्, भाषा से ऊपर, मानवता का ध् वज लहराएँ। यिद नाम िलखाना है जग में, तो कमर् की पहचान बनो। क्ष िणक तमाशा नहीं, युगाें तक गूँजता िहंदुस्तान बनो। वतन पुकारे जब भी हमको, हम मुस्काकर उत्तर देंगे — "तन, मन, श्र म सब अिपंत हैं, भारत! तुझ पर जीवन देंगे।" अब मौत का डर कैसा अब मौत का डर क ै सा, जब िज़ंदगी ही सवाल बन गई है। हर उम्मीद धूल में िबखरकर, एक अधूरी िमसाल बन गई है। हमारे सपनाें का मज़ाक उड़ा, हमारी ख़ ामोशी नीलाम हु ई । जो कल तक मंिज़ल कहते थे, आज वही राहें गुमनाम हु ई ं । हम जीते- जी बुत बन बैठे, चेहरे पर मुस्कानाें का पहरा है। भीतर ज् वालामुखी जलता है, बाहर बस ख़ ामोशी का सवेरा है। लेिकन सुन लो एे वक़्त! हम राख नहीं, अंगार हैं। िजतना दबाओगे हमें, उतना ही प्र चंड हु ं कार हैं। तूफ़ानाें से डरकर जो रु क जाएँ, हम वो किश्तयाँ नहीं। िगरकर िफर न उठ सक ें, हम एेसी हिस्तयाँ नहीं। हमारे िहस्से की हर ठोकर, हमारी ताक़त बन जाएगी। आज जो हँसते हैं हम पर, कल वही कहानी गाएगी। हमने हार को हिथयार बनाया है, आँसुआें को तलवार बनाया है। िजस दद ने तोड़ना चाहा हमें, उसी दद को आधार बनाया है। अब मंिज़ल दू र सही, पर क़ दम नहीं रु क ें गे। जब तक साँसाें में आग बचेगी, हम हर अँधेरे से लड़ेंगे। क् याेंिक ईंसान की पहचान उसकी आसान राह नहीं होती; ईितहास उन्हीं का िलखा जाता है, िजनकी रगाें में हार नहीं होती। तो आओ, िफर से उठें — अपनी तक़दीर ख़ ु द िलखें। जो सपना कभी उपहास बना था, उसे आने वाले कल की तक़दीर िलखें। अब मौत का डर क ै सा — डर तो उस िदन होगा, िजस िदन िबना लड़े हम अपनी उम्मीदाें से हार जाएँगे। हम नहीं झुक ें गे। हम नहीं रु क ें गे। हम नहीं बुझेंगे। जब तक सीने में एक भी साँस है, हम अपने सपनाें की लौ बनकर हर अँधेरे को चुनौती देते रहेंगे। अब ख़ ामोशी गुनाह है अब ख़ ामोशी गुनाह है, क ु छ कहना पड़ेगा, हर ज़ ं जीर को एक िदन टूटना पड़ेगा। ज़ ु ल् म चाहे िकतना ही बुलंद क् यां न हो, सच को एक िदन उभरना पड़ेगा। हमारी रगां मं अभी भी जुनून बाक़ी है, हमारे लहजे मं इंक़लाब की धुन बाक़ी है। न सर झुक ेगा, न इ0मान िबक े गा, हर अँधेरा एक िदन ज़ रू र छँटेगा। हम फ़ क़ त तमाशबीन नहीं बनंगे, हम अपने दौर की पहचान बनंगे। अब सब्र की इंितहा है अब सब्र की इंितहा है, अब फ़ ै सला होना चािहए, हर ज़ मीर को अपने वजूद पर रोना चािहए। जो ख़ ामोश हैं, उन्हें भी आवाज़ बनना होगा, हर टूटे हु ए ख़् वाब को परवाज़ बनना होगा। यह वक़्त झुकने का नहीं, इरादे बुलंद करने का है, हर ज़ ु ल् म क े सामने सच का परचम करने का है। हम िबक ेंगे नहीं, यह एहद हमारा है, वतन से बढ़कर न कोइ6 ख़् वाब हमारा है। जो अपने वक़्त का हक़ अदा कर जाए, वही इितहास में अमर कहलाए। वक़्त का तक़ाज़ा वक़्त का तक़ाज़ा है, अब उठना होगा, हर मायूस िदल को िफर से जुड़ना होगा। तूफ़ानां से डरकर सफ़र नहीं रु कते, इरादे कभी मुिश्कलां से नहीं झुकते। जो अपने ज़ मीर से समझौता कर ले, वो िज़ंदा होकर भी मर ले। चलो ऐेसा िकरदार िनभाऐँ, िक सिदयाँ हमारा नाम गुनगुनाऐँ। वतन की शान मं अपना कमर् िलख जाऐँ, और मुस्क ु राकर हर इिम्तहान िनभाऐँ। यह मुल्क पुकारता है यह मुल्क पुकारता है, कौन आगे आएगा? कौन अपने िहस्से का फ़ ज़ र् िनभाएगा? िमट्टी की ख़ ु शबू क़ ज़ र् दार करती है, हर साँस हमें होिशयार करती है। न दौलत का नशा, न शोहरत का गुमान, बस वतन का रहे िदल में अरमान। हमारी पहचान हमारा िकरदार होगा, हर मुिश्कल में बुलंद हमारा व्य वहार होगा। जो अपने वतन पर ईर्मान रखता है, वही असल में आसमान रखता है।