प्रेम के मौसम 42 प्र े म किवताओं का एक भावपूणर् िहंदी काव्य- संग्रह लेखक: Rupesh Ranjan भूिमका प ेम को शब् दों में बाँधना शायद दुिनया का सबसे किठन काम है। प ेम िजतना कहा जाता है , उससे कही ं अिधक महसूस िकया जाता है। वह कभी िकसी की आँखों में िदखाई देता है , कभी िकसी मुस् कान में ठहर जाता है , कभी बािरश की पहली बूंद बनकर मन को छूता है और कभी लंबी गिम यों में िकसी ठंडी छाँव की तरह जीवन को सुक ू न देता है। प ेम कोई एक क्ष ण नही ं , बिल् क उन असंख् य क्ष णों का सुंदर िवस् तार है िजनमें िकसी का होना हमारी पूरी दुिनया को बदल देता है। “ प े म क े मौसम ” इसी अनुभूित से जन् मा एक काव् य - संग ह है। यह पुस् तक क े वल प ेिमका क े िलए िलखी गई किवताओं का संग ह नही ं है। यह प ेम क े माध् यम से जीवन , प क ृ ित , ऋतुओं , शहरों , खेतों , निदयों , बािरश , धूप , सिद यों , हिरयाली , उम् मीद और भिवष् य की सुंदरता को देखने का एक प यास है। इन किवताओं में प ेम क े वल दो व् यिक् तयों क े बीच का भाव नही ं , बिल् क जीवन को अिधक सुंदर , अिधक सकारात् मक और अिधक अथ पूण बनाने वाली शिक् त है। हमारी दुिनया ऋतुओं से चलती है। लंबी गिम याँ आती हैं , तपती धूप धरती को अपनी आग से भर देती है। िफर बािरश आती है और वही धरती िम ी की सौंधी खुशबू , हिरयाली और नई फसलों से मुस् कुराने लगती है। वष क े तीन महीने सद की ठंडी सुबहें , कोहरा और धूप की तलाश लेकर आते हैं। िफर मौसम बदलता है और जीवन िफर नए रंगों में लौट आता है। मुझे लगता है , प ेम भी कुछ ऐसा ही है। कभी वह गम में छाँव बनता है , कभी बािरश में भीगी हुई स् मृित , कभी सद में हथेिलयों की गम हट और कभी वसंत में िखलते हुए फ ू लों की तरह। प ेम का अपना कोई एक मौसम नही ं होता। वह हर मौसम में अपना नया रू प खोज लेता है। इसीिलए इस संग ह में गम क े वल गम नही ं है — वह तु म् हारी छाँव की आव श् यकता है। बािरश क े वल बािरश नही ं है — वह तु म् हारे आने की आहट है। सद क े वल ठंड नही ं है — वह तु म् हारे पास बैठने की इ च् छा है। और वसंत क े वल फ ू लों का मौसम नही ं — वह हमारे भीतर िफर से ज न् म लेती उ म् मीद है। इन किवताओं में उपजाऊ मैदानी धरती भी है। वे खेत हैं िजनमें फसलें क े वल िकसान क े सपनों को नही ं , बिल् क प ेम की संभावनाओं को भी जन् म देती हैं। सरसों क े पीले फ ू ल हैं , हरी फसलें हैं , नदी का बहता पानी है , पेड़ों की छाँव है और बािरश क े बाद उठती िम ी की वह सौंधी खुशबू है जो िकसी पुराने प ेम - पत्र की तरह अचानक मन को छू जाती है। मैंने प क ृ ित को प ेम का साथी माना है। जब खेत लहलहाते हैं , तो लगता है जैसे हमारे सपने आकार ले रहे हैं। जब नदी बहती है , तो लगता है जैसे प ेम भी अपनी राह खोजते हुए आगे बढ़ रहा है। जब पेड़ छाँव देते हैं , तो मन तुम् हारे साथ िबताए उन शांत पलों को याद करता है जहाँ शब् द कम थे और अपनापन बहुत अिधक। और िफर आते हैं शहर। रोशनी से भरी सड़क े ं , शाम की चहल - पहल , िखड़की से िदखाई देती दुिनया , बािरश में चमकती सड़क े ं और रात क े आसमान क े नीचे चलते दो लोग — इन सबक े बीच प ेम अपनी एक अलग दुिनया बना लेता है। शहर िकतना भी बड़ा क् यों न हो , जब िप य साथ हो तो दुिनया छोटी और अपना - सा लगने लगती है। शायद इसी कारण इस पुस् तक में एक पंिक् त बार - बार लौटती हुई महसूस होगी — जहाँ तुम हो , वही मेरा शहर है। यह संग ह क े वल बीते हुए प ेम की स् मृितयों पर आधािरत नही ं है। इसमें अ च् छे समय की प ती क्ष ा भी है। इसमें िवश् वास है िक आने वाले िदन और सुंदर हो सकते हैं। इसमें वह सकारात् मकता है जो कहती है िक जीवन में किठन मौसम हमेशा नही ं रहते। बािरश क े बाद धरती हरी होती है , रात क े बाद सुबह आती है और लंबे इंतजार क े बाद कभी - कभी वह व् यिक् त सामने खड़ा होता है िजसक े िलए िदल ने इतने िदनों तक रास् ता देखा था। इसिलए इन किवताओं में उदासी है तो िनराशा नही ं , िवरह है तो टूटन नही ं , इंतजार है तो उम् मीद क े साथ , और प ेम है तो पूरी आत् मीयता क े साथ। “ तु म् हें िसफ प् यार नही ं करता ” जैसी भावनाएँ इसी गहराई से िनकलती हैं। िकसी को प ेम करना क े वल उसक े साथ समय िबताना नही ं है। कभी - कभी प ेम िकसी की खामोशी समझना है। उसकी मुस् कान क े पीछे िछपे भाव पढ़ना है। उसक े सपनों को अपना मानना है। उसकी खुशी में अपनी खुशी खोज लेना है। और सबसे बढ़कर , उसक े साथ रहते हुए स् वयं को अिधक पूण महसूस करना है। प ेम का सबसे सुंदर रू प शायद वही है िजसमें अिधकार से अिधक िवश् वास हो , अपेक्ष ा से अिधक अपनापन हो और शब् दों से अिधक मौन की समझ हो। इस संग ह की किवताएँ उसी प ेम को खोजती हैं। “ मेरी आ त् मा में तु म् हारा घर ” क े वल एक रोमांिटक पंिक् त नही ं , बिल् क उस भावना का प तीक है जहाँ कोई व् यिक् त हमारे जीवन में इतना गहरा उतर जाता है िक उसकी उपिस् थित क े िलए िकसी बाहरी प माण की आवश् यकता नही ं रहती। वह स् मृित में रहता है , िवचारों में रहता है , सपनों में रहता है और हमारी रोजमर की छोटी - छोटी खुिशयों में भी िदखाई देने लगता है। प ेम हमें दुिनया से दूर नही ं करता ; सही प ेम हमें दुिनया को और सुंदर देखने की दृिष् ट देता है। फ ू ल पहले से अिधक सुंदर लगते हैं। बािरश पहले से अिधक अच् छी लगती है। शामें लंबी और शांत लगती हैं। शहर की रोशिनयाँ कुछ ज् यादा चमकती हुई िदखाई देती हैं। खेतों की हिरयाली में कोई अपना भिवष् य नजर आने लगता है। और साधारण - सा िदन भी खास हो जाता है। यही इस पुस् तक की आत् मा है। “ प े म क े मौसम ” में प ेम को िकसी एक व् यिक् त तक सीिमत नही ं िकया गया है। यह उस साव भौिमक भावना को छूने का प यास है जो मनुष् य को संवेदनशील बनाती है , उसे प क ृ ित क े करीब ले जाती है और जीवन क े छोटे - छोटे सुखों का मूल् य समझाती है। इन 42 किवताओं में सुबह है , शाम है , धूप है , बािरश है , कोहरा है , खेत हैं , निदयाँ हैं , शहर हैं , रास् ते हैं , सपने हैं , उम् मीद है , हँसी है और सबसे बढ़कर — तुम हो। तुम , जो कभी सुबह की पहली िकरण हो। तुम , जो कभी बािरश की पहली बूंद हो। तुम , जो लंबी गिम यों में ठंडी छाँव हो। तुम , जो सद रातों में हथेिलयों की गम हट हो। तुम , जो सरसों क े खेतों की पीली मुस् कान हो। तुम , जो शहर की हजारों रोशिनयों क े बीच भी सबसे अलग िदखाई देती हो। और तुम , जो मेरे िलए क े वल प ेम नही ं — प े म की पूरी ऋतु हो। मैं चाहता हूँ िक इन किवताओं को पढ़ते हुए पाठक क े वल िकसी प ेम कहानी को न पढ़े , बिल् क अपने भीतर िछपे उस कोमल भाव से भी िमले िजसे हम अक् सर जीवन की व् यस् तता में कही ं पीछे छोड़ देते हैं। यिद िकसी किवता को पढ़ते हुए आपको अपने िकसी िप य व् यिक् त की याद आए , यिद बािरश की कोई बूंद आपको िकसी पुराने वादे की याद िदला दे , यिद िकसी खेत की हिरयाली में आपको अपने भिवष् य का सपना िदखाई दे , यिद िकसी शाम आपको लगे िक दुिनया आज कुछ ज् यादा खूबसूरत है — तो समिझएगा िक ये किवताएँ अपने उ ेश् य तक पहुँच गई हैं। क् योंिक अंततः प ेम का अथ क े वल यह नही ं िक कोई हमारे साथ है। प ेम का अथ यह भी है िक उसक े होने से — दुिनया थोड़ी और खूबसूरत लगने लगे। और शायद इसी िवश् वास क े साथ यह संग ह अपने पाठकों को एक छोटी - सी पंिक् त सौंपना चाहता है — मौसम बदलते रहें , शहर बदलते रहें , धरती पर ऋतुएँ आती - जाती रहें ; तुम मेरे पास रहो या दूर कही ं , मेरा प े म तु म् हारे िलए हर मौसम में नया रहेगा। — Rupesh Ranjan लेखक क े बारे में Rupesh Ranjan Rupesh Ranjan एक लेखक और किव हैं , िजनकी लेखनी जीवन , समाज , इितहास , संस् क ृ ित , राजनीित , प क ृ ित और मानवीय भावनाओं क े िविवध रंगों को शब् द देती है। उनकी रचनात् मक दृिष् ट में सािहत् य क े वल िवचारों की अिभव् यि त नही ं , बि क मनुष् य क े अनुभवों , संवेदनाओं , सपनों और जीवन क े प ित उसकी दृिष् ट को समझने का माध् यम है। उनकी लेखनी का एक महत् वपूण पक्ष प ेम और मानवीय भावनाओं की अिभव् यि त है। वे प ेम को क े वल दो व् यि तयों क े बीच का संबंध नही ं मानते , बि क उसे प क ृ ित , जीवन , उ म् मीद , सौंदय और सकारा त् मकता से जोड़ने वाली एक गहरी मानवीय अनुभूित क े रू प में देखते हैं। “ प े म क े मौसम ” इसी रचनात् मक दृिष् ट का पिरणाम है। इस संग ह में प ेम को बदलते मौसमों और प क ृ ित क े िविवध रू पों क े साथ जोड़ा गया है — लंबी गिम यों की तिपश में छाँव , बािरश की बूंदों में स् मृितयाँ , िम ी की सौंधी खुशबू में अपनापन , तीन महीने की सद में प ेम की गम हट , खेतों की हिरयाली में भिवष् य क े सपने और रोशन शहरों में साथ चलने की आकांक्ष ा। Rupesh Ranjan की किवताओं में प ेम क े साथ आशा और सकारा त् मक जीवन - दृि ष् ट िवशेष रू प से िदखाई देती है। उनकी दृिष् ट में किठन समय जीवन का अंितम सत् य नही ं है। जैसे बािरश क े बाद धरती िफर हरी होती है और लंबी रात क े बाद सुबह आती है , वैसे ही मनुष् य क े जीवन में भी बेहतर िदनों की संभावना हमेशा बनी रहती है। उनकी लेखनी साधारण क्ष णों में असाधारण सुंदरता खोजने का प यास करती है — िकसी िप य की मुस् कान , शाम की रोशनी , खेतों की हिरयाली , नदी का प वाह , बािरश की आवाज ़ , सिद यों की धूप या िकसी क े साथ चुपचाप चलते रहने का सुख। “ प े म क े मौसम ” में लेखक ने इसी भावना को शब् द िदए हैं िक सच् चा प ेम समय और पिरिस् थितयों से परे होकर हर मौसम में अपना नया रू प खोज सकता है। उनकी सािहित् यक या ा में प ेम - किवता क े साथ - साथ सामािजक , ऐितहािसक , सांस् क ृ ितक और समकालीन िवषयों पर लेखन की व् यापक रु िच िदखाई देती है। वे सािहत् य को संवाद का माध् यम मानते हैं — ऐसा संवाद जो पाठक को क े वल पढ़ने क े िलए नही ं , बि क महसूस करने , सोचने और अपने भीतर झाँकने क े िलए प ेिरत करे। उनकी रचनात् मक दुिनया में शब् द क े वल शब् द नही ं हैं। वे कभी बािरश की बूंद बनते हैं , कभी खेतों की हिरयाली , कभी शहर की रोशनी , कभी िकसी की आँखों का आसमान , और कभी प ेम की वह धड़कन जो िबना कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। Rupesh Ranjan क े िलए लेखन जीवन को देखने की एक संवेदनशील दृिष् ट है — और प ेम उस दृिष् ट का सबसे सुंदर रंग। लेखक का िव श् वास “ प े म क े मौसम ” उसी रंग को समिप त एक काव् यात् मक या ा है। “ मौसम बदलते हैं , समय बदलता है , शहर बदलते हैं , रा स् ते बदलते हैं — लेिकन स च् चा प े म हर बदलाव में अपना एक नया मौसम खोज लेता है। ” — Rupesh Ranjan पु स् तक क े बारे में प े म क े मौसम 42 प े म किवताओं का एक भावपूण िहंदी का व् य - संग ह लेखक : Rupesh Ranjan “ प े म क े मौसम ” प ेम , प क ृ ित , ऋतुओं , स् मृितयों , उम् मीद और जीवन की खूबसूरती को समिप त 42 मौिलक िहंदी किवताओं का एक भावपूण संग ह है। यह पुस् तक प ेम को क े वल एक भाव या िरश् ते क े रू प में नही ं , बि क जीवन को देखने की एक सुंदर और सकारा त् मक दृि ष् ट क े रू प में प स् तुत करती है। इस संग ह में प ेम कभी सुबह की पहली िकरण बनकर आता है , कभी आँखों में बसे आसमान की तरह िदखाई देता है , कभी लंबी गिम यों में ठंडी छाँव बन जाता है और कभी बािरश की पहली बूंद क े साथ मन में उतर जाता है। तीन महीने की सद में वही प ेम गम हट बनता है और कोहरे से भरी सुबह में िकसी िप य चेहरे की धुंधली - सी खूबसूरत याद। इस पुस् तक की िवशेषता यह है िक यहाँ प क ृ ित और प े म एक - दूसरे क े रू पक बन जाते हैं। उपजाऊ मैदानी धरती प ेम की समृि का प तीक है। हरे - भरे खेत भिवष् य क े सपनों की तरह लहलहाते हैं। सरसों क े पीले फ ू ल प ेम की मुस् कान बन जाते हैं। नदी की िनरंतर धारा प ेम की अिवरलता को व् यक् त करती है और पेड़ों की छाँव उस सुक ू न का प तीक बनती है जो िकसी िप य क े साथ होने से िमलता है। पुस् तक में शहर भी हैं — रोशनी से भरी सड़क े ं , शाम की चहल - पहल , िखड़की से िदखाई देती दुिनया और साथ - साथ चलते दो लोगों क े सपने। इन किवताओं में शहर क े वल इमारतों और सड़कों का नाम नही ं है ; वह उन यादों और पलों का संसार है जहाँ प ेम साधारण जीवन को असाधारण बना देता है। “ प े म क े मौसम ” क े वल बीते हुए प ेम की स् मृितयों में नही ं ठहरती। इसमें भिवष् य की ओर देखने वाली उ म् मीद और सकारा त् मकता भी है। “ अच् छे िदन हमारे नाम ”, “ कल और भी खूबसूरत होगा ” और “ हमारी दुिनया में उजाला है ” जैसी किवताएँ यह िवश् वास व् यक् त करती हैं िक जीवन में किठन मौसम स् थायी नही ं होते। जैसे बािरश क े बाद धरती िफर हरी होती है , वैसे ही मनुष् य क े जीवन में भी नए अवसर , नई खुिशयाँ और नई शुरु आतें आती रहती हैं। इस संग ह में प ेम का एक गहरा और आत् मीय रू प भी िदखाई देता है — जहाँ शब् दों से अिधक खामोशी समझी जाती है , जहाँ िकसी की खुशी अपनी खुशी बन जाती है और जहाँ िकसी व् यिक् त की उपिस् थित धीरे - धीरे आत् मा का िहस् सा बन जाती है। इन 42 किवताओं की या ा पहली सुबह से शु रू होकर अनंत प े म तक पहुँचती है। शुरु आत में प ेम की पहली रोशनी है , िफर बदलते मौसमों में उसकी अनुभूित है , धरती और हिरयाली क े बीच उसका िवस् तार है , शहरों और रास् तों में उसकी या ा है , अच् छे समय और भिवष् य की उम् मीद है और अंततः आत् मा से आत् मा तक पहुँचता हुआ वह प ेम है जो समय क े साथ समाप् त नही ं होता। यह पुस् तक उन लोगों क े िलए है िजन् होंने कभी िकसी को पूरे मन से चाहा है ; िजन् होंने बािरश में िकसी को याद िकया है , सिद यों की धूप में िकसी क े साथ बैठने का सपना देखा है , िकसी की मुस् कान में अपना संसार पाया है या बस यह महसूस िकया है िक िकसी खास व् यि क् त क े होने से दुिनया थोड़ी और खूबसूरत हो जाती है। यह उन पाठकों क े िलए भी है जो प ेम क े साथ - साथ प क ृ ित , सकारा त् मकता , सौंदय और जीवन की छोटी - छोटी खुिशयों को महसूस करना चाहते हैं। ** एक प े म , अनेक मौसम। क् योंिक प ेम हमेशा िकसी बड़े वादे का नाम नही ं होता। कभी - कभी प ेम बस इतना होता है — िकसी क े साथ सुबह अच् छी लगना , बािरश में उसकी याद आना , गिम यों में उसकी छाँव तलाशना , सिद यों में उसकी गम हट महसूस करना , खेतों की हिरयाली में भिवष् य देखना , शहर की रोशनी में उसका चेहरा ढूँढ़ना , और हर बदलते मौसम क े साथ उसी व् यिक् त को िफर से प् यार करना। “ प े म क े मौसम ” अंततः इसी िवश् वास की पुस् तक है िक — मौसम बदलते रहें , शहर बदलते रहें , धरती पर ऋतुएँ आती - जाती रहें — मेरा प े म तु म् हारे िलए हर मौसम में नया रहेगा। एक जीवन , अनिगनत खूबसूरत पल। ** प े म क े मौसम 42 प े म किवताओं का एक भावपूण िहंदी का व् य - संग ह किवताओं की अनु क्र मिणका खंड 1 — प े म का पहला उजाला खंड 2 — मौसमों में त ु म् हारा प े म लेखक : Rupesh Ranjan 1. तुमसे शु रू होती है मेरी सुबह तुम् हारी याद से जागती सुबह और प ेम में जीवन क े नए अथ । 2. तु म् हारी आँखों में मेरा आसमान आँखों को आकाश , िसतारों और अनंत सपनों से जोड़ती गहरी प ेम - किवता। 3. तु म् हारा साथ िकतना खूबसूरत है साथ को जीवन की सबसे सुंदर उपलिब् ध मानने वाला आत् मीय प ेम। 4. तु म् हारे नाम की धड़कन िदल की हर धड़कन में िप य क े नाम क े बस जाने की कहानी। 5. तुम हो तो सब अ च् छा लगता है प ेम क े कारण साधारण जीवन , रास् ते और मौसम भी सुंदर लगने लगते हैं। 6. मेरी दुिनया तुमसे रोशन है िप य को जीवन क े अंधेरे में उजाला और उम् मीद मानने की किवता। 7. प े म कोई मौसम नही ं , पूरा जीवन है ऐसा प ेम जो बदलते मौसमों क े साथ नही ं बदलता। 8. लंबी गिम यों में तु म् हारी छाँव लंबी और तपती गिम यों क े बीच िप य क े प ेम को ठंडी छाँव की तरह महसूस करना। 9. धूप में तु म् हारा स् पश गम दोपहर की धूप और प ेमी क े स् पश का सुंदर प ाक ृ ितक सामंजस् य। 10. बािरश तु म् हारे नाम की अच् छी बािरश , िम ी की खुशबू और प ेम क े उमड़ते भाव। खंड 3 — धरती , हिरयाली और हमारा प े म खंड 4 — शहर , रा स् ते और खूबसूरत िजंदगी 11. पहली बािरश और तुम मानसून की पहली बूंदों क े साथ प ेम की नई अनुभूित। 12. भीगी हुई शाम बािरश क े बाद की शाम , हिरयाली और िप य क े साथ िबताए शांत क्ष ण। 13. तीन महीने की सद , तु म् हारी गम हट ठंडी सिद यों में प ेम को सबसे कोमल ऊष् मा क े रू प में देखना। 14. कोहरे में तु म् हारा चेहरा सद सुबह क े कोहरे में िप य की धुंधली लेिकन खूबसूरत छिव। 15. उपजाऊ धरती जैसी तुम उपजाऊ मैदानी भूिम को प ेम की समृि और जीवनदाियनी शि त का रू पक बनाना। 16. खेतों में िखलता हमारा प् यार हरी फसलों , सुनहरी बािलयों और बढ़ते प ेम का सुंदर मेल। 17. िम ी की खुशबू और तु म् हारी याद बािरश क े बाद िम ी की सौंधी खुशबू में िप य की स् मृित। 18. सरसों क े फ ू लों क े बीच पीले फ ू लों से भरे खेतों में प ेम की उजली तस् वीर। 19. नदी की तरह बहता प े म नदी की िनरंतरता क े समान गहरे और अिवरल प ेम की किवता। 20. पेड़ों की छाँव में तु म् हारे साथ प क ृ ित की शांित और प ेमी क े साथ िबताए सुक ू न भरे पल। 21. धरती िजतना गहरा प् यार ऐसा प ेम िजसकी गहराई धरती की गहराई जैसी असीम है। 22. तु म् हारे साथ मेरा शहर शहर की रोशनी , सड़कों और भीड़ क े बीच प ेम की िनजी दुिनया। 23. रोशन शहर , रोशन िदल शहर की रात और प ेम से जगमगाते मन का समानांतर िचत्र ण। 24. एक खूबसूरत शहर में तुम सुंदर शहर को िप य की उपिस् थित से और अिधक खूबसूरत बनाना। 25. सड़कों पर साथ - साथ जीवन की यात्र ा को शहर की लंबी सड़कों और साथ चलने वाले प ेम से जोड़ना। खंड 5 — अ च् छे समय की खुशबू खंड 6 — आ त् मा से आ त् मा तक 26. िखड़की से िदखती दुिनया एक िखड़की , बदलते मौसम और िप य क े साथ भिवष् य क े सपने। 27. शाम क े शहर में तु म् हारा हाथ शहर की शाम , रोशनी और हाथों में हाथ िलए प ेम की अनुभूित। 28. जहाँ तुम हो , वही मेरा शहर है स् थान से अिधक व् यि त को अपना घर और अपना संसार मानने वाली किवता। 29. अ च् छे िदन हमारे नाम आने वाले सुंदर िदनों क े प ित िवश् वास और सकारात् मक प ेम। 30. खुिशयों की खबर तुम हो िप य को जीवन की सबसे अच् छी खबर मानने वाली रोमांिटक किवता। 31. आज बहुत कुछ अ च् छा है छोटी - छोटी खुिशयों , प क ृ ित और प ेम क े प ित क ृ तज्ञ ता। 32. हमारी हँसी का मौसम हँसी , िखलिखलाहट और प ेम से भरे उजले िदनों की किवता। 33. सपनों की हरी फसल साझे सपनों को खेतों में लहलहाती फसल क े रू पक में प स् तुत करना। 34. कल और भी खूबसूरत होगा भिवष् य क े प ित उम् मीद , िवश् वास और प ेम से भरी सकारात् मक किवता। 35. हमारी दुिनया में उजाला है नकारात् मकता क े बीच प ेम , िवश् वास और उम् मीद की रोशनी। 36. तु म् हें िसफ प् यार नही ं करता प ेम से आगे बढ़कर आत् मीय जुड़ाव और भावनात् मक एकत् व की किवता। 37. तुम मेरी खामोशी समझती हो िबना शब् दों क े एक - दूसरे को समझ लेने वाले गहरे प ेम का िचत्र ण। 38. तु म् हारे िबना अधूरा नही ं , तु म् हारे साथ पूरा हूँ प ेम को कमजोरी नही ं , जीवन की पूण ता और िवस् तार क े रू प में देखना। 39. मेरी आ त् मा में तु म् हारा घर िप य क े मन में नही ं , आत् मा की गहराइयों में बसने की अनुभूित। 40. ज न् मों से शायद तु म् हें जानता हूँ अपिरिचत होते हुए भी बेहद पिरिचत लगने वाले प ेम का रहस् य। खंड 7 — अनंत प े म संग ह की क े ं द ीय भावना 41. जब तक मौसम बदलते रहेंगे गम , बािरश , सद , वसंत और बदलते समय क े बीच प ेम की िस् थरता। 42. तुम रहना , मैं प े म िलखता रहूँगा पूरे संग ह का भावपूण समापन — जहाँ िप य की उपिस् थित और किव का प ेम हमेशा किवता बनता रहेगा। यह संग ह क े वल प े िमका को संबोिधत किवताओं का संग ह नही ं , बि क प ेम क े माध् यम से जीवन की सुंदरता को देखने की कोिशश होगा — जहाँ लंबी गिम याँ भी उसकी छाँव बन जाती हैं , अ च् छी बािरश उसक े आने जैसी लगती है , तीन महीने की सद उसक े स् पश की गम हट में बदल जाती है , उपजाऊ मैदान प े म की समृि का प तीक बनते हैं और खूबसूरत शहर उसक े साथ होने से और खूबसूरत हो जाते हैं। हर किवता में प ेम क े साथ प क ृ ित , सकारा त् मकता , आशा , अ च् छे समय , सुंदर भिव ष् य और आ त् मीयता की भावना रहेगी। संग ह का मूल संदेश होगा : “ मौसम बदलते रहें , शहर बदलते रहें , धरती पर ऋतुएँ आती - जाती रहें — मेरा प े म तु म् हारे िलए हर मौसम में नया रहेगा। ” अ ध् याय 1 तुमसे शु रू होती है मेरी सुबह सुबह हर िदन आती है , लेिकन हर सुबह एक जैसी नही ं होती। कभी कोई सुबह क े वल सुबह होती है — िखड़की से आती हुई हल् की रोशनी , िचिड़यों की आवाज ़ , दूर िकसी रास् ते से ग ुजरती हुई गाड़ी , पेड़ों की पि यों पर ठहरी ओस और आसमान में धीरे - धीरे फ ै लती धूप। लेिकन कुछ सुबहें ऐसी होती हैं िजनमें िकसी का होना पूरे िदन का अथ बदल देता है। मेरे िलए ऐसी ही हर सुबह तुमसे शु रू होती है। तुम् हारे जागने से पहले भी सूरज अपनी जगह से िनकलता है , हवा अपनी गित से चलती है , पक्ष ी अपने गीत गाते हैं , खेतों में िकसान अपने काम पर िनकलते हैं और शहर अपनी व् यस् तता में जागने लगता है। लेिकन जब मेरी आँखें खुलती हैं और सबसे पहले तुम् हारा ख् याल आता है , तो लगता है जैसे सूरज आज कुछ ज् यादा उजला है। जैसे हवा में आज कुछ ज् यादा िमठास है। जैसे दुिनया ने रात भर मेरे िलए कोई अच् छी खबर सँभालकर रखी थी — और सुबह होते ही वह खबर तुम् हारी याद बनकर मेरे पास आ गई। त ु म् हारी याद की पहली िकरण सुबह और त ु म् हारा नाम सुबह की पहली िकरण जब कमरे की िखड़की से भीतर आती है , मैं उसे रोकता नही ं। उसे आने देता हूँ। क् योंिक मुझे लगता है शायद उसक े साथ तुम् हारी कोई छोटी - सी याद भी आई होगी। कभी तुम् हारी मुस् कान , कभी तुम् हारी आँखें , कभी तुम् हारी आवाज ़ , कभी तुम् हारा वह अंदाज ़ िजसे शब् दों में ठीक - ठीक िलख पाना मेरे िलए आज भी मुिश् कल है। कुछ चीजें िलखी नही ं जाती ं , बस महसूस की जाती हैं। तुम भी शायद उन् ही ं चीजों में से एक हो। तुम् हें याद करना मेरे िलए िकसी पुराने दुख को याद करना नही ं , बिल् क एक सुंदर संभावना को याद करना है। यह िवश् वास िक आज का िदन अच् छा होगा। आज कोई अच् छी बात होगी। आज िकसी मोड़ पर तुम् हारी याद िफर मुस् कुराएगी। और शायद यही प ेम की खूबसूरती है — वह हमें आने वाले िदन से डराता नही ं , बिल् क उसक े िलए उत् सािहत करता है। कभी - कभी मैं सोचता हूँ , अगर सुबह का भी कोई नाम होता तो शायद उसका नाम तुम् हारा होता। खेतों पर उतरती धूप क् योंिक सुबह में वही ताजगी है जो तुम् हारी बातों में है। वही शांित है जो तुम् हारी आँखों में िदखाई देती है। वही उम् मीद है जो तुम् हारे होने से मेरे भीतर जन् म लेती है। सुबह कहती है — कल चाहे जैसा था , आज िफर से शुरु आत की जा सकती है। और तुम भी तो यही कहती हो अपने होने से — चलो , िफर से जीते हैं। चलो , िफर से मु स् कुराते हैं। चलो , आज को कल से बेहतर बनाते हैं। तुम् हारे कारण सुबह मेरे िलए समय का एक िहस् सा नही ं रही। वह एक भावना बन गई है। जब सुबह मैदानी इलाकों पर उतरती है , तो दूर तक फ ै ले खेत धीरे - धीरे सुनहरी रोशनी में नहाने लगते हैं। कही ं गेहूँ की बािलयाँ हैं , कही ं धान की हिरयाली , कही ं सिब् जयों की कतारें , कही ं सरसों क े पीले फ ू ल हवा क े साथ धीरे - धीरे झूम रहे हैं। मैं जब इन खेतों को देखता हूँ तो मुझे तुम् हारी याद आती है। इसिलए नही ं िक तुम िकसी फ ू ल जैसी हो — हालाँिक तुम सुंदर हो। बिल् क इसिलए िक इन खेतों की तरह त ु म् हारे होने से तुम् हारे भीतर भी जीवन को सँवारने की क्ष मता है। एक बीज जब िम ी में दबता है , तो बाहर से देखने वाले को कुछ िदखाई नही ं देता। लेिकन धरती क े भीतर एक पूरी कहानी शुरू हो चुकी होती है। जड़ें फ ै लती हैं , अंकुर जन् म लेता है , और धीरे - धीरे एक िदन वही छोटा - सा बीज हरी फसल बनकर धरती पर िदखाई देता है। प ेम भी शायद ऐसा ही है। शुरु आत में वह एक छोटी - सी भावना होता है। िफर वह स् मृित बनता है , िफर आदत , िफर िवश् वास , और एक िदन पूरी िजंदगी का िहस् सा। हमारा प ेम भी शायद िकसी ऐसी ही उपजाऊ धरती में धीरे - धीरे पनप रहा है। तुम् हारे होने से मेरे जीवन की हर चीज बदल नही ं गई। सड़क े ं वही हैं। शहर वही हैं। काम वही हैं। सुबह की भागदौड़ वही है। एक अ च् छी खबर की तरह गिम यों की धूप वही है। बािरश की प तीक्ष ा वही है। सिद यों की ठंड भी वही है। लेिकन इन् हें देखने वाली मेरी आँखें बदल गई हैं। अब गम आती है तो मुझे तुम् हारी छाँव याद आती है। बािरश होती है तो तुम् हारे साथ भीगने का ख् याल आता है। सिद यों की धूप िखलती है तो लगता है तुम् हारे पास बैठकर बहुत देर तक कुछ न कहूँ। और जब खेतों में हिरयाली फ ै लती है तो लगता है हमारे सपनों ने भी धरती पर अपना रंग छोड़ िदया है। तुमने मेरी दुिनया को बदला नही ं है। तुमने मुझे दुिनया को नए ढंग से देखना िसखाया है। कभी - कभी जीवन में कोई बहुत बड़ी घटना नही ं होती। न कोई पुरस् कार िमलता है , न कोई बड़ी उपलिब् ध , न कोई िवशेष उत् सव। िफर भी िदन अच् छा लगता है। क् यों ? क् योंिक सुबह उठते ही िकसी का ख् याल आ जाता है। क् योंिक फोन की स् ीन पर िकसी का नाम िदखाई देता है। सुबह का शहर क् योंिक िकसी की आवाज ़ पूरे िदन की थकान कम कर देती है। क् योंिक कोई पूछता है — “ आज क ै से हो ?” और उस छोटे - से प श् न में इतना अपनापन होता है िक लगता है दुिनया में अभी भी बहुत कुछ अच् छा बाकी है। मेरे िलए तुम ऐसी ही एक अच् छी खबर हो। तुम् हारा होना िकसी अखबार की बड़ी खबर नही ं , मेरे िदल की सबसे शांत और सबसे सुंदर खबर है। सुबह का शहर भी िकतना सुंदर होता है। रात की रोशिनयाँ बुझने लगती हैं , दुकानों क े शटर उठते हैं , सड़क े ं धीरे - धीरे भरने लगती हैं , चाय की दुकानों से उठती भाप हवा में घुलने लगती है। कोई अपने काम पर जा रहा है , कोई स् क ू ल की ओर , कोई स् टेशन की तरफ , कोई अपने सपनों की तलाश में। हर व् यिक् त क े पास अपनी एक कहानी है। हर रास् ते पर िकसी की उम् मीद चल रही है। और उस भीड़ में मैं भी चलता हूँ। त ु म् हारे साथ भिव ष् य लेिकन मेरे भीतर एक शांत - सी जगह है जहाँ तुम रहती हो। शहर िकतना भी शोर करे , वहाँ तुम् हारी आवाज ़ सबसे साफ सुनाई देती है। सड़क िकतनी भी लंबी हो , वहाँ तुम् हारे साथ चलने की कल् पना मुझे थकने नही ं देती। शहर िकतना भी व् यस् त हो , तुम् हारी याद मेरे भीतर एक छोटी - सी शांत सुबह बनाए रखती है। मैंने तुम् हारे साथ क े वल आज की कल् पना नही ं की। मैंने आने वाले मौसम भी देखे हैं। लंबी गिम याँ देखी हैं जहाँ हम िकसी पेड़ की छाँव में कुछ देर बैठेंगे। अच् छी बािरश देखी है जहाँ िम ी की खुशबू हमारे आसपास होगी। हरे खेत देखे हैं जहाँ फसलें हवा क े साथ झूमेंगी। तीन महीने की सद देखी है जहाँ सुबह की धूप हम दोनों क े िलए पय प् त होगी। कोहरे वाली सुबहें देखी हैं , शहर की रोशन शामें देखी हैं , लंबी सड़क े ं देखी हैं , और उन सड़कों पर