नीलो᭜पल मृणाल झारखंड के सुदूर इलाके संथाल परगना मᱶ साल 1984 मᱶ ज᭠मे नीलो᭜पल मृणाल अपने पहले ही उप᭠यास ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’ से पाठकᲂ और सािह᭜य - ममᭅ᭄ᲂ के चहेतᲂ मᱶ शािमल हो चुके हᱹ। मूल ᱨप से िबहार से ता᭨लुक रखने वाले नीलो᭜पल सᱶट जेिवयसᭅ कॉलेज , राँची से अपनी िशᭃा पूरी करने के बाद िपछले कई सालᲂ से राजनैितक और सामािजक गितिविधयᲂ मᱶ सᳰᮓय हᱹ। छाᮢ - आंदोलनᲂ मᱶ िवशेष भूिमका िनभाने के साथ - साथ मृणाल लोकगायन के ᭃेᮢ मᱶ भी मंच से टीवी तक का सफर तय कर चुके हᱹ। इन ᳰदनᲂ किव - स᭥मेलनᲂ मᱶ भी अपना भाय आजमा रहे हᱹ। westland publications ltd 61, II Floor, Silverline Building, Alapakkam Main Road, Maduravoyal, Chennai 600095 93, I Floor, Sham Lal Road, Daryaganj, New Delhi 110002 www.westlandbooks.in Hind Yugm 201 B, Pocket A, Mayur Vihar Phase-2, Delhi-110091 www.hindyugm.com First published by Shabdarambh Prakashan 2015 Published by Hind Yugm and westland publications ltd 2017 Copyright © Nilotpal Mrinal 2017 All rights reserved ISBN : 978-81-93123-61-4 987654321 Nilotpal Mrinal asserts the moral right to be identified as the author of this work. This novel is entirely a work of fiction. The names, characters and incidents portrayed in it are the product of the author’s imagination. Any resemblance to actual persons, living or dead, or events or localities is entirely coincidental. Due care and diligence has been taken while editing and printing the book. Neither the author, publisher nor the printer of the book hold any responsibility for any mistake that may have crept in inadvertently. Hind Yugm and WESTLAND, the Publisher and the printers will be free from any liability for damages and losses of any nature arising from or related to the content. All disputes are subject to the jurisdiction of competent courts in Chennai. This book is sold subject to the condition that it shall not by way of trade or otherwise, be lent, resold, hired out, circulated, and no reproduction in any form, in whole or in part (except for brief quotations in critical articles or reviews) may be made without written permission of the publishers. अनुᮓम भूिमका 1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8. 9. 10. 11. 12. 13. 14. 15. 16. 17. 18. 19. 20. 21. 22. 23. 24. 25. 26. 27. 6 साल बाद भूिमका संभवत : िजस उ᮫ मᱶ आदमी के पास सबसे अिधक ऊजाᭅ रहती है , कुछ करने का पुरजोर उ᭜साह होता है और दुिनया को देखने - समझने कᳱ सबसे ᭔यादा िज᭄ासा होती है , मᱹने अपने जीवन का वह सबसे चमकदार दौर आईएएस कᳱ तैयारी के िलए मुखजᱮनगर मᱶ गुजार ᳰदया। िलहाजा , यह तो तय था ᳰक मᱹने यहाँ कᳱ दुिनया , तैयारी के ताने - बाने , यहाँ कᳱ ᳲजंदगी को नजदीक से देखा और बड़ी बारीकᳱ से समझने कᳱ कोिशश भी कᳱ। शायद यही कारण रहा होगा ᳰक मᱹने अपने पहले उप᭠यास मᱶ यहᱭ कᳱ ᳲजंदगी को प᳖ ᲂ पर उतारना सही समझा। मᱹ ᳰकसी और के कहने से पहले अपनी ओर से ही ये दावा करता ᱠँ ᳰक मᱹने इस उप᭠यास के ᱨप मᱶ कोई सािह᭜य नहᱭ रचा है , बि᭨क सच कहता ᱠँ ᳰक मᱹने तो सािह᭜य सराहना और आलोचना से मुᲦ , िबना ᳰकसी शाᳫीय कसौटी कᳱ ᳲचंता ᳰकए , बस जो आँखᲂ से देखा , अनुभव से सुना , उसे ही गूँथकर एक कहानी बुन डाली है। एक ऐसी जमात कᳱ कहानी , िजनके साकार सपनᲂ कᳱ चमक तो सब देखते हᱹ और उनके िलए ᮧशि᭭ तयाँ िलखी जाती हᱹ , लेᳰकन इस सपने को हकᳱकत मᱶ बदलने के बीच वे ᳰकतने पहाड़ चढ़ते है , ᳰकतने दᳯरया पार होते हᱹ , ᳰकतने पाताल धँसते हᱹ और ᳰकतने रेिग᭭ तान भटकते हᱹ , इस पर अब तक बᱟत कुछ िलखा जाना बाकᳱ था। मᱹने बस वही सच िलखा है। इसे िलखने मᱶ मᱹने अपनी क᭨पना से कुछ भी उधार नहᱭ िलया। जो कुछ अनुभव ने जमा कर रखा था , उसी से उप᭠यास रच डाला। अब यह पाठकᲂ को ही तय करना है ᳰक इसमᱶ सािह᭜य ᳰकतना है और एक ᳲजंदगी कᳱ सᲬी कहानी ᳰकतनी है। उप᭠यास कᳱ भाषा को लेकर कहना चाᱠँगा ᳰक कहᱭ - कहᱭ कुछ श᭣द आपको अखर सकते हᱹ और भाषाई शुिचता के पहरेदार नाक - भᲅ भी िसकोड़ सकते हᱹ , पर मᱹने भाषा के संदभᭅ मᱶ स᭜य को चुना। मयाᭅदा भी इसी मᱶ बचनी थी ᳰक मᱹ स᭜य को ही चुनूँ। सो , मᱹने पाᮢ ᲂ को उनकᳱ ᭭ वाभािवक भाषा बोलने दी। मᱹने उ᭠हᱶ जरा भी आँख नहᱭ ᳰदखाई और उनके कहे पर गदᭅन गाँथ कलम चलाता रहा। इसिलए यह साफ कर रहा ᱠँ ᳰक ᳰकसी भी अ᭒छी - बुरी भाषा के िलए मᱹ नहᱭ , बि᭨क मेरे पाᮢ िज᭥मेदार हᱹ , िजनसे आप खुद ही आगे िमलᱶगे। एक बात उप᭠यास के शीषᭅक पर भी कᱠँगा। संभव है ᳰक यह सवाल मन मᱶ आए ᳰक ᳲहंदी के उप᭠यास का नाम अँᮕेजी मᱶ यᲂ ? इस बारे मᱶ बस इतना कहना है ᳰक वै᳡ीकरण के इस दौर मᱶ पूरी दुिनया एक - दूसरे के करीब आ गई है। न केवल खान - पान और पहनावे , बि᭨क मनोरंजन और सािह᭜य के ᭭ तर पर भी आदान - ᮧदान जारी है। ऐसे मᱶ एक - दूसरे कᳱ भाषाᲐ के श᭣दᲂ का ᭭ वागत होना चािहए। हर भाषा को दूसरी भाषा के श᭣द चखने चािहए। जो पचने लायक होगा वो हजम हो जाएगा और अपच होगा तो उगल ᳰदया जाएगा। इसी ᮓम मᱶ ᳲहंदी मᱶ ऐसे कई अँᮕेजी श᭣द हᱹ जो सहज ᱨप से ᮧयुᲦ होते हᱹ। इसे भाषाई ᭭ वािभमान का मुा न बनाया जाए। इस मामले मᱶ थोड़ा लचीलापन अपनाना भाषा को समृ ही करेगा। रही बात ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’ के नाम के इस कथानक से संबंध कᳱ तो भूिमका मᱶ नहᱭ ही बताऊ ँ गा। इसके िलए तो आपको यह उप᭠यास पढ़ना होगा। अंत मᱶ यही चाᱠँगा ᳰक इस उप᭠यास को इस कसौटी पर न कसा जाए ᳰक इसे ᳰकसने िलखा है और यᲂ िलखा है , बि᭨क इसिलए पढ़ा जाए ᳰक इसे ᳰकस िवषय पर िलखा गया है और ᳰकतना सच िलखा गया है। मेरे गुᱧ रजनीश राज कᳱ ᮧेरणा , िमᮢ जय गोᳲवंद , नीिशथ और नवीन के िनरंतर सहयोग ने मुझे इस मुकाम तक पᱟँचाया है। ध᭠यवाद ! नीलो᭜पल मृणाल ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’ का कथानक माᮢ एक क᭨पना न होकर िसिवल सेवा कᳱ तैयारी कर रहे छाᮢ ᲂ मᱶ से हर एक कᳱ आ᭜मकथा है , िजसमᱶ तैयारी से जुदा हर एक पहलू चाहे कोᳲचंग हो या अखबार या ᳯटᳰफन का िड᭣बा या नेहᱧ िवहार , गाँधी िवहार , सब कुछ अपने को बेबाक तरीके से हमारे सपने कᳱ पृ᳧ भूिम मᱶ खोलकर रख देता है। यह उप᭠यास उनकᳱ जुबानी है जो यह जानना चाहते हᱹ ᳰक ‘ सफलता कैसे पाएँ ’ और कहानी है उनकᳱ जो ‘ सफलता ’ पा ही लेते हᱹ। ‘ अँधेरी घाᳯटयᲂ से गुजर कर उजाले के िशखर तक ’ । शुभकामना डाकᭅ हॉसᭅ ! िमिथलेश िम᮰ा IAS, िबहार कैडर मुखजᱮ नगर मᱶ अपनी तैयारी के दौरान जैसा संघषᭅ ᳰकया , जो देखा , जो कुछ भुगता , वह सब इस उप᭠यास के ᱨप मᱶ पढ़ रहा ᱠँ। यहाँ कᳱ म᭭ ती , यहाँ कᳱ बौिकता , यहाँ का तनाव , भटकाव और ᳰफर इ᭠हᱭ के बीच से ᳰकसी का सफल और ᳰकसी का असफल होना , सब कुछ एक संवदेनशील लेखक के ᱨप मᱶ समेटने मᱶ कामयाब रहे हᱹ नीलो᭜पल। बधाई हो ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’! कुमार ᮧशांत IAS उᱫर ᮧदेश कैडर सवᭅᮧथम नीलो᭜पल को बधाई , ये उप᭠यास िलखने के िलए। इतना बᳰढ़या िलखा। पूरे मुखजᱮ नगर कᳱ ᳲजंदगी बयान कर दी आपने। कुछ िपछले ᳰदन याद आए , कुछ छूटे ᱟए लोग याद आए , कभी मन गुदगुदाया तो कभी आँखᲂ मᱶ आँसू भी आ गए। ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’ को जᱨर पढ़ना चािहए। शुभकामना आपको ! आि᭭ तक पा᭛डेय IAS, महारा᳦ कैडर सच मᱶ मजा आ गया पढ़कर। ‘ डाकᭅ हॉसᭅ ’ केवल उप᭠यास नहᱭ है बि᭨क हम सबके यथाथᭅ कᳱ कहानी है , जो सफल होकर िनकल आए हᱹ और जो मुखजᱮ नगर मᱶ सफलता के िलए संघषᭅ कर रहे हᱹ। इसे पढ़ते ᱟए मᱹ जैसे अपने पुराने ᳰदनᲂ मᱶ खो गया। हर पहलू का बड़ा सू᭯ म और मजेदार ढंग से िजᮓ है इसमᱶ। मुझे खुशी है ᳰक हमारे बीच से िनकले ᳰकसी सािह᭜यकार कᳱ कलम से लाखᲂ अ᭤यᳶथᭅयᲂ के ᳲजंदगी कᳱ यह रोचक दुिनया प᳖ े पर उतरी। बᱟत बधाई नीलो᭜पल भाई। अिभषेक ᳲसंह IAS, म᭟य ᮧदेश कैडर ᳲहंदी - उदूᭅ इलाके मᱶ लोगᲂ कᳱ हसरत होती है अपने बᲬᲂ को आईएएस बनाना। अगर यह मुमᳰकन नहᱭ हो तो ᮧशासिनक पदानुᮓम का कोई सोपान हािसल करना। सामािजक स᭥मान और आᳶथᭅक सुरᭃा के िलए ᮧशासिनक पद साधन हᱹ और सा᭟य भी। इस हसरत को यथाथᭅ बनाने के ᳇ं᳇ मᱶ जीवन का बᱟलांश बीत जाता है। न िसफᭅ अ᭤यथᱮ बि᭨क उसके पᳯरवार एवं ᳯर᭫ तेदार इस ᳇ं᳇ मᱶ गुनगुना अहसास करते ᱟए जीवन कᳱ तकलीफᱶ काट देते हᱹ। ᮧितयोिगयᲂ कᳱ जोजहद कᳱ मायानगरी का नाम है मुखजᱮ नगर और इसकᳱ पᳯरिध पर बस इलाका और यहाँ सपनᲂ के िलए संघषᭅरत युवजनᲂ का जीवन ᳲहंदी कथाकारᲂ कᳱ नजरᲂ से ओझल था। इस रोचक िवषय पर नीलो᭜पल मृणाल ने यह पठनीय उप᭠यास िलखकर एक बड़ी कमी को दूर ᳰकया है। राजीव रंजन िगᳯर युवा आलोचक एवं लेखक 1. This Book is requested from Request Hoarder अभी सुबह के पाँच ही बजे थे। िचिड़याँ चूँ - चूँ कर रही थᱭ। ह᭨का - ह᭨का धुँधलापन िछतरा ᱟआ था। िवनायक बाबू ज᭨दी - ज᭨दी बदन पर सरसᲂ का तेल घसे , बा᭨टी और लोटा िलए घर के ठीक सामने आँगनबाड़ी कᱶᮤ के हाते वाले चापानल पर पᱟँच गए। वहाँ पहले से पड़ोस का मंगनू दतुवन कर रहा था। िवनायक बाबू ने बा᭨टी रखते ही कहा , “ तनी नलवा चलाऽव तऽ मंगनू , झट से नहा लᱶ। िनकलना है। ” तभी अचानक खेत कᳱ तरफ सैर पर िनकले ठाकुर जी , जो िवनायक िस᭠हा के ही ᭭ कूल मᱶ साथी टीचर थे , कᳱ नजर िवनायक जी पर पड़ी। “ एतना िबहाने - िबहाने असनान - धयान हो रहा है , कहाँ का जतरा है मा᭭ टर साब ?” खैनी रगड़ते ᱟए ठाकुर जी ने पूछा। िवनायक बाबू तब तक चार लोटा पानी डाल चुके थे। गमछा से पीठ पᲂछते ᱟए बोले , “ हाँ , आज तनी संतोष ᳰद᭨ली जा रहा है , वही ᭭ टेशन छोड़ने जाना है , साढ़े दस का ही ᮝेन है। िवᮓमिशला। ” “ अभी ई भोरे - भोरे ᳰद᭨ली ?” ठाकुर जी ने बड़े कौतूहल से पूछा। िवनायक बाबू ने गीली लुँगी बदलते ᱟए कहा , “ हाँ बी ए कर िलया। यहᱭ भागलपुर टीएनबी कॉलेज से कराए। अब बोला एम ए पीएच डी का िडᮕी जमा करके का होगा ई जुग मᱶ ! सो ᳰद᭨ली जाते हᱹ , आईएएस का तैयारी करᱶगे। जेतना ᳰदन मᱶ लोग एम ए करेगा मन लगाई हᲅक के पढ़ ᳰदया तो ओतना ᳰदन मᱶ आईएसे बन जाएगा। ” ठाकुर जी ने सहमित मᱶ सर िहलाते ᱟए कहा , “ ऊ बात तो ठीके बोला। हाँ , यहाँ कुछ भिवस नै है। खाली एम ए ., बी ए के पूछता है आजकल ! हमारे साढ़ू साहब भी यही ᳰकए , इहᱶ बोकारो ᭭ टील - ᭡लांट मᱶ हᱹ। लड़का को बोकारो मᱶ पढ़ाए , अभी ᳰदि᭨लये भेजे हᱹ। आईएएस वाला मᱶ तैयारी करने। अरे महराज , सोिचए न आईएएस हो गया तऽ तीन पु᭭ त तार देगा हो िवनायक बाबू !” सुनते ही िवनायक बाबू कᳱ आँखᲂ मᱶ लाल बᱫी जल गई। चेहरे पर हँसी और रोमांच का िमि᮰त भाव िलए खुद को सहज करते ᱟए बोले , “ देिखए , अब एतना तऽ नय पता लेᳰकन हाँ पढ़ने मᱶ ठीक है। बोला ᳰद᭨ली जाएँगे। हम बोले ठीक है , जो मन का हो करो। अपना भिव᭬ य बनाओ। अब आजकल का बᲬा - बुतᱨ समझदार हो गया है ठाकुर जी। आप चीज नहᱭ थोप सकते हᱹ। हम भी बोले , जाओ आईएएस का मन है तो करो। पैसा कौड़ी के चलते मन मत मारो और ई बात तो आप ठीक ही बोले ᳰक बन गया तो तीन पीढ़ी का क᭨याण हो जाएगा। ” हाँ , डॉटर बनकर आप अपना कᳯरयर बना सकते हᱹ। इंजीिनयर बनकर आप अपना कᳯरयर बना सकते हᱹ पर अगर अपने साथ - साथ कई पीᳰढ़यᲂ का कᳯरयर बनाना है तो आईएएस बनना होगा। यह एक सामा᭠य सोच थी जो ᳲहंदी पᲵी के लगभग हर छोटे - बड़े क᭭ बे या गाँव मᱶ थी। शायद एक सफल लड़के कᳱ पीठ पर तीन - चार पीᳰढ़यᲂ को वैतरणी पार कराने कᳱ क᭨पनाᲐ ने आईएएस को हर पढ़े - िलखे पᳯरवार का सपना बना ᳰदया था। वहाँ पुरवाई बहती तो उसमᱶ भी आईएएस का नशा , पिछया बहता तो उसमᱶ भी आईएएस का नशा। और नशा तो नशा था। आपस मᱶ बितयाते - बितयाते ठाकुर जी भी िवनायक जी के दुवार तक आ गए। “ आइए , चाय पी के जाइएगा। ” िवनायक बाबू बोले। भला यᲂ न चाय िपलाएँ ! आिखर सबेरे - सबेरे जीवन का इतना अ᭞भुत और आनंद का िचᮢ खᱭच ᳰदया था ठाकुर जी ने िवनायक बाबू के मन मᱶ। लोग सुबह - सुबह एक शुभ श᭣द सुनने के िलए तरसते हᱹ यहाँ तो ठाकुर जी ने महाशुभ बोल - बोलकर मन भर ᳰदया था। तीन पु᭭ त तारने कᳱ शुभे᭒छा ! आह ! महाशुभ। ठाकुर जी बोले , “ लाइए पी लेते हᱹ। खेत कᳱ तरफ िनकले थे , लेट हो रहा है। वापस ᭭ कूलो िनकलना है। ” ठाकुर जी ने कुछ ᳰकया न ᳰकया पर खेत के कादो - कᳱचड़ से पहले अपनी सुबह मीठी कर ली थी। ᮧाइमरी का िशᭃक सुबह कᳱ एक कप चाय से ᳰदन भर फुतᱮ रखने कᳱ अ᭞भुत ᭃमता रखता है। जो असर वह अपने घर पर नहᱭ पीता। चाय पीकर कप रखते ᱟए ठाकुर जी जाने को ᱟए , “ चिलए , तैयार होइए आप भी िवनायक बाबू , भगवान संतोष को जि᭨दये आईएएस बनाएँ। हम लोगᲂ का भी नाम ऊ ँ चा होगा। गाँव भी तर जाएगा। ” जाते - जाते ठाकुर जी पूरे समाज और गाँव के शान कᳱ िज᭥मेदारी भी िवनायक बाबू को देते गए थे जो उ᭠हᱶ अब संतोष को देना था। “ आइए , आप ज᭨दी - ज᭨दी कपड़ा - लᱫा पहिनए संतोष तैयार हो गया है। ” प᳀ी कमला देवी कᳱ अंदर से आवाज आई। कमला देवी गᳯठया के रोग से पीिड़त थᱭ। सुबह चार बजे ही उठकर ज᭨दी - ज᭨दी िलᲵी छानकर पैक कर ᳰदया था। ठेकुवा और िनमकᳱ रात को ही बनाकर अलग से झोले मᱶ रख ᳰदया था। काजू , ᳰकसिमस , छोहारा , बादाम का पैकेट भी बैग मᱶ रख ᳰदया था। “ देख लो सामान सब एक बार अ᭒छा से। कुछु छुटा तऽ नहᱭ है ?” माँ बोली। माँ के बोलते ही संतोष का जᱨरी चीजᲂ पर ᭟यान गया। “ यहाँ मोबाइल का चाजᭅर रखे थे कहाँ हᱹ , इयर फोन देखे है कोई ?” संतोष बोला। माँ दूसरे कमरे से दोनᲂ सामान लेकर आई और बोली , “ रख लो बᳰढ़या से। बाहर अकेले रहोगे। अपना सामान िजधर - ितधर रखने वाला आदत छोड़ो अब। ” संतोष ने मु᭭ कुराकर ‘ हाँ ’ कहा। माँ ᳰफर बोली , “ पहले ᳯटᳰकट बᳰढ़या से रख लो ऊपर वाला जेब मᱶ। ” “ हाँ , रख िलए हᱹ। ” संतोष एक बड़े बैग मᱶ ᳰकताबᱶ डालने लगा। “ ᳰकताब यहाँ से ढो के केतना ले जा रहे हो वहाँ तो खरीदबे करोगे ! यहाँ से ᳰद᭨ली ले जाने का या मतलब ?” िवनायक बाबू अपना च᭫ मा पहनते ᱟए बोले। संतोष ने एक नजर उनकᳱ तरफ देखा और ᳰफर ᳰकताबᱶ ठूँसते ᱟए कहा , “ पुराना वाला एनसीईआरटी रख रहे हᱹ। वहाँ मुि᭫ कल से िमलता है। खाली नया वाला ᭔यादा िमलता है जबᳰक ᮧ᳤ पुरनका से ही िभड़ता है। बेिसक तैयारी पुरनके से करना होता है। ” बेटे कᳱ तैयारी को लेकर यह समझदारी और ल᭯ य के ᮧित अभी से इतनी गंभीरता देख िवनायक बाबू एकदम रोमांिचत और उसे ᳰद᭨ली भेजने के अपने िनणᭅय के ᮧित आ᳡᭭ त हो रहे थे। उ᭠हᱶ लगने लगा था ᳰक अभी रह - रहकर आँखᲂ मᱶ चमक जाने वाली लाल बᱫी ज᭨द ही आँखᲂ से िनकल उनके दरवाजे पर खड़ी होगी। तब तक माँ ना᭫ ते कᳱ थाली लेकर आ गई , “ चलो ज᭨दी से खा लो दो ठो पराठा भुिजया , पापा खा िलए हᱹ। ” संतोष ने जैसे - तैसे डेढ़ पराठा खाया और बैग - झोला लेकर बाहर बरामदे वाली चौकᳱ पर रखकर वुडलᱹड के जूते पहनने लगा जो उसने बी ए फाइनल के ᳯरज᭨ट के बाद अभी तीन महीने पहले ही खरीदे थे। िवनायक बाबू अपनी हीरो हᲂडा पᲂछ सामने लगाकर फोन पर बितया रहे थे। माँ तब तक दही - चीनी कᳱ कटोरी लेकर बाहर िनकली , “ लो तनी सा दही खा लो। दही - चीनी से जतरा बनता है। ” सामा᭠य तौर पर इस देश मᱶ दही से दही बड़ा , ल᭭ सी , रायता के अलावा जतरा भी बनता है। यह दुिनया मᱶ और कहᱭ नहᱭ बनता। संतोष को दही एकदम पसंद नहᱭ था। कभी नहᱭ खाता था पर जतरा के नाम पर दो च᭥मच खा िलया। जतरा बनने का अथᭅ था ‘ याᮢ ा का शुभ होना। ’ तब तक िवनायक बाबू बैग को बाइक के पीछे बाँध चुके थे। गाँव ‘ डुमरी ’ से भागलपुर रेलवे ᭭ टेशन लगभग चालीस ᳰकलोमीटर पड़ता था। सड़क ऐसी थी ᳰक डेढ़ - दो घंटे तो लग ही जाते पᱟँचने मᱶ। संतोष ने माँ के पाँव छुए , पीठ पर बैग लटकाया और बाइक पर िवनायक बाबू के पीछे बैठ गया। दो कदम आगे आते ᱟए माँ ने संतोष का सर सहलाते ᱟए कहा , “ देखना उदास मत होना। खूब पढ़ना बᳰढ़या से। यहाँ का ᳲचंता एकदम नहᱭ करना। खचाᭅ के भी मत सोचना। सब भेजᱶगे पापा। तुम बस जि᭨दये खुशखबरी देना। ” कहते ᱟए माँ का गला भर आया और आँखᲂ से आँसुᲐ कᳱ धार फूट पड़ी जो माँ ने घंटᲂ से रोक रखा था और इन आँसुᲐ मᱶ भी एक खुशी थी। एक उ᭥मीद थी। आिखर बेटे के भिव᭬ य का सवाल था। कलेजे पर प᭜थर रखना ही था। इसमᱶ ददᭅ तो था पर ये बेटे के भिव᭬ य कᳱ नᱭव मᱶ डाला गया प᭜थर था। वह फूल का प᭜थर था। िवनायक बाबू बाइक ᭭ टाटᭅ कर चुके थे। “ चलो हम आते हᱹ छोड़ के और हाँ , आज दोपहर का खाना मत बनाइएगा हमारा , आने मᱶ लेट - सबेर होगा। एगो काम है डीएसी ऑᳰफस मᱶ , करते आएँगे। ” िवनायक बाबू ने बाइक बढ़ाते ᱟए कहा। भला आज खाना या बनता ! ऑᳰफस का काम तो बहाना था। आज न माँ को खाना धँसना था न िवनायक बाबू को। कलेजे का टुकड़ा इतनी दूर जा रहा था वह भी अकेले। बाइक घरᭅ से धूल उड़ाते िनकल गई। माँ देर तक गाँव के मंᳰदर वाले चौराहे तक एकटक बाइक को जाते ताकती रही। कुछ दूर िनकलते ही िवनायक बाबू ने बाइक कᳱ ᭭ पीड धीमी कर , संतोष से पूछा , “ एटीएम रख िलए हो ?” “ हाँ पापा। ” संतोष ने ऊपरी जेब पर हाथ टटोलते ᱟए कहा। “ दरमाहा वाला अकाउंट है कोई ᳰदᲥत नहᱭ होगा। ” इतना कह िवनायक बाबू ने ᳰफर ᭭ पीड बढ़ा दी। रा᭭ ते मᱶ सड़क ᳰकनारे एक ढाबे के पास िवनायक बाबू ने बाइक रोक दी। “ यहाँ का पेड़ा बड़ा ᭭ वाᳰद᳥ होता है , एक ᳰकलो बँधवा देते हᱹ। ” िवनायक बाबू ने कहा। “ नहᱭ पापा रहने दीिजए। चिलए ज᭨दी पᱟँचना है। ” संतोष बोला। िवनायक बाबू तब तक लपककर दुकान पर पᱟँच ᳰकलो भर पेड़े का ऑडᭅर दे चुके थे। “ अरे रख लो केतना भारी है , खाना - पीना ! फेर कब आओगे , छ : महीना ᳰक सालभर पर ?” उधर दुकानदार पेड़े पैक कर रहा था , “ अरे भइया , जरा ताजा वाला देना। ” िवनायक बाबू दुकानदार से बोले। उधर संतोष ने आगे बढ़कर पेड़े िलए इधर िवनायक बाबू ने झट से लपककर बगल वाली गुमटी से एक िख᭨ली पान ले ली। इस देश मᱶ अगर बेटे का जतरा दही - चीनी से बनता है तो बाप का जतरा पान से बनता है। िवनायक बाबू ने ᳰफर दुकानदार को पैसा थमाया और बाइक ᭭ टाटᭅ कर दोनᲂ िनकल गए। ᭭ टेशन पᱟँचते सवा दस बज चुके थे। बार - बार हो रही उ᳃ोषणा से पता चल रहा था ᳰक ᮝेन ᭡लेटफॉमᭅ पर लग चुकᳱ है। साढ़े दस मᱶ ᮝेन के खुलने का समय था। बाइक से झट उतर संतोष ने पीछे बंधे बड़े वाले बैग कᳱ र᭭ सी खोली , िवनायक बाबू झोला लेकर आगे बढ़े , तब तक लगभग ऊ ँ चे ᭭ वर मᱶ संतोष ने कहा , “ पापा ᭡लेटफॉमᭅ ᳯटकट ले लीिजए। ” िवनायक बाबू पहले तो अनसुने ढंग से आगे बढ़े ᳰफर एक ᭃण ᱧककर ᭡लेटफॉमᭅ ᳯटकट काउंटर कᳱ तरफ चले गए। अपने बेटे के अंदर एक सजग और कतᭅ᳞ िन᳧ नागᳯरक के गुण को देखकर वे मन - ही - मन ᮧस᳖ थे और बस इसी कᳱ लाज रखने ᭡लेटफॉमᭅ ᳯटकट कᳱ लाइन मᱶ खड़े हो गए थे। नहᱭ तो यह पहली ही बार था जब भागलपुर रेलवे ᭭ टेशन के अंदर जाने के िलए वे ᭡लेटफॉमᭅ ᳯटकट ले रहे थे। वह तो घर का ᭭ टेशन था। हमेशा का आना - जाना था। यहाँ ᳯटकट लेकर वे खुद कᳱ नजर मᱶ कतई िगरना नहᱭ चाहते थे। ᭡लेटफॉमᭅ नंबर एक पर िवᮓमिशला खड़ी थी। दोनᲂ ᭡लेटफॉमᭅ पर पᱟँच गए। संतोष ने जेब से ᳯटकट िनकाला और देखते ᱟए बोला , “ एस -3 मᱶ है 13 नं िमिडल बथᭅ ᳰदया है। ” िसिवल कᳱ तैयारी करने वाले लड़के को जब भी कोई िपता ᭭ टेशन छोड़ने जाता तो मािनए वह पीएसएलवी छोड़ने गया हो। खुशी , उ᭜साह , डर , संदेह , संभावना सब तरह के भाव चेहरे पर एक साथ ᳰदखते हᱹ। िवनायक जी तुरंत हरकत मᱶ आ गए थे। झटपट - झटपट चलते ᱟए एस -3 तक पᱟँच गए , बोगी मᱶ चढ़े और तेरह नं सीट के नीचे जाकर झोला सरका ᳰदया। तब - तक पीछे - पीछे संतोष भी बैग लटकाए आ गया। िवनायक बाबू ने लंबी साँस छोड़ते ᱟए कहा , “ चलो सामान एडज᭭ ट हो गया। आराम से जाना। िबना ᳰकसी लाग - लपेट मᱶ पड़े एकदम ल᭯ य बनाके पढ़ो। कामभर िजतना खचाᭅ हो , िनकाल लेना। एटीएम तुमको दे ही ᳰदए हᱹ। पूरा समाज का नजर है। सबको ᳰदखाना है कुछ करके। हम पैसा देने मᱶ कमी नहᱭ करᱶगे , तु᭥हारा काम मेहनत है , इसमᱶ कमी नहᱭ करना। ” असल मᱶ एक िसिवल अ᭤यथᱮ बेटे और बाप के बीच ᳯर᭫ ते का आधार इ᭠हᱭ दो परम स᭜य के आस - पास मँडराता है। िपता पैसे को लेकर िनᳲ᳟ ं त करता है और बेटा पᳯरणाम को लेकर। बेटे को खचᭅ चािहए और िपता को पᳯरणाम। ᮝेन खुलने का समय हो गया। संतोष ने िपता के पाँव छुए , पीठ पर एक जोरदार धौल वाला आशीवाᭅद देते ᱟए िवनायक बाबू बोगी से बाहर कᳱ ओर िनकलते ᱟए बोले , “ चलो , जय गणेश ! पᱟँच के फोन कर देना। ” ᳲहंदी पᲵी के ᭃेᮢ मᱶ कोई िपता तब तक बेटे को गले नहᱭ लगाता जब तक ᳰक वह खुद से कमाने - खाने न लगे। ᮝेन कᳱ सीटी बजी। रेलगाड़ी धीरे - धीरे ᭡लेटफॉमᭅ से सरकने लगी। िवनायक बाबू बाहर आ बाइक ᭭ टाटᭅ कर िनकल गए। 2. “ ᳰद᭨ली घुस गया। ᭭ टेशन पर लग रहा है। तेरह नं पर लग रहा है। ” अचानक पैसᱶजर कᳱ हलचल और बातᲂ से संतोष कᳱ आँख खुली। साथ के पैसᱶजर सीट के नीचे से अपने - अपने सामान खᱭच रहे थे। संतोष ने आँख मलते ᱟए पूछा , “ ᳰद᭨ली आ गया या ?” “ हाँ , उतᳯरए आ गया महराज। ” एक पैसᱶजर ने चलते - चलते कहा। रात भर मोबाइल पर गाना सुनते - सुनते कब नᱭद आई और कब ᳰद᭨ली , संतोष को पता ही नहᱭ चला। संतोष तुरंत िमिडल बथᭅ से नीचे कूदा , अपने जूते खोजने लगा। संतोष का तो एकदम ᳰदल धक कर गया। “ ये या ! ᳰद᭨ली पᱟँचते ही झटका। नया पᲬीस सौ का वुडलᱹड गायब !” ᳰफर उसने गदᭅन नीचे कर सीट के कोने मᱶ देखा तो पाया ᳰक उसके दोनᲂ जूते वहᱭ दुबके पड़े थे। उसने हाथ से खᱭचकर जूते िनकाले। एक मोजा गीला था। शायद रात को ᳰकसी ने खाते वᲦ पानी िगरा ᳰदया था। संतोष ने िबना सोचे बैग कᳱ िजप खोल मोजे उसमᱶ डाल ᳰदए और केवल जूते पहन ज᭨दी - ज᭨दी बोगी से बाहर िनकला। अपने पᱹट कᳱ िपछली जेब से कागज का एक टुकड़ा िनकाला और उसमᱶ िलखवाए गए िनदᱷश को पढ़कर एक नजर अपने दाएँ - बाएँ डाली। बा ओर उसे अजमेरी गेट कᳱ तरफ जाने के िलए तीर का िनशान ᳰदखा। संतोष उसी ᳰदशा मᱶ चलते ᱟए ᭭ टेशन से बाहर आ गया। “ मेᮝो ᭭ टेशन ᳰकधर पड़ेगा ?” संतोष ने एक सᲯन से पूछा। “ वो सामने ही तो है , ले᭢ट मᱶ भई। ” सᲯन ने चलते - चलते बताया। संतोष ने धीरे से थᱹस कहा , हालाँᳰक इतनी िमिमयाई आवाज वाली थᱹस उस सᲯन तक पᱟँचने से पहले वह जा चुका था। मेᮝो कᳱ सीᳰढ़यᲂ से नीचे उतरते ही उसने सबसे पहले ᳯटकट काउंटर कᳱ तरफ नजर दौड़ाई। सारे काउंटर पर मधुमखी के छᱫे जैसी भीड़ थी। बीच मᱶ लाइन तोड़कर घुसने का मतलब था कोई भी भनभना के काट सकता था। तभी उसकᳱ नजर लाइन मᱶ काउंटर से पाँचवᱶ नंबर पर खड़े हाथ मᱶ एक भारी - सा झोला िलए लगभग साठ - पᱹसठ बरस के बुजुगᭅ पर पड़ी। उसने इधर - उधर देखा और तुरंत उस बुजुगᭅ के करीब जाकर बोला , “ चाचा , ये िव᳡िव᳒ ालय का ᳯटकट यहᱭ िमलेगा ?” “ सारी ᳰद᭨ली का यहᱭ िमलेगा बेटे , तुझे जाना कहाँ है ?” बुजुगᭅ ने उसकᳱ आधी बात सुने िबना पूछा। “ जी , हमको िव᳡िव᳒ ालय जाना था। ” संतोष ने थोड़ा ᭭ प᳥ ᭭ वर मᱶ कहा। “ टोकन िमलता है , टोकन बोिलयो ᳯटकट नहᱭ। ” बुजुगᭅ ने लगभग नसीहत के अंदाज मᱶ कहा। “ चाचा , लाइए मᱹ आपका झोला पकड़ लूँ। बᱟत भारी होगा। ” संतोष ने एकदम होिशयारी भरी िवन᮫ ता से कहा। “ बेटे , झोला छोड़। पीछे जा के लाइन पकड़ ले। लाइन लंबी होती जाएगी। तेरे को झोला - वोला पकड़ने कᳱ जᱨरत नहᱭ। चाँदनी चौक जा रहा ᱠँ। कॉटन है इसमᱶ। कोई भारी - सारी नहᱭ है। चालीस साल से यही पकड़े चल रहा ᱠँ। ओए आगे बढ़ो भई। ” बुढ़ऊ ने संतोष को कहते ᱟए आगे वाले को खᲂचा। “ अरे कपार पर चढ़ जाएँ आगे जाके या , टोकन दे नहᱭ रहा है। आगे वाला बढ़ेगा तब न बढ़ᱶगे कᲂच रहे हᱹ पीछे से एकदम। ” बूढ़े के आगे वाले ᳞ िᲦ ने खीज से कहा। बूढ़ा समझ गया आगे वाला आदमी चालीस बरस का होकर भी िमजाज मᱶ उसका बाप है। सो उसने चुप रहना ठीक समझा। तब - तक बूढ़े के ठीक पीछे वाले ᳞ िᲦ ने बूढ़े के कंधे पर कान ले जाकर पूछा , “ या ᱟआ अंकल ?” “ कुछ नई जी , टोकन नूँ घुस रहा था लᲅडा। अजी हम लाइन मᱶ खड़े हᱹ इᱫी देर से बेवकूफ हᱹ या , कह रहा था , लाइए आपकᳱ पकड़ दूँ। अबे मेरी या पकड़ेगा , अपनी पकड़ हᱶ। ” बुᲺे ने िबना पीछे मुड़े कहा। इतना सब सुन संतोष मन - ही - मन बुढ़ऊ को गᳯरयाता ᱟआ पीछे लाइन मᱶ जाकर खड़ा हो गया। अब तक लाइन और लंबी हो गई थी। अभी - अभी गाँव से िनरीह बुढ़ापा देख आए संतोष को ᳰद᭨ली का सयाना बुढ़ापा एकदम अमरीश पुरी टाइप लगा। सोचने लगा , ‘ साला , चाचा श᭣द भी फेल हो गया। हम सबके तरफ तो चाचा कहने कᳱ गमाᭅहट से चोर - डकैत , पुिलस - दरोगा जैसा मोटा चदरा भी िपघल जाता है। यहाँ साला छेद तक नहᱭ ᱟआ। ’ उसकᳱ अपनी भावना मᱶ समझा जाए तो मूड झँटुआ गया था उसका। ‘ झँटुआना ’ आदमी के िख᳖ होने कᳱ चरम अव᭭ था को कहते हᱹ। लगभग बीस िमनट तक खड़े लाइन मᱶ चलने के बाद उसका नंबर आया। “ भइया एक िव᳡िव᳒ ालय ᭭ टेशन का टोकन दे दीिजए। ” संतोष ने पाँच सौ का नोट देते ᱟए कहा। “ चᱶज दे दो भई। ” काउंटर वाले ने कहा। “ चᱶज नहᱭ है सर। ” संतोष ने ᭭ वर नीचे करके कहा। “ चलो देख लो भई , हटो साइड आ जाओ। पीछे वाले को आने दो। ” काउंटर वाले ने अपना हाथ उचकाते ᱟए कहा। संतोष एकदम िख᳖ मन से साइड हो गया। “ साला , सर श᭣द भी फेल। ” यही सोचा उसने मन मᱶ। उसके सारे श᭣द चुके जा रहे थे यहाँ। वह धीरे - धीरे समझ रहा था ᳰक यह शहर श᭣दᲂ से परे है , भावनाᲐ से परे है। संतोष साइड मᱶ खड़ा लोगᲂ ᳇ारा ᳰदए जा रहे हर नोट को बड़ी उ᭥मीद से देख रहा था ᳰक ज᭨द पाँच सौ का खुदरा पूरा हो जाए। “ लाओ ज᭨दी से पैसे , कहाँ का दूँ ?” अचानक अपने पैसे वाले दराज को देखते ᱟए काउंटर वाले ने संतोष से कहा। संतोष ने साइड से ही खड़े - खड़े झट से अपना हाथ काउंटर के शीशे के गोल छेद मᱶ घुसा ᳰदया और बोला , “ हाँ , िव᳡िव᳒ ालय का चािहए सर। ” टोकन लेकर संतोष अंदर ᭡लेटफॉमᭅ पर जाने कᳱ लाइन मᱶ खड़ा हो गया। लाइन मᱶ आगे सरकते ᱟए जैसे ही उसने अपने दोनᲂ बैग और झोला ᭭ कैनर मशीन मᱶ डाले एक ᭃण मᱶ ही यह िवचार उसके मन मᱶ कᲅध गया ᳰक ᭭ कैᳲनंग मᱶ सᱫू , ठेकुवा , िनमकᳱ और िलᲵी का फोटो देख पता नहᱭ या छिव बन जाएगी इन जाँच करने वाले िसपािहयᲂ के मन मᱶ। एकदम देहाती समझᱶगे पᲥा। बैग के मशीन से बाहर िनकलते ही यह डर भी मन से िनकल गया। बैग उठाकर संतोष ने एंᮝी गेट पर टोकन टच कराया और गेट के खुलते ही िबजली कᳱ फुतᱮ से इस तरह उस पार ᱟआ जैसे नाथुला दराᭅ हो , जो बस एक पल के िलए खुला है और ᳰफर तुरंत बंद हो गया तो पता नहᱭ कब तक इसी पार चीन मᱶ रहना होगा। हड़बड़ाहट मᱶ अपना बैग उसने इसी पार छोड़ ᳰदया। संतोष गेट के उस पार से अपने बैग को ऐसे देखने लगा जैसे गदर ᳰफ᭨म मᱶ स᳖ ी देओल ने सीमा पार अमीषा पटेल को देखा था। उसे लगा मेरा बैग अब उसी पार रह जाएगा। तब तक एक ᳞ िᲦ ने उसका बैग उसे पकड़ाया। उसे अब जाकर चैन िमला। िव᳡िव᳒ ालय जाने वाली मेᮝो आ गई , दरवाजा खुलते ही कोई तीन - चार ᳞ िᲦ नीचे उतरे और लगभग दो - ढाई सौ लोग उसपर सवार हो गए। संतोष भी लटक - झटककर चढ़ गया। सोच रहा था ᳰक जब से ᮝेन से उतरा ᱠँ साला एक िमनट का चैन नहᱭ है। हर जगह सम᭭ या है। कहᱭ शांित नाम का चीज नहᱭ है। कहाँ मराने आ गए। सब कहे थे मेᮝो मᱶ आराम है। झाँट आराम है इसमᱶ , कटहल के जैसा आदमी लोड है ! सोचते - सोचते वह अब िव᳡िव᳒ ालय ᭭ टेशन पᱟँच चुका था। मेᮝो से बाहर आ उसने एक आदमी से पूछा , “ हैलो , ये मुखजᱮ नगर बᮢ ा चौक के िलए कहाँ से ऑटो िमलेगा ?” “ वो सामने से िमल रहा है , पकड़ लो। ” उस आदमी ने कहा। ऑटो पर बैठते ही संतोष ने ऑटो वाले से कहा , “ भइया मुखजᱮ नगर , बᮢ ा चौक पर रोक दीिजएगा। ” “ टᱶशन मत लो भई वहᱭ तक जाएगी। ” ऑटो वाले ने बेᳰफᮓ अंदाज मᱶ कहा और फुल वॉ᭨यूम मᱶ पंजाबी गाना बजाने लगा। अगले दस िमनट बाद संतोष मुखजᱮ नगर के बᮢ ा िसनेमा के सामने खड़ा था। चंᮤ यान चाँद पर पᱟँच चुका था। 3. अब संतोष अपने सपनᲂ के नगर ‘ मुखजᱮ नगर ’ मᱶ खड़ा था। चारᲂ तरफ सफल अ᭤यᳶथᭅयᲂ के पो᭭ टर - ही - पो᭭ टर। इनकᳱ सफलता का िश᭨प रचने वाले महान कारीगरᲂ के नामचीन कोᳲचंग के होᳺडᲈस। िभ᳖ - िभ᳖ मुᮤ ाᲐ मᱶ बातचीत और ᳲचंतन कर आ - जा रहे भिव᭬ य के िसिवल सेवक। जूस कᳱ दुकान पर सूखे और बाढ़ कᳱ चचाᭅ। चाय कᳱ दुकान पर जीडीपी पर बहस। कोᳲचंग से छूटे ᳰकताब से भरे बैग वाले छाᮢ का तुरंत ᳰकताबᲂ कᳱ दुकान पर ये ᳰदल माँगे मोर टाइप से ᳰकताब ढूँढ़ना। ठीक वैसी नजर से जैसे बगुला सागर मᱶ मोती ढूँढ़ रहा हो। पराठे कᳱ दुकान पर आतंकवाद से िनपटने कᳱ चचाᭅ। ऐसा अ᭞भुत नगर था मुखजᱮ नगर। अभी - अभी मुखजᱮ नगर उतरा संतोष जो अपने ᳰदल मᱶ तैयारी का एक दीया िलए उतरा था ऐसे दृ᭫ यᲂ को देखकर अब वो कुछ ही पल मᱶ मशाल बन चुका था। िबजली के खंभᲂ और पेशाबघरᲂ मᱶ लगे एक से नौ सौ रᱹक तक के सभी सफल छाᮢ ᲂ के पो᭭ टर मᱶ संतोष खुद को महसूस कर रहा था। वह इस नयी दुिनया का िह᭭ सा बनकर गौरवाि᭠वत था। दस से पंᮤ ह िमनट तक इस एहसास को पी लेने के बाद उसने अपने फोन मᱶ एक नंबर डायल ᳰकया। “ हैलो , हाँ रायसाहब नम᭭ कार ! हम संतोष बोल रहे हᱹ। यहाँ मुखजᱮ नगर पᱟँच गए हᱹ। ” संतोष ने कहा। उधर से रायसाहब कᳱ आवाज आई , “ ᭭ वागत है। ᭭ वागत है भाई। कहाँ पर हᱹ अभी आप खड़ा ? “ जी , ये बᮢ ा िसनेमा के ठीक सामने खड़े हᱹ। एक ठो जूस का दुकान है उसी के पास हᱹ। ” संतोष ने इधर - उधर नजर टटोलते ᱟए कहा। “ बस दस िमनट ᱧᳰकए वहᱭ , हम आते हᱹ। ” कहकर रायसाहब ने फोन काटा। संतोष कᳱ रायसाहब से मुलाकात बोकारो मᱶ एक शादी के दौरान ᱟई थी। रायसाहब ने तभी संतोष को अपना पता - ᳯठकाना और नंबर देते ᱟए कहा था , “ अगर ᳰद᭨ली मᱶ मन हो तैयारी करने का तो जᱨर बताइएगा। ” रायसाहब का पूरा नाम कृपाशंकर राय था। वे मूलत : यूपी के गाजीपुर से थे। रायसाहब िपछले पाँच साल से मुखजᱮ नगर मᱶ तैयारी के िलए रह रहे थे। िपछले साल ही उ᭠हᲂने अपने तीसरे ᮧयास मᱶ आईएएस कᳱ मुय परीᭃा दी थी। इलाहाबाद िव᳡िव᳒ ालय से इितहास मᱶ एम ए करने के बाद उ᭠हᲂने बी एड भी कर रखा था। ᳰकसान पᳯरवार से थे पर ᳰकसानी ठीक - ठाक थी , िपता खेती - बाड़ी से मजबूत थे। कृपाशंकर के झड़ते बाल और तेजी से लटकती झु᳷रᭅयᲂ के अदब मᱶ साथी उ᭠हᱶ ‘ रायसाहब ’ कहते थे। “ अरे लीिजए आ ही गए आप भी आईएएस बनने !” सामने से आते ही संतोष को गले लगाते ᱟए रायसाहब ने कहा। “ देिखए। अब आपकᳱ शरण मᱶ हᱹ , जो बना दीिजए। आईएएस या आईपीएस। ” संतोष ने अपनी चॉइस बताते ᱟए कहा। बातᲂ से ᭭ प᳥ था वह राज᭭ व सेवा मᱶ नहᱭ जाना चाहता था। पाँच फᳱट छ : इंच। अंडर शटᲈग ᳰकए ᱟए। खुद से िसलवाया ᱟआ सफेद पर ᳰफरोजी चेक कᳱ शटᭅ और काली पᱹट पहने। बड़ा बकलस वाली बे᭨ट। िबना ᮨ े म का च᭫ मा लगाए और पैरᲂ मᱶ सफेद मोजे पर अपनी साइज से दो नंबर ᭔यादा का लाल कलर का ᭢लोटर पहने रायसाहब एकदम दो हजार सात मॉडल अर᭭ तु लग रहे थे। “ चिलए ᱨम पर चलते हᱹ। ” रायसाहब ने हाथ से इशारा करते ᱟए कहा। “ हाँ चिलए , देखᱶ आपका महल। ” संतोष ने भरे उ᭜साह से कहा। “ महल नहᱭ कुᳯटया किहए। तप᭭ या करना होता है। ” रायसाहब ने मु᭭ कुराते ᱟए कहा। “ कहाँ ᱨम है आपका ?” संतोष ने पूछा। “ बस यहᱭ पाँच िमनट मᱶ नेहᱧ िवहार मᱶ है। चिलए न पैदल ही पᱟँच जाएँगे। ” रायसाहब ने कदम बढ़ाते ᱟए कहा। “ अ᭒छा , ये सब इलाका मुखजᱮ नगर मᱶ ही है ना ?” संतोष ने पूछा। “ हाँ , यहाँ सारी कोᳲचंग हᱹ और बस नाले के पास सटा ᱟआ है नेहᱧ िवहार। सब एक ही एᳯरया है। ” “ नाले के पार ?” संतोष ने नाक िसकोड़ते ᱟए कहा। “ घबराइए नहᱭ , उस पर पुल बना ᱟआ है। नाला तैर कर नहᱭ जाना है। ” रायसाहब ने कहा। दोनᲂ ठहाका मार हँसने लगे। संतोष रायसाहब कᳱ वाकपटुता पर मोिहत होने लगा था। मन - ही - मन सोचा , ‘ ये होती है खास बात आदमी मᱶ , ऐसे नहᱭ मᱶस दे ᳰदया है आईएएस का। ’ संतोष बड़ा वाला बैग दोनᲂ हाथᲂ से पकड़े , छोटा वाला पीठ पर लटकाए रायसाहब के साथ चलने लगा। तैयारी करने के िलहाज से पाँच साल जूिनयर होने के कारण उसने खुद से सीिनयर रायसाहब को बैग पकड़ने के िलए देना उिचत नहᱭ समझा। दूसरी तरफ पहले से ही कपार पर ᭄ान का बोझ उठाए रायसाहब ने अपनी तरफ से अितᳯरᲦ बोझ उठाना जᱨरी नहᱭ समझा। कुछ ही िमनट मᱶ दोनᲂ नाला पार कर नेहᱧ िवहार के ᭢लैट नंबर 394 के नीचे पᱟँच गए। संतोष ने मकान देखते ही कहा , “ महराज एकदम झकास है रायसाहब , पूरा ले िलए हᱹ या ?” रायसाहब ने मु᭭ कुराते ᱟए कहा , “ अंदर तो आइए , ऊपर थडᭅ ᭢लोर पर है अपना , इसमᱶ चार ᭢लोर है। आठ लड़का रहता है। सब ᭢लोर पर पᲬीस गज का एक कमरा है। देिखएगा थोड़ा सीढ़ी पर सर बचाकर चि़ढएगा। ” “ ᳰकतने का है रायसाहब कमरवा ?” संतोष ने पूछा। “ चार हजार ᭡लस िबजली पानी है संतोष जी। ” रायसाहब ने आँखᱶ तरेरकर बताया। ऊपर कमरे तक पᱟँचते संतोष का दम फूल चुका था। इतना भारी बैग लेकर चढ़ना एवरे᭭ ट कᳱ चढ़ाई जैसा था। दमे के मरीज कᳱ तरह हाँफ रहा था बेचारा। रायसाहब ने ताला खोला और दरवाजे को अंदर कᳱ तरफ धकेला। घुसते ही संतोष को एक ऐसी गंध आई िजसे उसने इससे पहले कभी महसूस नहᱭ ᳰकया था। एकदम नया , िघनहा ᭢लेवर था। दुगᲈध मᱶ भी इतनी वेराइटी होती है यह संतोष ने अभी - अभी जाना था। ऐसी दुगᲈध भागलपुर स᭣जी मंडी मᱶ , बरसात के ᳰदनᲂ मᱶ भी नहᱭ सूँघी थी उसने। ओकाई आने लगी पर मजबूरी मᱶ अगले ही ᭃण उसने अपने ᳩायु तंᮢ ᲂ पर िनयंᮢ ण कर उस दुलᭅभ दुगᲈध से अनुकूलता िबठाकर खुद को एडज᭭ ट कर िलया था। ᳰद᭨ली उतरते ही समझौतावादी हो गया था बेचारा संतोष। “ आपको कुछ महका या संतोष भाई ?” रायसाहब ने संतोष को नाक िसकोड़ते देखते ही पूछा। “ नहᱭ - नहᱭ ! ᱨम बंद होगा न , इसिलए। वैसे ठीक है। ” संतोष ने नाक पर एक हाथ ᳰफराकर कहा। “ अरे जब आपका फोन आया तब हम खाना का ᳯटᳰफन खोले थे , ऐसे ही खुला छोड़ िनकल गए। वही थोड़ा ᭭ मेल मार रहा है। ” रायसाहब ने खुले ᳯटᳰफन को चटाई से हटाते ᱟए कहा। संतोष के िलए सोचना लािजमी था ᳰक जब खाना ऐसा गंध कर रहा है तो बाथᱨम कᳱ दशा या होगी। संतोष को ᱨम पर िबठाकर राय जी दूध का पैकेट लाने नीचे चले गए। संतोष ने कुसᱮ पर बैठे - बैठे एक नजर उस पूरे कमरे पर दौड़ाई। दरवाजे से घुसते ही बा ओर दुलᭅभ शौचालय था। उसकᳱ दशा देख कोई भी रायसाहब के सामािजक दायरे का अंदाजा लगा सकता था। दुगᲈध बता रही थी ᳰक ᳰदन भर मᱶ कम - से - कम पंᮤ ह लोग जᱨर उस बाथᱨम मᱶ मूतने जाते हᲂगे , वो भी िबना पानी डाले। बाथᱨम से बाहर एक बेिसन था िजसमᱶ नल के पास च᭡पलᱶ खᲂसी ᱟई थᱭ। पान कᳱ पीक और गुटखा ऐसा अटा पड़ा था जैसे चौरिसया पान भंडार का िपछवाड़ा हो। ᳰकचन मᱶ अखबार और जूते रखे ᱟए थे , चूँᳰक खाना ᳯटᳰफन का आता था सो वहाँ कुछ और रखने का मतलब नहᱭ था। कभी - कभार इमरजᱶसी के िलए एक छोटा िसलᱶडर और कुछ समझ नहᱭ आने वाली सामᮕी एक कोने मᱶ रखी ᱟई थी। कमरे के अंदर एक कोने पर एक रैक मᱶ मोटी - मोटी िवशालकाय ᳰकताबᱶ रखी ᱟई थᱭ। एक रैक के िनचले शे᭨फ मᱶ एनसीईआरटी कᳱ ᳰकताबᱶ और उसके ऊपर बादाम का िड᭣बा रखा ᱟआ था। दूसरे शे᭨फ पर घी कᳱ शीशी , बनफूल तेल , इसबगोल कᳱ भूसी और बाल झड़ने कᳱ कुछ दवाइयाँ रखी ᱟई थᱭ। ऊपर के शे᭨फ पर एक बड़ा - सा दपᭅण , पतंजिल का फेसवाश , पतंजिल का मुर᭣बा , पतंजिल का दंतकांित टूथपे᭭ ट , पतंजिल का आँवला जूस , मु᭨तानी िमᲵी , घृतकुमारी तेल और पतंजिल कᳱ अजवाइन एवं हरड़ पाचक रखे ᱟए थे। पतंजिल के इतने सारे ᮧोडट देखकर कोई भी कह सकता था ᳰक शायद पतंजिल का यूपीएससी के साथ कोई ᳞ ापाᳯरक करार ᱟआ हो। बैड से सटे टेबल पर पᮢ - पिᮢ काᲐ का एक बड़ा - सा टीला खड़ा था। दीवार पर एक तरफ भारत और िव᳡ के नशे िचपके ᱟए थे और उन पर कई िवशेष जगहᲂ पर लाल - हरे ᭭ केच से गोले ᳰकए ᱟए थे , जैसे ᳰकसी गड़े खजाने कᳱ खोज का िमशन हो। दीवार पर एक तरफ हनुमान जी और माँ काली कᳱ बड़ी - सी त᭭ वीरᱶ ᭣लैक टेप से िचपकाई गई थᱭ। बैड के िसरहाने पंᮤ ह - बीस प᳖ ᲂ मᱶ िलखे िसलेबस को साटा गया था। जो जगह बची ᱟई थी , वहाँ मुय खबर वाली अखबार कᳱ कतरन को साट ᳰदया गया था। पूरे कमरे को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे पहाड़ी दवाखाने वाले वै᳒ का तंबू हो। पᲬीस गज के इस कमरे मᱶ बेड , मेज , कुसᱮ , रैक , समेत बाकᳱ सामान रखने के बाद बस इतनी - सी ही जगह बची थी जहाँ संतोष ने अभी - अभी अपना बैग रखा था। संतोष ने मन - ही - मन सोचा ‘ सचमुच तप᭭ या कर रहे हᱹ लोग यहाँ। ’ 4. “ चिलए , पहले आपको म᭭ त अदरक वाला चाय िपलाते हᱹ। ” दूध का पैकेट लेकर आए रायसाहब ने कहा। “ लाइए हम बनाते हᱹ। ” संतोष ने औपचाᳯरकतावश बोल ᳰदया। “ अरे नहᱭ महराज , आप जाइए ज᭨दी ᮨ े श हो लीिजए। बाथᱨम मᱶ देखते हᱹ हम पानी आ रहा है ᳰक नहᱭ। ” कहते ᱟए रायसाहब ने बाथᱨम मᱶ नल चलाया , पानी आ रहा था। संतोष बाथᱨम जाने के नाम से ही िसहर गया था। मन - ही - मन सोचा भला इस बाथᱨम से कोई ᮨ े श होकर कैसे िनकल सकता है। “ बस हम ᮩ श कर लेते हᱹ। ” कहकर संतोष बेिसन पर ही मुँह धो वापस कुसᱮ पर बैठ गया। तब तक चाय बन गई थी। “ आइए चाय लीिजए , िब᭭ कुट दूँ या ?” रायसाहब ने ᮧ᳤ वाचक मुᮤ ा मᱶ पूछा। “ नहᱭ बस चाय ही रहने दीिजए। ” संतोष ने समझते ᱟए कहा। “ और बताइए कैसी रही याᮢ ा , कैसा लग रहा है ᳰद᭨ली ?” रायसाहब ने इ᭜मीनान से बैड पर बैठते ᱟए पूछा। “ बᳰढ़या रहा , ᮝेन भी बस दो ही घंटा लेट था , यहाँ आने मᱶ भी कोई ᳰदᲥत नहᱭ ᱟआ। हाँ साला यहाँ का बुᲺा लोग बड़ा हरामी टाइप है हो रायसाहब। ” संतोष ने चाय सुड़कते ᱟए कहा। रायसाहब ने उ᭜सुकता से पूछा , “ या ᱟआ था ऐसा ?” संतोष ने चाय टेबल पर रखते ᱟए मेᮝो पर िमले बुजुगᭅ वाली घटना बताई। रायसाहब ने गंभीर मु᭭ कान चेहरे पर िलए बड़ी बारीकᳱ से सारी बात सुनी और बोले , “ देिखए संतोष जी , पहली बात तो ये है ᳰक हरामी होना उ᮫ िनरपेᭃ है। आदमी ᳰकसी भी उ᮫ मᱶ बुरा हो सकता है। कोई छोटा बᲬा ᳞ ᭭ क से ᭔यादा बुरा हो सकता है तो कोई बूढ़ा उस बᲬे से ᭔यादा बुरा हो सकता है। ये तो एक पᳯरि᭭ थितज᭠य अव᭭ था है और इस बात पर िनभᭅर है ᳰक ᳰकसे , कैसे पᳯरवेश मᱶ िशᭃा - दीᭃा िमली है। वो कैसे समाज मᱶ रहा है। इसिलए ये कह देना ᳰक यहाँ के सारे बुᲺे खराब हᱹ , मᱹ नहᱭ मानूँगा। हमने गाँव मᱶ भी कई खराब बुᲺे देखे हᱹ और यहाँ ᳰद᭨ली मᱶ कई अ᭒छे िवन᮫ बुजुगᭅ भी देखता ᱠँ। खुद हमारे नीचे वाले अंकल एक बेहद अ᭒छे इंसान हᱹ सो आप बस एक आदमी के ᳞ वहार के आधार पर पूरे वगᭅ या समुदाय के ᮧित कोई धारणा नहᱭ बना सकते। यही गलती दुिनया के कई इितहासकारᲂ और समाजशािᳫयᲂ ने कᳱ है। वही गलती , वही गलती आप दुहरा रहे हᱹ जो ᳰकसी िसिवल सेवा कᳱ तैयारी करने वाले छाᮢ से तो कᱫई नहᱭ होनी चािहए। ” यह कह रायसाहब ने चाय सुड़कᳱ। संतोष तो बस आँख गोल ᳰकए एकटक रायसाहब को देखे और िनबाᭅध सुने जा रहा था। उसने सोचा भी नहᱭ था ᳰक उसकᳱ छोटी - सी बात इितहास कᳱ गलती दोहराने वाली सािबत हो सकती थी। वह उस गंध मारते कमरे मᱶ रायसाहब के चंदन - से गमकते दाशᭅिनक िवचारᲂ से महक उठा। उसने मन - ही - मन रायसाहब कᳱ बौिकता का लोहा मानते ᱟए सोचा , ‘ वाह रे लड़का ! ये होता है समझ। यही Ფािलटी है जो मᱶस िलखे हᱹ। मजाक थोड़े है , ऐसी छोटी - सी बात के पीछे का बड़ा अथᭅ पकड़ना। ’ वह मन - ही - मन इस बात के िलए भी रायसाहब का आभार ᮧकट कर रहा था ᳰक उ᭠हᲂने संतोष को अभी - अभी िसिवल सेवा ᮧितयोगी कᳱ िज᭥मेदारी और ओहदे का भान कराया था जो संतोष ने रात भर कᳱ याᮢ ा मᱶ हािसल ᳰकया था। कल तक संतोष केवल एक छाᮢ था पर आज वह िसिवल - सेवा ᮧितयोगी हो गया था। इसकᳱ एक अलग िज᭥मेदारी होती है। समाज और अपने युग के ᮧित इसके िवशेष दािय᭜व होते हᱹ। संतोष कᳱ चाय रखी - रखी ठंडी हो चुकᳱ थी पर िमजाज मᱶ एकदम गमाᭅहट आ गई थी। “ आप ठीके कह रहे हᱹ रायसाहब। असल मᱶ , हम अभी उस तरह से नहᱭ सोच पा रहे हᱹ िजस तरह से आप लोग सोच लेते हᱹ। ” संतोष ने चेल᭜व भाव मᱶ कहा। “ हाँ , हो जाएगा धीरे - धीरे। अभी तो आए ही हᱹ आप। हम लोग भी नया मᱶ कहाँ ऐसा सोच पाते थे ! पर रहे। सौ तरह का ᳰकताब पढ़े। कई चीज को देखे , छुए , समझे , तब जाके सोच िवकिसत ᱟआ है। ” रायसाहब ने गुᱧ᭜व भाव मᱶ कहा। इसी बीच संतोष कᳱ जेब मᱶ रखा मोबाइल बजा ‘ पटना से पाजेब बलम जी , आरा से हᲂठलाली ... मंगाई द छपरा से चुनᳯरया छᱭट वाली। ’ “ हाँ ! हेलो , ᮧणाम पापा !” संतोष ने कहा। “ हाँ , खुश रहो ! अरे पᱟँच गए ? फोन भी नहᱭ ᳰकए ! टᱶशन हो रहा था यहाँ। ” उधर से िवनायक बाबू बोले। “ हाँ , पापा ! मोबाइल िड᭭ चाजᭅ हो गया था। पᱟँच गए हᱹ। ” ᳰफर संतोष ने रायसाहब को एक बार गौर से देखा , मु᭭ कुराया और एक बार ᳰफर अपने पापा से बोला , “ एकदम सही जगह पᱟँच गए हᱹ। ” संतोष तो अभी रायसाहब कᳱ बौिकता के ताप से पककर पᳯरपᲤ होने कᳱ रासायिनक ᮧᳰᮓया मᱶ था। रायसाहब ने इसी ᮧᳰᮓया को आगे बढ़ाते ᱟए संतोष को टोका , “ ये आपने ᳳरंगटोन ᳰकसका लगाया है संतोष भाई ?” “ अरे आप तो जानते ही हᲂगे भरत शमाᭅ ᳞ ास का माटी से जुड़ा बड़ा िहट लोकगीत है ये। ” संतोष ने गवᭅ से कहा। पर अगले ही पल सारा गवᭅ कपूर कᳱ तरह उड़ गया। “ आप कैसा गीत सुनते हᱹ ! कैसे गानᲂ का ᳳरंगटोन रखते हᱹ ! मोबाइल का वालपपेर कैसा है ! इन चीजᲂ से भी लोग आपके ᳞ िᲦ᭜व का मू᭨यांकन करते हᱹ। सो , इन चीजᲂ के चयन मᱶ आपको सावधानी बरतनी चािहए। ये जो गाना आपने लगाया है ᳳरंगटोन मᱶ ये बजेगा तो कोई या सोचेगा ? एकदम से लंफट छेछड़ा वाला फᳱᳲलंग आ रहा है , बताइए। छोिड़ए ये भोजपुरी - ओजपुरी का मोहमाया , ᭭ टᱹडडᭅ बढ़ाइए। आप एक बार हमारे पर माᳯरए िमसकाल। ” रायसाहब ने एक साँस मᱶ कहा। “ हर घड़ी बदल रही है ᱨप ᳲजंदगी , छाँव है कहᱭ , कहᱭ है धूप ᳲजंदगी ...” संतोष के कॉल लगाते ही यही गाना बजा रायसाहब के मोबाइल पर। रायसाहब ने बैड पर से तᳰकया ले पैर के नीचे डाला और एकदम संत के आसन मᱶ बैठ वाचना शुᱨ ᳰकया , “ देिखए मेरा ᳳरंगटोन माना ᳰफ᭨मी है शाहᱨख पर ᳰफ᭨माया गया है लेᳰकन गीत मᱶ एक मैसेज छुपा है। ये गीत कल हो न हो , जीवन कᳱ न᳡रता को दशाᭅने वाला गीत है। ये बु के ᭃणभंगुरता पर आधाᳯरत गीत है। ये िस नाथ परंपराᲐ का गीत है। ये भारत के ष᭙दशᭅन के कोख से िनकला ᱟआ एक संि᳣ ᳥ गीत है। यह भौितकवादी ᳲचंतकᲂ के ᳲचंतन से उपजा ᱟआ गीत है , जो हमᱶ आज के िलए जीने को ᮧेᳯरत करता है। देसी भाषा मᱶ अगर समझᱶ तो ये कल करे सो आज कर वाली कहावत पर आधाᳯरत गीत है , गीत मᱶ हर घड़ी बदलते ᱟए जीवन के पᳯरवतᭅनशील ᭭ वᱨप पर ᮧकाश डाला गया है। ऐसा गीत जहाँ बज जाता है लोगᲂ को एक िशᭃा देता है आप भी अब िसिवल अि᭭ परᱶट हो चुके हᱹ। ऐसा ही कोई गीत बना लीिजए ᳳरंगटोन। ” “ अब आप ही कौनो सेट कर दीिजए। ” संतोष ने एकदम समपᭅण भाव से कहा। “ अ᭒छा हम देखते हᱹ कोई मीᳲनंगफुल गाना , जो िसिवल अि᭭ परᱶट पे ᳰफट करेगा। आपको कल तक दᱶगे खोज के। ” रायसाहब ने उसे भरोसा देते ᱟए कहा। संतोष ने त᭜काल फोन को वाइᮩ े शन मोड मᱶ डाल ᳰदया। संतोष का मन रायसाहब कᳱ बौिकता को सलाम करना चाह रहा था। उसने सोचा ᳰक सुबह सही ही कहा था मᱹने ᳰक अब आपकᳱ शरण मᱶ आ गया ᱠँ। वह सोच रहा था ᳰक ऐसे आदमी कᳱ संगत मᱶ रह आईएएस - आईपीएस बनना बᱟत दूर नहᱭ। ‘ पता नहᱭ रायसाहब अब तक यᲂ नहᱭ ᱟए ?’ अचानक यह सवाल उसके मन मᱶ आया , पर रायसाहब के स᭥मान मᱶ तुरंत िनकल भी गया। काफᳱ देर बातचीत का िसलिसला चलता रहा। रायसाहब अपनी करामाती बात - िवचार से संतोष को लगातार चᳰकत ᳰकए जा रहे थे। अब संतोष को थोड़ी भूख महसूस ᱟई। रायसाहब कᳱ तरफ से भूख पर कोई चचाᭅ - पᳯरचचाᭅ न छेड़ने पर संतोष ने ही पहल करना उिचत समझा। “ चिलए थोड़ा बाहर चले , कुछ खाकर आया जाएगा रायसाहब। ” संतोष ने पेट पर हाथ रखते ᱟए कहा। “ भूख लग गया ! यहाँ रिहएगा तो हम लोगᲂ कᳱ तरह इस पर िवजय पा लीिजएगा। पढ़ाई और उसकᳱ पᳯरचचाᭅ मᱶ भूख का पता ही नहᱭ लगता है यहाँ लोगᲂ को। ” रायसाहब ने एक छेछड़ी टाइप हँसी मᱶ दाँत िनकालते ᱟए कहा। संतोष को लगा , ‘ यार यहाँ भूख तो कोई मुा ही नहᱭ है। ’ रायसाहब ने संतोष कᳱ मनोदशा भाँपते ᱟए अपनी बात का वजन बढ़ाते ᱟए कहा , “ संतोष जी आदमी जैसे ही पेट का गुलाम होता है , उसके मि᭭ त᭬ क के दरवाजे बंद हो जाते हᱹ। िवचार आने बंद हो जाते हᱹ। भूख का अंधा कुछ नहᱭ देखता। और जान लीिजए एक िसिवल के छाᮢ के िलए मि᭭ त᭬ क का खुला होना एवं िवचारᲂ का आना भोजन से कई गुना ᭔यादा जᱨरी है। सोिचए इस दुिनया मᱶ ᳰकतने लोग हᲂगे जो ᳰदन मᱶ एक रोटी के िलए तरस रहे हᲂगे , भूखे मर रहे हᲂगे , या हमारे जैसे लोग अपने िलए भूख पर बात कर उनके ᮧित असंवेदनशीलता नहᱭ ᳰदखा रहे ? या ये अपराध नहᱭ है ? या हम खुद से नजर िमला पाएँगे , अगर एक िसिवल िसᳶवᭅस का ᮧितयोगी होकर भी हम उनके िलए कुछ न कर पाए तो , या इस पर हमᱶ सोचना नहᱭ चािहए ? बताइए संतोष जी , चुप यᲂ हᱹ , बताइए तो। अरे आपकᳱ आँखᲂ मᱶ आँसू यᲂ आ गए ? खुद को संभािलए संतोष जी। हमारे आपके जैसे लोगᲂ को ही तो आईएएस बन के ये दुिनया बदलनी है ! हम खाने - कमाने के िलए आईएएस बनने थोड़ी आए हᱹ ! यूपीएससी ने बकायदा अपने सलेबस मᱶ भूख के मुे को शािमल ᳰकया है , हमᱶ वो भूख िमटाना है। ” रायसाहब कᳱ इन बातᲂ ने संतोष को वैसे झकझोर ᳰदया था जैसे बारह बरस का कोई लड़का पेड़ पर चढ़कर जामुन से भरी कोई डाल झकझोर देता है। संतोष कᳱ आँखᱶ नम हो चुकᳱ थᱭ। उसकᳱ आँखᲂ के आगे भूख से िबलखते बᲬे नाचने लगे। उसे लगने लगा , ‘ हे भगवान ! ये मᱹने या सोच िलया ! एक िसिवल अ᭤यथᱮ होके भी खुद कᳱ भूख के जैसी सतही और तु᭒छ बात कैसे कर दी ?’ उसने मन - ही - मन सोच िलया था ᳰक प᳟ ाताप के तौर पर अब वह कम - से - कम दो ᳰदन तो खाना नहᱭ खाएगा। “ जी बस यूँ ही आँखᱶ भर आ रायसाहब , मᱹ ᳰकतना नीच ᱠँ। िछ :! मᱹने अपने खाने के बारे मᱶ सोचा और दुिनया कᳱ भूख भूल गया। या बनूँगा मᱹ आईएएस !” संतोष ने आँख िमचिमचाते ᱟए कहा। “ आप अब इतना भी खुद को शᳺमᲈदा न कᳯरए। अरे अभी तो आप आए हᱹ आज ही। आपको या पता एक आईएएस के छाᮢ को ᳰकस एंगल से सोचना चािहए ! हम लोग भी शुᱨ मᱶ ऐसे ही सोचते थे पर धीरे - धीरे खुद को बदले। आपका भी हो जाएगा। टᱶशन मत लीिजए। आइए ᳯटᳰफन तो रखा ही है , दो - दो रोटी खाते हᱹ उसी मᱶ से। ” कहकर रायसाहब ᳯटᳰफन उठाने बैड से उठे। संतोष ने अबकᳱ चुप रहना ही उिचत समझा। उसे लग रहा था ᳰक अब ᳰफर कुछ गड़बड़ न बोल दे और ᳰफर एक बड़ी ऐितहािसक भूल दोहराने कᳱ लािन झेलनी पड़े। रायसाहब अखबार िबछा उस पर ᳯटᳰफन खोल िछतरा चुके थे। संतोष ने एक हाथ नाक पर रख चुपचाप खाना शुᱨ कर ᳰदया। रायसाहब ने इस तरह अपना ᭄ान तो बाँटा ही साथ ही संतोष को वैि᳡क भूख कᳱ भयावह त᭭ वीर ᳰदखा अपने कम - से - कम पचास ᱧपये भी बचा िलए थे जो मेजबान और सीिनयर होने के कारण संतोष को िखलाने मᱶ लग सकते थे। 5. खाना खाने के बाद रायसाहब बैड पर जा बैठे और तᳰकया के नीचे से ‘ द िह᭠दू ’ िनकालकर बोले , “ थोड़ा अखबार पढ़ लेते हᱹ हम। आप भी थोड़ी देर कुछ पिᮢ काएँ देख लीिजए संतोष जी। थोड़ा करᱶट मᱶ कुछ देख लीिजए। शाम को बᮢ ा मᱶ हम लोगᲂ के स᳸ कᭅल मᱶ चिलएगा तो बातचीत मᱶ क᭥फरटेबल रिहएगा। ” इस तरह से रायसाहब ने संतोष को अपनी मंडली के महा᭜᭥य के बारे मᱶ बता ᳰदया था। द िह᭠दू , हर ᳲहंदी मा᭟यम के छाᮢ ᲂ के िलए ᭄ान और जानकारी से ᭔यादा ᮧित᳧ ा का अखबार था। वह लड़का ही या िजसके कमरे पर सुबह - सुबह िह᭠दू फᱶका ᱟआ न िमले , यह अलग बात है ᳰक उस अखबार कᳱ रबड़ खुले न खुले। य᳒ िप ᭔यादातर लड़के इस अखबार का बस टाइटल ‘ द िह᭠दू ’ पढ़कर रख देते थे पर कुछ ऐसे भी मेहनती लड़के होते थे जो िडशनरी िनकालकर चार घंटे तक िह᭠दू पढ़ते थे और बड़ा आ᭜मिव᳡ास टाइप फᳱल करते थे। रायसाहब ऐसे ही मेहनतकश द िह᭠दू रीडरᲂ मᱶ से थे। पर आज रायसाहब केवल त᭭ वीरᱶ देखकर ही खबरᲂ का अंदाजा लगा रहे थे योᳰक संतोष के सामने िडशनरी िनकालकर वे अभी तक का अपना टाइट भौकाल ढीला नहᱭ करना चाहते थे। िबना कुछ समझे आिखर आदमी ᳰकतनी देर तक अखबार के प᳖ े उलटता ! रायसाहब ने ज᭨दी ही पेपर रखकर कहा , “ चिलए बᮢ ा िनकलते हᱹ , आपका ᱨम भी तो ढूँढ़ना होगा न। ” संतोष भी हाथ मᱶ िलए ᮓॉिनकल पिᮢ का को टेबल पर रखते ᱟए बोला , “ हाँ चिलए , ᱧमवा तो खोजना होगा !” रायसाहब तुरंत मुँह पर पानी मार ᮨ े श ᱟए , बाल मᱶ भृंगराज तेल लगाया। शटᭅ - पᱹट पहनी और संतोष के साथ बᮢ ा कᳱ ओर िनकल पड़े। संतोष मन - ही - मन अभी थोड़ी देर पहले पढ़े ᱟए ᮓॉिनकल के कुछ फै᭗स को दोहराता जा रहा था। वह पहली बार एक ऐसी मंडली से िमलने जा रहा था जहाँ पर िबना ᭄ान के मुँह केवल चाय पीने के िलए ही खोला जाता था। संतोष पहले ᳰदन अपनी उपि᭭ थित केवल चाय पीने तक नहᱭ रखना चाहता था। वह मन - ही - मन इस बात के िलए तैयार हो रहा था ᳰक आज अपनी गमᭅ उपि᭭ थित दजᭅ करा ही दे। उसने नौवᱭ कᭃा के ᮕामर कᳱ ᳰकताब मᱶ एक अँᮕेजी कᳱ लोकोिᲦ पढ़ी थी , ‘ फ᭭ टᭅ इ᭥ᮧैशन इज द ला᭭ ट इ᭥ᮧैशन। ’ सो आज उसके उसी इ᭥ᮧैशन कᳱ बात थी। रा᭭ ते मᱶ चलने के दौरान रायसाहब नेहᱧ िवहार से लेकर मुखजᱮ नगर तक सड़क के दोनᲂ ᳰकनारे पड़ने वाले हर गली - मकान का िडजाइन और ᳰकराये के बारे मᱶ बताते जा रहे थे। संतोष भी अपने संभािवत गुफाᲐ को गौर से देखता जा रहा था। दोनᲂ अब बैजू शुला कᳱ चाय कᳱ दुकान पर पᱟँच चुके थे। शुला जी लगभग चालीस बरस के रहे हᲂगे। बनारस के रहने वाले शुला जी का पूरा नाम बजरंग शुला था। शुला जी एक समय नोएडा कᳱ एक ᮧाइवेट कंपनी मᱶ सुपरवाइजर के ᱨप मᱶ काम कर रहे थे। साढ़े पाँ