उपन्यास का शीषर्क अधूरी प् यास एक स् त्र ी, एक पित, टूटता पिरवार और अनंत इच्छाओं की कहानी लेखक: Rupesh Ranjan भूिमका (Preface) मनुष् य का जीवन क े वल प ेम , िववाह और पिरवार की कहानी नही ं है ; यह इच् छाओं , िनण यों , कमजोिरयों , अपराधबोध , क्ष मा और उनक े पिरणामों की भी कहानी है। कुछ िनण य क्ष िणक सुख देते हैं , पर उनका प भाव वष ं तक कई जीवनों को बदल देता है। यही इस उपन् यास की मूल संवेदना है। " अधूरी प् यास " िकसी एक स् त्र ी या पुरु ष का न् याय करने क े िलए नही ं िलखा गया है। यह िकसी व् यिक् त , वग या िलंग क े चिरत्र का प ितिनिधत् व भी नही ं करता। यह एक काल् पिनक कथा है , जो मानवीय मन की जिटलताओं , भावनात् मक िरक् तता , िरश् तों में िवश् वास , टूटन और आत् मसंघष की पड़ताल करती है। इसक े सभी पात्र , स् थान और घटनाएँ लेखक की कल् पना की उपज हैं। यिद िकसी वास् तिवक व् यिक् त या घटना से कोई समानता प तीत हो , तो वह पूण तः संयोग मात्र होगी। इस कहानी का क े ं द क े वल वैवािहक बेवफाई नही ं , बिल् क उन अनकहे घावों पर है जो िवश् वास टूटने क े बाद भी जीिवत रहते हैं। एक ओर ऐसा पित है , जो अपार पीड़ा सहकर भी पिरवार को बचाने का प यास करता है और अपने बच् चों क े भिवष् य क े िलए अनेक रहस् यों को अपने भीतर दफना देता है। दूसरी ओर ऐसी स् त्र ी है , जो अपने भीतर क े खालीपन , अिस् थर इच् छाओं और भावनात् मक उलझनों से कभी मुक् त नही ं हो पाती। उनक े बीच खड़े बच् चे उस मौन संघष क े सबसे बड़े साक्ष ी बनते हैं , िजसकी कोई अदालत नही ं होती और िजसका कोई सरल िनण य नही ं होता। यह उपन् यास पाठकों को यह सोचने क े िलए आमंित्र त करता है िक िरश् ते क े वल सामािजक अनुबंध नही ं होते ; वे िवश् वास , सम् मान , संवाद , संयम और िजम् मेदारी की नी ंव पर िटक े होते हैं। जब इनमें से कोई एक स् तंभ भी टूटता है , तो उसका क ं पन पूरे पिरवार में महसूस होता है। कई बार सबसे गहरा दद वही लोग सहते हैं , जो सबसे कम बोलते हैं। मैंने इस कथा को संवेदनशीलता और मानवीय दृिष् टकोण से प स् तुत करने का प यास िकया है। इसका उ ेश् य िकसी क े जीवन - िनण यों का मिहमामंडन या िनंदा करना नही ं , बिल् क यह िदखाना है िक हर िनण य की एक कीमत होती है — और वह कीमत अक् सर क े वल िनण य लेने वाला व् यिक् त ही नही ं , बिल् क उससे जुड़े सभी लोग चुकाते हैं। यिद यह उपन् यास पाठकों को िरश् तों में ईमानदारी , संवाद , िवश् वास और उत्त रदाियत् व क े महत् व पर गंभीरता से िवचार करने क े िलए प ेिरत करे , तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी। — Rupesh Ranjan About the Book अधूरी प् यास क े वल एक स् त्र ी और एक पुरु ष की कहानी नही ं है , बि क उन िरश् तों की कहानी है जो िवश् वास , प ेम , त् याग और मौन पर िटक े होते हैं। यह उपन् यास मानवीय इच् छाओं , भावनात् मक िरक् तता , वैवािहक जीवन की जिटलताओं और उन िनण यों क े दूरगामी पिरणामों का गहन मनोवै ािनक एवं सामािजक िचत्र ण प स् तुत करता है। कहानी की नाियका अपने अतीत क े कुछ ऐसे रहस् यों क े साथ िववाह करती है िजन् हें वह अपने भीतर ही दबाकर रखना चाहती है। उसका पित एक संवेदनशील , पिरपक् व और िजम् मेदार व् यिक् त है , जो पिरवार , सम् मान और बच् चों क े भिवष् य को सव पिर मानता है। समय क े साथ िरश् ते में दरारें उभरती हैं , िवश् वास कमजोर पड़ता है और दोनों क े बीच बढ़ती भावनात् मक दूरी पूरे पिरवार को प भािवत करने लगती है। पित अनेक सच् चाइयों को जानते हुए भी पिरवार को टूटने से बचाने का प यास करता है। वह अपमान , पीड़ा और अक े लेपन को अपने भीतर समेटकर बच् चों क े भिवष् य क े िलए मौन का किठन माग चुनता है। दूसरी ओर , नाियका अपने भीतर की बेचैनी , असंतोष और लगातार नए आकष णों की ओर झुकाव से संघष करती रहती है। अंततः उसक े एक िनण य से वष ं से बना पिरवार िबखर जाता है और हर पात्र को अपने - अपने िहस् से का दद सहना पड़ता है। यह उपन् यास िकसी व् यिक् त या िलंग का न् याय नही ं करता , बि क यह प श् न उठाता है िक जब िवश् वास टूटता है , तब उसका सबसे गहरा प भाव िकन लोगों पर पड़ता है। प ेम , िवश् वासघात , अपराधबोध , क्ष मा , त् याग , अक े लापन , सामािजक दबाव और पिरवार की बदलती पिरभाषा — इन सभी आयामों को यह कथा संवेदनशीलता और यथाथ क े साथ प स् तुत करती है। अधूरी प् यास एक भावनात् मक , मनोवै ािनक और सामािजक उपन् यास है , जो पाठकों को िरश् तों की नाज ़ ु कता , मानवीय कमजोिरयों और हर िनण य की कीमत पर गंभीरता से सोचने क े िलए प ेिरत करता है। अ ध् याय 1 : एक साधारण लड़की , असाधारण बेचैनी बरसात की हल् की - हल् की फुहारें गाँव की कच् ची गिलयों को िभगो रही थी ं। िम ी की सोंधी खुशबू पूरे वातावरण में घुली हुई थी। आम क े पेड़ों से टपकती पानी की बूंदें जैसे िकसी अनकहे गीत की लय बना रही थी ं। दूर मंिदर की घंिटयाँ और खेतों से लौटते िकसानों की आवाज ़ े ं उस छोटे - से कस् बे की पहचान थी ं , जहाँ हर कोई एक - दूसरे को नाम से जानता था। इसी कस् बे में रहती थी नैना । पहली नज ़ र में वह िबल् कुल साधारण लगती थी। गेहुँआ रंग , बड़ी - बड़ी आँखें , लंबे बाल और चेहरे पर एक ऐसी मुस् कान , जो िकसी को भी सहज महसूस करा दे। वह पढ़ाई में अच् छी थी , घर क े कामों में िनपुण थी और पड़ोिसयों की नज ़ र में एक संस् कारी लड़की थी। उसक े माता - िपता को उस पर गव था। लेिकन हर मुस् कान क े पीछे एक कहानी होती है। नैना की कहानी भी वैसी ही थी — एक ऐसी कहानी िजसे उसने कभी िकसी से पूरी तरह साझा नही ं िकया। बचपन से ही उसे लोगों का ध् यान अपनी ओर आकिष त करता था। जब कोई उसकी प शंसा करता , उसे लगता जैसे उसक े भीतर की कोई खाली जगह कुछ देर क े िलए भर गई हो। लेिकन वह एहसास कभी िटकता नही ं था। िजतनी जल् दी आता , उतनी ही जल् दी गायब भी हो जाता। समय बीतता गया। स् क ू ल से कॉलेज तक का सफर शुरू हुआ। नए दोस् त बने , नए चेहरे िमले और जीवन की दुिनया बड़ी होती चली गई। बाहर से सब कुछ सामान् य था , लेिकन भीतर एक अजीब - सी बेचैनी लगातार जन् म ले रही थी। उसे समझ नही ं आता था िक वह वास् तव में क् या खोज रही है — प ेम , अपनापन , स् वीक ृ ित या क े वल िकसी का िनरंतर साथ। कई बार वह रात को छत पर बैठकर तारों को देखती रहती। उसे लगता जैसे उसक े भीतर कोई अनुत्त िरत प श् न है , िजसका उत्त र िकसी िकताब , िकसी दोस् त या िकसी सलाह में नही ं िमलता। उसकी सबसे करीबी सहेली िरतु अक् सर कहती , " तू हर बात को िदल से लगा लेती है। िज ़ ं दगी इतनी भी मुिश् कल नही ं होती। " नैना मुस् कुरा देती। " शायद मेरे िलए है। " उसकी मुस् कान में िजतनी चमक िदखाई देती थी , उतना ही गहरा अक े लापन उसक े भीतर िछपा रहता था। घर में माता - िपता उसे बहुत प् यार करते थे , लेिकन उनक े पास समय कम था। िपता नौकरी में व् यस् त रहते और माँ पूरे पिरवार की िजम् मेदािरयों में। नैना ने कभी िशकायत नही ं की , पर धीरे - धीरे उसने अपने मन की बातें कहना भी छोड़ िदया। कॉलेज का पहला िदन उसक े जीवन में एक नए अध् याय की शुरु आत लेकर आया। नई इमारत , नए िशक्ष क , नए िमत्र और अनिगनत संभावनाएँ। उसे यह एहसास नही ं था िक आने वाले वष ं में िलए गए कुछ िनण य उसक े पूरे जीवन की िदशा बदल देंगे। उस िदन जब उसने कॉलेज क े मुख् य ार से भीतर कदम रखा , उसे लगा िक उसक े सामने एक नई दुिनया खुल रही है। लेिकन वह नही ं जानती थी िक हर नई दुिनया अपने साथ कुछ रोशनी और कुछ अंधेरे भी लेकर आती है। जीवन में कभी - कभी सबसे बड़ी त्र ासिदयाँ िकसी एक बड़े िनण य से नही ं , बिल् क छोटे - छोटे चुनावों की लंबी ृंखला से जन् म लेती हैं। नैना की कहानी भी अब उसी िदशा में धीरे - धीरे बढ़ने लगी थी। उसने आसमान की ओर देखा। बादलों क े बीच से हल् की धूप िनकल रही थी। उसे लगा िक शायद उसका भिवष् य भी ऐसा ही होगा — थोड़ी धूप , थोड़े बादल। लेिकन िनयित उसक े िलए कुछ और ही िलख चुकी थी। अ ध् याय 2 : पहला प े म और पहला िव श् वासघात कॉलेज खुलने क े कुछ ही सप् ताह बाद नैना की िदनचय बदलने लगी। सुबह की जल् दी , िकताबों से भरा बैग , बस की लंबी यात्र ा और नए चेहरों क े बीच अपना स् थान बनाने की कोिशश — यही उसकी दुिनया बन गई थी। उसी दौरान उसकी मुलाकात आिद त् य से हुई। आिदत् य पढ़ाई में तेज ़ , व् यवहार में िवनम और बातों में आत् मिवश् वासी था। वह सबकी मदद करता था और िशक्ष कों का भी िप य छात्र था। पहली बार दोनों की बातचीत तब हुई जब पुस् तकालय में नैना को एक दुल भ पुस् तक नही ं िमल रही थी। " शायद आप यही िकताब ढूँढ़ रही हैं ," आिदत् य ने मुस् कुराते हुए कहा। नैना ने चौंककर उसकी ओर देखा। " हाँ ... लेिकन आपको क ै से पता ?" " िपछले दस िमनट से आप उसी रैक क े सामने खड़ी हैं। " दोनों हँस पड़े। यही ं से पिरचय शुरू हुआ। धीरे - धीरे दोनों साथ बैठने लगे। कॉलेज की क ै ं टीन में चाय , पुस् तकालय में पढ़ाई और परीक्ष ा की तैयारी — इन सबने उनकी िमत्र ता को गहरा कर िदया। पहली बार नैना को लगा िक कोई उसे िबना िकसी शत क े समझने की कोिशश कर रहा है। एक शाम कॉलेज से लौटते समय बािरश शुरू हो गई। दोनों बस - स् टॉप की टीन की छत क े नीचे खड़े थे। " तुम हमेशा इतनी चुप क् यों रहती हो ?" आिदत् य ने पूछा। नैना कुछ क्ष ण मौन रही। " शायद इसिलए िक मुझे डर लगता है। " " िकस बात का ?" " िक िजसे मैं अपना समझूँगी , वह भी एक िदन मुझे छोड़ देगा। " आिदत् य ने धीरे से कहा , " मैं ऐसा कभी नही ं करू ँ गा। " इन शब् दों ने नैना क े मन में िवश् वास का एक छोटा - सा दीप जला िदया। िदन महीनों में बदल गए। दोनों का िरश् ता और गहरा होता गया। वे भिवष् य क े सपने देखने लगे — अच् छी नौकरी , छोटा - सा घर और साथ िबताया जाने वाला जीवन। लेिकन जीवन हमेशा सपनों क े अनुसार नही ं चलता। कॉलेज क े अंितम वष में आिदत् य क े पिरवार पर आिथ क संकट आ गया। उसक े िपता गंभीर रू प से बीमार पड़ गए। घरवालों ने उस पर जल् दी नौकरी करने और पिरवार की िजम् मेदारी उठाने का दबाव डालना शुरू कर िदया। इसी बीच आिदत् य क े िलए एक बड़े उ ोगपित की बेटी से िववाह का प स् ताव आया। उस िववाह क े बदले उसक े पिरवार की आिथ क समस् याएँ समाप् त हो सकती थी ं। आिदत् य भीतर से टूट गया। एक ओर उसका प ेम था , दूसरी ओर उसका पिरवार। कई िदनों तक वह नैना से िमलने से बचता रहा। उसक े संदेशों का उत्त र भी देर से देने लगा। एक िदन नैना ने उसे कॉलेज क े पुराने बरगद क े पेड़ क े नीचे बुलाया। " क् या बात है , आिदत् य ? तुम बदल गए हो। " आिदत् य की आँखें झुक गईं। " मैं ... शायद अब तुम् हारे साथ आगे नही ं चल पाऊ ँ गा। " नैना ने अिवश् वास से उसकी ओर देखा। " क् या मतलब ?" " घर की पिरिस् थितयाँ ... मैं पिरवार क े िखलाफ नही ं जा सकता। " कुछ क्ष णों तक दोनों क े बीच क े वल हवा की आवाज ़ थी। नैना की आँखों से आँसू बहने लगे। " तो जो वादे िकए थे ...?" आिदत् य ने धीमे स् वर में कहा , " काश मैं उन् हें िनभा पाता। " वह मुड़ा और धीरे - धीरे वहाँ से चला गया। नैना बहुत देर तक उसी पेड़ क े नीचे खड़ी रही। उसे लग रहा था जैसे उसक े भीतर कुछ स् थायी रू प से टूट गया हो। उस रात उसने पहली बार महसूस िकया िक प ेम का अंत क े वल दो लोगों का िबछड़ना नही ं होता ; कभी - कभी वह व् यिक् त क े आत् मिवश् वास , िवश् वास और भिवष् य क े सपनों को भी अपने साथ ले जाता है। उस घटना क े बाद नैना पहले जैसी नही ं रही। उसने पढ़ाई जारी रखी , लोगों से िमलती - जुलती भी रही , लेिकन उसक े भीतर यह डर गहराता गया िक कोई िरश् ता हमेशा क े िलए नही ं होता। उसे यह नही ं पता था िक यह पहला िवश् वासघात उसक े जीवन क े आने वाले िनण यों पर गहरी छाया डालने वाला है। अ ध् याय 3 : दूसरा िर श् ता , दूसरा भ म आिदत् य क े जाने क े बाद नैना की दुिनया जैसे ठहर गई थी। कॉलेज समाप् त हो चुका था। सहपाठी अपनी - अपनी राह पर िनकल चुक े थे। कोई नौकरी की तैयारी में जुट गया था , कोई उच् च िशक्ष ा क े िलए दूसरे शहर चला गया था। नैना भी एक िनजी संस् थान में काम करने लगी , लेिकन उसक े भीतर का खालीपन हर िदन थोड़ा और गहरा होता जा रहा था। समय घावों को भर देता है — लोग कहते हैं। लेिकन कुछ घाव क े वल दद की आदत बन जाते हैं। एक वष बाद उसकी मुलाकात िववेक से हुई। िववेक उसी काय लय में विरष् ठ अिधकारी था। शांत स् वभाव , प भावशाली व् यिक् तत् व और लोगों को ध् यान से सुनने की आदत ने उसे सबसे अलग बना िदया था। पहले दोनों क े बीच क े वल काम की बातें होती थी ं। धीरे - धीरे बातचीत चाय तक पहुँची। िफर द ़तर से घर लौटते समय रास् ता भी एक होने लगा। िववेक , नैना की उदासी को पढ़ लेता था। " तुम हँसती तो हो ," उसने एक िदन कहा , " लेिकन आँखें कुछ और कहती हैं। " नैना मुस् कुरा दी। " शायद आँखें झूठ बोलना नही ं सीख पाईं। " उस िदन पहली बार उसने अपने अतीत क े बारे में िकसी से खुलकर बात की। उसने आिदत् य का नाम िलया , अपने टूटे हुए िवश् वास का िज ़ क्र िकया और यह भी स् वीकार िकया िक अब उसे िकसी िरश् ते पर आसानी से भरोसा नही ं होता। िववेक चुपचाप सुनता रहा। उसने कोई सलाह नही ं दी। िसफ इतना कहा — " हर व् यिक् त िपछले व् यिक् त जैसा नही ं होता। " यही वाक् य नैना क े मन में बार - बार गूँजता रहा। आने वाले महीनों में दोनों की िमत्र ता और गहरी होती गई। िववेक उसकी छोटी - छोटी परेशािनयों का ध् यान रखता। यिद वह बीमार होती तो दवा लेकर पहुँच जाता। यिद वह िकसी बात से परेशान होती तो घंटों उसकी बातें सुनता। नैना को लगा िक शायद जीवन उसे दूसरा अवसर दे रहा है। लेिकन इस बार उसने एक महत् वपूण प श् न कभी नही ं पूछा — क् या िववेक भी भिव ष् य क े बारे में वही सोचता है जो वह सोच रही है ? एक शाम दोनों शहर क े पुराने झील िकनारे बैठे थे। सूय अस् त हो रहा था और पानी पर सुनहरी रोशनी िबखरी हुई थी। " क् या तुम् हें कभी डर नही ं लगता ?" नैना ने पूछा। " िकस बात का ?" " िक जो िरश् ता आज है , वह कल नही ं रहेगा। " िववेक कुछ देर तक पानी की ओर देखता रहा। " मैं वत मान में जीना पसंद करता हूँ। भिवष् य का वादा करना मेरे स् वभाव में नही ं है। " यह उत्त र सुनकर नैना क्ष णभर क े िलए असहज हुई , लेिकन उसने उस संक े त को नज ़ रअंदाज ़ कर िदया। उसे लगा िक समय क े साथ सब बदल जाएगा। कुछ सप् ताह बाद काय लय में चच होने लगी िक िववेक का स् थानांतरण दूसरे शहर होने वाला है। नैना बेचैन हो उठी। उसने सीधे पूछा — " क् या तुम वापस आओगे ?" िववेक ने धीमे स् वर में कहा — " शायद नही ं। " " और ... हमारे बारे में ?" िववेक ने गहरी साँस ली। " नैना , मैंने तुम् हें कभी कोई वादा नही ं िकया। मैं तुम् हारा सम् मान करता हूँ , लेिकन मैं अपने जीवन को िकसी बंधन में नही ं देखता। " ये शब् द िकसी तेज ़ आघात की तरह उसक े भीतर उतर गए। उसने पहली बार महसूस िकया िक कभी - कभी भ म भी उतना ही दद देता है िजतना िवश् वासघात। कुछ िदनों बाद िववेक शहर छोड़कर चला गया। न कोई िवदाई , न कोई भिवष् य का आश् वासन। क े वल कुछ अधूरे संवाद और अनिगनत अनुत्त िरत प श् न पीछे रह गए। उस रात नैना ने अपनी डायरी में िलखा — " शायद गलती लोगों की नही ं , मेरी उम् मीदों की है। मैं हर बार वहाँ स् थाियत् व खोजती हूँ जहाँ वह कभी था ही नही ं। " यह दूसरा झटका उसक े व् यिक् तत् व को और अिधक अिस् थर बना गया। उसने लोगों पर िवश् वास करना कम कर िदया , लेिकन भीतर कही ं वह अब भी िकसी ऐसे व् यिक् त की तलाश में थी जो उसे पूरी तरह स् वीकार कर सक े । उसे यह एहसास नही ं था िक बार - बार टूटते िवश् वास उसक े िनण यों को धीरे - धीरे बदल रहे थे। वह अपने अक े लेपन से बचना चाहती थी , पर हर नया प यास उसे पहले से अिधक उलझन और िरक् तता की ओर ले जा रहा था। जीवन ने अभी उसक े िलए एक और मोड़ संभालकर रखा था — एक ऐसा मोड़ , जो उसक े भिवष् य की िदशा हमेशा क े िलए बदल देने वाला था। अ ध् याय 4 : तीसरा संबंध और बढ़ती खालीपन की अनुभूित िववेक क े जाने क े बाद नैना ने अपने चारों ओर एक अदृश् य दीवार खड़ी कर ली थी। वह समय पर द ़तर जाती , काम करती , घर लौट आती और रात को देर तक िकताबों या डायरी क े प ों में खोई रहती। बाहर से सब कुछ सामान् य िदखाई देता था , लेिकन उसक े भीतर लगातार एक अजीब - सी बेचैनी जन् म ले रही थी। उसे लगता था िक जीवन में कुछ ऐसा है जो हर बार उसक े हाथ लगते - लगते छूट जाता है। माँ अक् सर पूछती ं , " बेटी , सब ठीक तो है ?" नैना मुस् कुरा देती। " हाँ माँ , सब ठीक है। " लेिकन यह मुस् कान अब क े वल एक आदत बन चुकी थी। कुछ महीनों बाद उसने एक नई क ं पनी में नौकरी शुरू की। नया शहर , नया काय लय और नए लोग। उसने तय िकया िक इस बार वह िकसी से अिधक िनकटता नही ं बढ़ाएगी। वह क े वल अपने काम पर ध् यान देगी। लेिकन जीवन योजनाओं से नही ं चलता। वही ं उसकी मुलाकात समीर से हुई। समीर उम में उससे कुछ वष बड़ा था। वह पढ़ा - िलखा , आत् मिवश् वासी और प भावशाली व् यिक् तत् व वाला व् यिक् त था। उसकी सबसे बड़ी िवशेषता थी — लोगों की भावनाओं को समझ लेने की क्ष मता। वह दूसरों की बात ध् यान से सुनता और िबना िनण य िदए सलाह देता। धीरे - धीरे दोनों क े बीच बातचीत शुरू हुई। समीर ने कभी नैना से उसक े अतीत क े बारे में जानने की कोिशश नही ं की। उसने क े वल वत मान में उसे सहज महसूस कराया। यही बात नैना को उसक े िनकट ले आई। एक िदन काय लय की छत पर खड़े - खड़े समीर ने पूछा , " क् या तुम् हें कभी ऐसा लगता है िक इंसान अपने भीतर िकसी ऐसी चीज ़ की तलाश करता रहता है िजसका नाम भी उसे नही ं पता होता ?" नैना कुछ क्ष ण चुप रही। िफर बोली , " शायद ... और जब वह उसे नही ं िमलती , तो वह बार - बार गलत जगह खोजने लगता है। " समीर ने उसकी ओर देखा। " तुम बहुत कुछ अपने भीतर िछपाकर रखती हो। " उसने पहली बार िकसी क े सामने स् वीकार िकया िक उसक े जीवन में पहले भी िरश् ते आए थे , लेिकन कोई िटक नही ं पाया। उसने नाम नही ं बताए , क े वल इतना कहा िक हर टूटन क े बाद उसक े भीतर िवश् वास थोड़ा और कम हो गया। समीर ने क े वल इतना कहा , " हर अनुभव इंसान को बदल देता है। सवाल यह है िक वह हमें बेहतर बनाता है या और अिधक अक े ला। " इन शब् दों ने नैना को गहराई से प भािवत िकया। कुछ समय तक उसे लगा िक शायद इस बार उसे भावनात् मक िस् थरता िमल जाएगी। लेिकन धीरे - धीरे उसने महसूस िकया िक वह िकसी व् यिक् त से अिधक उस एहसास की तलाश कर रही है िजसमें उसे अपने भीतर का खालीपन कुछ देर क े िलए भरता हुआ महसूस होता था। यही उसकी सबसे बड़ी उलझन थी। उसे अपनापन चािहए था , लेिकन अपनापन िमलते ही उसका मन बेचैन होने लगता। उसे िनकटता चािहए थी , लेिकन िस् थरता उसे घुटन जैसी लगने लगती। वह स् वयं भी अपने व् यवहार को पूरी तरह समझ नही ं पा रही थी। एक शाम उसने अपनी डायरी में िलखा — " शायद समस् या दुिनया में नही ं है। शायद समस् या मेरे भीतर है। मैं हर बार सोचती हूँ िक अगला िरश् ता मुझे पूरा कर देगा , लेिकन कुछ समय बाद वही खालीपन िफर लौट आता है। आिखर मैं िकस चीज ़ की तलाश कर रही हूँ ?" धीरे - धीरे समीर ने भी महसूस िकया िक नैना भावनात् मक रू प से बहुत अिस् थर है। वह कभी बहुत िनकट आ जाती , तो कभी िबना िकसी कारण दूरी बना लेती। उसक े मन क े उतार - चढ़ाव िकसी पहेली जैसे थे। एक िदन समीर ने शांत स् वर में कहा , " नैना , जब तक तुम अपने भीतर क े दद को स् वीकार नही ं करोगी , तब तक कोई भी िरश् ता तुम् हें शांित नही ं दे पाएगा। " यह सुनकर नैना लंबे समय तक मौन रही। वह जानती थी िक समीर गलत नही ं था। लेिकन सच को स् वीकार करना आसान नही ं था। उस रात वह देर तक िखड़की क े पास बैठी रही। बाहर शहर की रोशिनयाँ चमक रही थी ं , लेिकन उसक े भीतर गहरा अंधेरा था। उसे पहली बार एहसास हुआ िक उसक े जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई िकसी और से नही ं , बि क स् वयं से थी। और यह लड़ाई अभी बहुत लंबी चलने वाली थी। अ ध् याय 5 : पिरवार का दबाव और िववाह का प स् ताव समय िकसी का इंतज ़ ार नही ं करता। समीर से दूरी बनने क े बाद नैना ने अपने जीवन को क े वल काम तक सीिमत कर िलया। सुबह काय लय , शाम घर और रात में लंबी खामोशी। अब वह पहले की तरह रोती नही ं थी। आँसू शायद सूख चुक े थे , लेिकन भीतर का खालीपन अब भी वैसा ही था। घरवालों ने भी उसकी बदलती उम और चुप् पी को महसूस करना शुरू कर िदया था। एक शाम िपता ने भोजन क े बाद उसे अपने कमरे में बुलाया। " बेटी , बैठो। " नैना समझ गई िक कोई गंभीर बात होने वाली है। िपता ने कुछ क्ष ण चुप रहने क े बाद कहा , " तुम अब अ ाईस वष की हो गई हो। हमने हमेशा तुम् हें अपने िनण य लेने की आज ़ ादी दी , लेिकन अब हमें तुम् हारे भिवष् य की िचंता होने लगी है। " माँ भी वही ं बैठी थी ं। उनकी आँखों में ममता थी , पर उसक े पीछे िछपी िचंता साफ िदखाई दे रही थी। " हम चाहते हैं िक अब तुम् हारे िववाह क े बारे में सोचें ," माँ ने धीरे से कहा। नैना ने कोई उत्त र नही ं िदया। उसक े मन में अतीत की कई यादें एक साथ लौट आईं। अधूरे िरश् ते , टूटे हुए भरोसे और स् वयं से िकए गए अनिगनत प श् न। कुछ देर बाद उसने शांत स् वर में कहा , " अगर मैं िकसी क े साथ खुश न रह सकी तो ?" िपता ने उसक े क ं धे पर हाथ रखा। " कोई भी िरश् ता पूरी तरह तैयार होकर नही ं िमलता। उसे दोनों लोग िमलकर बनाते हैं। " यह वाक् य उसक े मन में देर तक गूँजता रहा। अगले कुछ महीनों में कई िरश् ते आए। कोई पिरवार को पसंद नही ं आया , कोई नैना को। कभी िवचार नही ं िमले , कभी पिरिस् थितयाँ। िफर एक िदन उसक े मामा एक नए प स् ताव की चच लेकर आए। " लड़क े का नाम अभय है ," उन् होंने कहा। " सरकारी िवभाग में अिभयंता है। पढ़ा - िलखा है , शांत स् वभाव का है। पिरवार भी अच् छा है। सबसे बड़ी बात , लड़का बहुत िजम् मेदार माना जाता है। " नैना ने क े वल िसर िहला िदया। कुछ िदनों बाद दोनों पिरवारों की मुलाकात तय हुई। अभय पहली नज ़ र में िबल् कुल साधारण लगा। न बहुत अिधक बोलने वाला , न अपनी उपलि धयों का प दश न करने वाला। उसक े चेहरे पर एक सहज मुस् कान और आँखों में िस् थरता थी। औपचािरक बातचीत क े बाद दोनों को अक े ले बात करने का अवसर िदया गया। कमरे में कुछ क्ष णों तक मौन पसरा रहा। िफर अभय ने मुस् कुराकर कहा , " मुझे औपचािरक बातें करने की आदत नही ं है। इसिलए सीधे पूछता हूँ — क् या यह िरश् ता आपकी इच् छा से हो रहा है ?" नैना ने पहली बार उसकी ओर ध् यान से देखा। " हाँ ... लेिकन डर भी लग रहा है। " " डर िकस बात का ?" " िक अगर मैं अच् छी पत् नी सािबत न हो सकी तो ?" अभय ने िबना िकसी जल् दबाज ़ ी क े उत्त र िदया , " अच् छा पित या अच् छी पत् नी बनने का कोई तैयार सूत्र नही ं होता। बस दोनों लोगों में सच बोलने का साहस और एक - दूसरे का सम् मान होना चािहए। " उसकी बातों में बनावट नही ं थी। नैना ने पहली बार महसूस िकया िक सामने बैठा व् यिक् त दूसरों से अलग है। मुलाकात समाप् त हुई। घर लौटते समय माँ ने पूछा , " क ै सा लगा लड़का ?" नैना ने धीरे से कहा , " बहुत शांत है ... शायद बहुत अच् छा भी। " लेिकन उसी रात वह देर तक जागती रही। उसक े मन में एक ही प श् न घूमता रहा — क् या उसे अपने अतीत क े बारे में सब कुछ बता देना चािहए ? वह कई बार अभय को फोन करने का सोचती , िफर रु क जाती। उसे डर था िक यिद उसने सब कुछ बता िदया , तो शायद यह िरश् ता बनने से पहले ही टूट जाएगा। और यिद नही ं बताया , तो क् या वह जीवन भर इस बोझ क े साथ जी पाएगी ? कुछ िदनों बाद दोनों पिरवारों ने इस िववाह क े िलए सहमित दे दी। घर में तैयािरयाँ शुरू हो गईं। िरश् तेदारों का आना - जाना बढ़ गया। कपड़ों की खरीदारी , िनमंत्र ण - पत्र , गहने , गीत - संगीत — पूरा घर उत् सव क े रंग में डूब गया। सबक े चेहरों पर खुशी थी। लेिकन उस भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था , जो मुस् कुरा तो रहा था , पर भीतर से बेचैन था। नैना अपनी अलमारी से पुरानी डायरी िनकालकर देर तक उसक े प े पलटती रही। उसने उन प ों को बंद िकया , गहरी साँस ली और धीरे से कहा , " अब मुझे एक नया जीवन शुरू करना है ... लेिकन क् या अतीत सचमुच पीछे छूट जाता है ?" इस प श् न का उत्त र उसक े पास नही ं था। और शायद िनयित क े पास भी नही ं। अ ध् याय 6 : एक स च् चा और संवेदनशील पित सिद यों की हल् की धूप आँगन में िबखरी हुई थी। घर में िववाह की तैयािरयाँ पूरे उत् साह से चल रही थी ं। िरश् तेदारों की हँसी , रसोई से आती पकवानों की खुशबू और हर कमरे में फ ै ली चहल - पहल क े बीच नैना क े मन में एक अलग ही हलचल थी। बाहर उत् सव था। भीतर असमंजस। उधर अभय भी अपने घर में तैयािरयों में व् यस् त था। उसक े िमत्र उसे छेड़ते — " अब तो िज ़ ं दगी बदल जाएगी। " अभय मुस् कुरा देता। " िज ़ ं दगी हर िदन बदलती है , िववाह तो बस उस बदलाव की एक नई शुरु आत है। " उसका यह स् वभाव ही उसे सबसे अलग बनाता था। वह कम बोलता था , लेिकन हर बात सोच - समझकर कहता था। उसक े िलए िववाह क े वल सामािजक रस् म नही ं था , बिल् क दो व् यिक् तयों क े बीच िवश् वास का एक दीघ कािलक वचन था। िववाह से एक सप् ताह पहले अभय ने नैना को फोन िकया। " अगर तुम् हें ठीक लगे , तो हम एक बार िमल सकते हैं ?" नैना ने कुछ क्ष ण सोचा। " हाँ ... िमल सकते हैं। " दोनों शहर क े एक शांत उ ान में िमले। शाम ढल रही थी। पेड़ों की लंबी छायाएँ घास पर फ ै ल चुकी थी ं। कुछ देर तक दोनों िबना बोले साथ चलते रहे। िफर अभय ने कहा , " नैना , मैं तुमसे एक वादा करना चाहता हूँ। " वह उसकी ओर देखने लगी। " जीवन में सुख आएँगे , किठनाइयाँ भी आएँगी। हम हर बात पर सहमत भी नही ं होंगे। लेिकन मैं चाहता हूँ िक हमारे बीच संवाद कभी बंद न हो। अगर कभी कोई समस् या हो , तो हम पहले एक - दूसरे से बात करेंगे , दुिनया से नही ं। " नैना की आँखें भर आईं। उसे लगा जैसे सामने खड़ा व् यिक् त वही िवश् वास दे रहा है िजसकी तलाश वह वष ं से करती रही थी। उसक े होंठ कई बार खुले , मानो वह अपने अतीत का सच कह देना चाहती हो। लेिकन हर बार शब् द लौट गए। डर जीत गया। कुछ िदनों बाद िववाह का शुभ िदन आ गया। मंडप फ ू लों से सजा था। शहनाई की मधुर धुन वातावरण में गूँज रही थी। दोनों पिरवार प सन्न थे। सात फ े रों क े समय पुरोिहत प त् येक वचन का अथ समझा रहे थे — सम् मान , सहयोग , िवश् वास , धैय और जीवन भर साथ िनभाने का संकल् प। अभय ने हर वचन पूरी गंभीरता से सुना। नैना भी मंत्र ों क े बीच खड़ी थी , लेिकन उसक े मन में एक ही प श् न बार - बार उठ रहा था — " क् या मैं इन वचनों क े योग् य हूँ ?" िवदाई क े समय माँ ने उसे गले लगाकर कहा , " बेटी , घर क े वल दीवारों से नही ं बनता। िवश् वास और धैय से बनता है। " नैना की आँखों से आँसू बह िनकले। नए घर में उसका स् वागत पूरे स् नेह से हुआ। अभय की माँ ने कहा , " आज से यह घर तुम् हारा है। " उसक े िपता ने मुस् कुराकर आशीव द िदया। घर में िकसी ने उसे पराया महसूस नही ं होने िदया। अभय ने भी कभी उस पर कोई दबाव नही ं डाला। उसने नैना को समय िदया , उसकी पसंद - नापसंद समझी और हर छोटी बात का ध् यान रखा। एक िदन उसने देखा िक नैना देर रात तक जाग रही है। " नी ंद नही ं आ रही ?" उसने पूछा। " बस ... कुछ पुरानी बातें याद आ रही थी ं। " अभय ने क े वल इतना कहा , " जब कभी तुम् हारा मन हो , तुम मुझसे सब कह सकती हो। मैं सुनूँगा , िबना िकसी िनण य क े । " यह सुनकर नैना कुछ क्ष ण चुप रही। उसने महसूस िकया िक उसे एक ऐसा जीवनसाथी िमला है जो सुनना जानता है , समझना जानता है और िबना शत सम् मान देना जानता है। लेिकन उसक े भीतर िछपे रहस् य अब भी उसक े और अभय क े बीच एक अदृश् य दीवार बने हुए थे। उस रात अभय जल् दी सो गया। नैना देर तक िखड़की क े पास बैठी रही। चाँदनी कमरे में उतर रही थी। उसने मन ही मन कहा , " काश ... मैं भी अपने अतीत से मुक् त होकर इस नए जीवन की शुरु आत कर पाती। " उसे यह पता नही ं था िक कुछ सच , चाहे िकतनी ही गहराई में दबा िदए जाएँ , समय आने पर स् वयं रास् ता खोज लेते हैं। और वही सच आगे चलकर उनक े जीवन की सबसे किठन परीक्ष ा बनने वाला था। अ ध् याय 7 : िववाह की नई शु रु आत िववाह को तीन महीने बीत चुक े थे। अभय और नैना का नया घर धीरे - धीरे अपनी लय पकड़ने लगा था। सुबह अभय समय पर काय लय क े िलए िनकल जाता और नैना घर क े कामों क े बाद अपने नए जीवन को व् यविस् थत करने में लग जाती। शाम होते ही दोनों साथ बैठकर चाय पीते , िदनभर की बातें करते और कभी - कभी पास क े पाक में टहलने िनकल जाते। जो लोग उन् हें देखते , कहते — " क् या सुंदर जोड़ी है। " अभय मुस् कुरा देता। नैना भी मुस् कुरा देती। लेिकन मुस् कान और मन हमेशा एक जैसे नही ं होते। अभय अपने स् वभाव क े अनुरू प अत् यंत धैय वान था। उसने कभी नैना से उसक े अतीत क े बारे में कोई प श् न नही ं िकया। वह मानता था िक यिद कोई बात महत् वपूण होगी , तो समय आने पर नैना स् वयं बताएगी। एक रात भोजन क े बाद दोनों छत पर बैठे थे। हल् की हवा चल रही थी। आसमान में पूिण मा का चाँद चमक रहा था। अभय ने धीरे से कहा , " जानती हो , मैं बचपन से एक बात मानता आया हूँ। " " क् या ?" " िरश् ता प ेम से शुरू हो सकता है , लेिकन उसे िटकाता िवश् वास है। प ेम कभी - कभी कम - ज् यादा होता रहता है , पर िवश् वास टूट जाए तो सब कुछ बदल जाता है। " नैना ने उसकी ओर देखा। उसे लगा जैसे ये शब् द सीधे उसक े भीतर उतर रहे हों। उसने कुछ कहना चाहा , लेिकन िफर चुप रह गई। िदन बीतते गए। अभय छोटी - छोटी बातों में उसका ध् यान रखता। यिद नैना की तबीयत खराब होती , तो वह स् वयं रसोई में जाकर खाना बना लेता। यिद वह िकसी बात से परेशान होती , तो िबना कारण पूछे क े वल उसक े पास बैठ जाता। उसे समझ आ गया था िक कभी - कभी मौन भी सबसे बड़ा सहारा होता है। एक रिववार दोनों ने िमलकर पूरे घर की सफाई की। पुराने फोटो फ े म लगाए , बालकनी में पौधे रखे और दीवार पर एक छोटा - सा क ै लेंडर टाँगा। अभय ने मुस् कुराकर कहा , " अब यह घर सचमुच घर जैसा लगने लगा है। " नैना ने पहली बार पूरे मन से मुस् कुराने की कोिशश की। उसे लगा िक शायद जीवन सचमुच बदल सकता है। लेिकन अतीत इतनी आसानी से पीछे नही ं छूटता। एक दोपहर अलमारी व् यविस् थत करते समय नैना क े हाथ उसकी पुरानी डायरी लग गई। उसने जल् दी से उसे कपड़ों क े नीचे िछपा िदया। उसी समय अभय कमरे में आ गया। " कुछ ढूँढ़ रही हो ?" " न ... नही ं। बस सामान ठीक कर रही थी। " अभय ने िबना कुछ पूछे अलमारी बंद कर दी। उसने नैना की िझझक देखी , लेिकन उसक े िनजी संसार में हस् त ेप नही ं िकया। उसका यही िवश् वास नैना को और अिधक बेचैन कर देता था। कुछ िदनों बाद दोनों अपने गाँव गए। अभय क े माता - िपता ने उनका स् नेह से स् वागत िकया। िरश् तेदारों क े बीच हँसी - मज ़ ाक चलता रहा। सब लोग कहते — " अभय की िकस् मत अच् छी है। उसे इतनी समझदार पत् नी िमली। " ये शब् द सुनकर नैना क े मन में अपराधबोध की एक हल् की लहर उठती। उसे लगता , यिद लोग उसक े अतीत को जान लें , तो क् या वे आज भी यही कहेंगे ? उस रात वह देर तक सो नही ं सकी। अभय ने करवट बदलते हुए पूछा , " कोई परेशानी है ?" नैना ने िसर िहला िदया। " नही ं ... बस नी ंद नही ं आ रही। " अभय ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा , " अगर कभी तुम् हारे मन पर कोई बोझ हो , तो उसे अक े ले मत उठाना। जीवनसाथी होने का अथ ही यही है िक बोझ आधा हो जाए। " नैना की आँखें भर आईं। उसे पहली बार लगा िक वह एक ऐसे व् यिक् त क े साथ है , जो उसे िबना शत सम् मान देता है। लेिकन उसी सम् मान क े कारण उसका अपराधबोध भी हर िदन गहरा होता जा रहा था। वह सच बताना चाहती थी। िफर डर जाती। वह नया जीवन जीना चाहती थी। लेिकन पुराना जीवन उसकी परछाईं बन चुका था। उसने िखड़की से बाहर देखा। पूव िदशा में सूरज उगने लगा था। एक नई सुबह सामने थी। लेिकन उसक े मन क े आकाश पर अब भी कुछ ऐसे बादल थे , जो छँटने का नाम नही ं ले रहे थे। अ ध् याय 8 : अतीत का पहला रह स् य िववाह को लगभग एक वष बीत चुका था। अभय और नैना का जीवन बाहर से एक आदश दंपित जैसा िदखाई देता था। दोनों क े बीच सम् मान था , संवाद था और साथ िबताए गए छोटे - छोटे पल थे , िजन् होंने उनक े घर को स् नेह से भर िदया था। पड़ोसी अक् सर कहते — " इन दोनों को देखकर लगता है िक िवश् वास अब भी दुिनया में जीिवत है। " लेिकन िवश् वास की नी ंव पर एक ऐसा रहस् य रखा था , िजसे क े वल नैना जानती थी। और वही रहस् य उसे हर िदन भीतर से थोड़ा - थोड़ा तोड़ रहा था। एक रिववार सुबह अभय पुराने कागज ़ ात व् यविस् थत कर रहा था। अलमारी क े ऊपरी खाने से कुछ िलफाफ े और फाइलें नीचे िगर गईं। नैना रसोई से बाहर आई। उसकी नज ़ र एक पुराने भूरे रंग क े िलफाफ े पर पड़ी। उसक े चेहरे का रंग एकाएक उड़ गया। वह तेज ़ ी से आगे बढ़ी और िबना कुछ कहे वह िलफाफा उठा िलया। अभय ने उसकी घबराहट देख ली। " कोई ज ़ रू री कागज ़ है ?" " हाँ ... कुछ पुराने प माणपत्र हैं। " उसने मुस् कुराने की कोिशश की , लेिकन उसकी आवाज ़ काँप रही थी। अभय ने आगे कुछ नही ं पूछा। उसे लगा िक शायद वह अपने मायक े की िकसी िनजी बात को लेकर असहज है। लेिकन नैना जानती थी िक उस िलफाफ े में प माणपत्र नही ं थे। वहाँ उसक े कॉलेज क े िदनों की कुछ पुरानी तस् वीरें , पत्र और डायरी क े कुछ प े रखे थे — उस जीवन की यादें , िजन् हें वह हमेशा क े िलए पीछे छोड़ देना चाहती थी। उसने रात में वह िलफाफा खोला। एक - एक तस् वीर उसक े सामने बीते वष ं को जीिवत कर रही थी। कुछ पलों क े िलए उसकी आँखें नम हो गईं। उसने धीरे - धीरे वे पत्र पढ़े , िफर उन् हें वापस मोड़कर रख िदया। उसने मन ही मन कहा — " ये सब अब समाप् त हो चुका है। अब इनका मेरे वत मान से कोई संबंध नही ं। " लेिकन उसक े भीतर एक दूसरी आवाज ़ उठी — " यिद सचमुच कोई संबंध नही ं है , तो तुम इन् हें आज तक संभालकर क् यों रखे हुए हो ?" उस प श् न का उत्त र उसक े पास नही ं था। कुछ िदनों बाद अभय ने सहजता से कहा , " अगले महीने घर की पूरी अलमारी बदलवा देते हैं। पुराना सामान भी छाँट लेंगे। " यह सुनते ही नैना का िदल तेज ़ ी से धड़कने लगा। उसे डर था िक कही ं वे पुराने कागज ़ अभय क े हाथ न लग जाएँ। उसने उसी रात सभी पुराने पत्र , तस् वीरें और डायरी क े कुछ प े एक िडब् बे में रख िदए। बहुत देर तक वह उन् हें देखती रही। िफर घर की छत पर गई। ठंडी हवा चल रही थी। उसने िडब् बा खोला। काफी देर तक उसक े हाथ काँपते रहे। आिख ़ र उसने एक - एक कागज ़ फाड़ िदया। कुछ तस् वीरें भी टुकड़ों में बदल गईं। हवा उन टुकड़ों को दूर ले गई। उसे लगा जैसे वह अपने अतीत को भी हवा क े हवाले कर रही है। लेिकन कुछ स् मृितयाँ कागज ़ ों में नही ं रहती ं। वे मन में रहती हैं। और मन को फाड़कर फ े ं का नही ं जा सकता। उस रात अभय ने देखा िक नैना असामान् य रू प से शांत है। " सब ठीक है ?" उसने पूछा। नैना ने िसर िहलाया। " हाँ ... बस पुराने सामान की सफाई कर रही थी। " अभय मुस् कुराया। " कभी - कभी पुराने बोझ छोड़ देना अच् छा होता है। " ये शब् द सुनकर नैना का हृ दय भर आया। उसे लगा जैसे अभय अनजाने में वही बात कह गया है , जो वह स् वयं वष ं से सुनना चाहती थी। िदन बीतते गए। अभय का िवश् वास पहले जैसा ही अटूट था। लेिकन नैना का अपराधबोध अब पहले से कही ं अिधक गहरा हो चुका था। उसे लगने लगा था िक िकसी भी िरश् ते में सबसे भारी बोझ झूठ नही ं , बि क वह सच होता है िजसे कहने का साहस कभी नही ं जुटाया जाता। उसने कई बार िनश् चय िकया िक वह अभय को सब बता देगी। हर बार उसक े सामने एक ही चेहरा आ जाता — अभय का। वह व् यिक् त िजसने उसे िबना िकसी शत क े सम् मान िदया था। वह डरती थी िक कही ं उसका सच क े वल उसक े अतीत को ही नही ं , बि क अभय क े िवश् वास को भी हमेशा क े िलए न तोड़ दे। उसे यह नही ं पता था िक जीवन में कुछ रहस् य िछपाए नही ं जाते , वे क े वल अपने सामने आने का समय चुनते हैं। और वह समय अब धीरे - धीरे िनकट आ रहा था।