उप न् यास का शीष क " उसका आिख ़ री प े म " एक प े म , जो समाज से जीता ... लेिकन िव श् वास से हार गया। लेखक : RUPESH RANJAN प्रस्तावना (Preface) प्र स् तावना मनुष्य का जीवन क े वल सही और गलत क े बीच का चुनाव नहीं है; वह इच्छाओं, पिरिस्थितयां, कमज़ोिरयां और त् याग क े बीच िनरंतर चलने वाला संघषर् भी है। समाज अक्सर लोगां को उनक े अतीत से पहचानता है, जबिक प्र े म उन्हं उनक े वतर्मान से स् वीकार करता है। लेिकन क् या प्र े म हमेशा पयार्प्त होता है? क् या िकसी का अतीत सचमुच पीछे छूट जाता है, या वह िकसी छाया की तरह जीवन भर साथ चलता है? "उसका आिख़री प्र े म" ऐेसे ही प्र श्न ां क े उत्तर खोजने का प्र यास है। यह ऐक ऐेसे पुरुष की कहानी है िजसने समाज की परवाह िकऐ िबना ऐक वेश्यालय मं रहने वाली स् त्र ी से प्र े म िकया। उसने उसक े अतीत को नहीं, उसक े भीतर िछपे इंसान को देखा। उसने उसे सम्मान िदया, अपना नाम िदया, अपना घर िदया और ऐक नया जीवन िदया। समय बीता, उनक े पिरवार मं दो बच्चां की िकलकािरयाँ गूँजीं और ऐेसा लगा मानो जीवन ने अपने सभी घाव भर िदऐ हां। िकन्तु मनुष्य का हृ दय कभी- कभी उन रास्तां पर भी चल पड़ता है जहाँ तक र् , नैितकता और वचन साथ छोड़ देते हैं। प्र े म, जो कभी जीवन का ओधार था, धीरे- धीरे िवश्वास की परीक्षा बनने लगा। ऐक नऐ ओकषर्ण ने ऐक घर की नींव िहला दी। संदेह, अिवश्वास, झगड़े, अपराधबोध और टूटते िरश्तां ने उन सभी को घेर िलया, जो कभी ऐक- दूसर े की दु िनया थे। यह उपन्यास िकसी ऐक व्य िक्त को दोषी ठहराने का प्र यास नहीं करता। यह उन भावनाओं को समझने की कोिशश करता है िजनमं प्र े म और वासना, िनष्ठा और ओकषर्ण, क्ष मा और प्र ितशोध, सम्मान और अपमान — सभी ऐक साथ उपिस्थत रहते हैं। यहाँ कोइर् पूणर् नायक नहीं है, कोइर् पूणर् खलनायक भी नहीं; यहाँ क ेवल ऐेसे इंसान हैं जो अपनी इच्छाओं, भूलां और िनणर्यां का मूल्य चुकाते हैं। यह कहानी उस पीड़ा की भी है जो क ेवल धोखा खाने वाले की नहीं होती, बिल्क उस व्य िक्त की भी होती है िजसने िवश्वास तोड़ा। यह उस स् त्र ी की भी कहानी है जो अपने अतीत से भागना चाहती थी, उस पड़ोसी की भी िजसने ऐक िनिषद्ध प्र े म को स् वीकार िकया, और उन बच्चां की भी, िजन्हं बड़ां क े िनणर्यां की कीमत चुकानी पड़ी। इस उपन्यास का सबसे महत्वपूणर् प्र श्न यह नहीं है िक प्र े म िकससे हु ओ, बिल्क यह है िक प्र े म के बाद बचा क् या? क् या क्ष मा िवश्वासघात से बड़ी हो सकती है? क् या मृत्यु उन भावनाओं को समाप्त कर देती है िजन्हं जीवन िनयंित्रत नहीं कर पाया? और क् या सच्चा प्र े म कभी- कभी अपने सबसे गहरे ददर् क े बावजूद दू सर े की अंितम इच्छा का सम्मान करने का साहस रखता है? "उसका आिख़री प्र े म" प्र े म की िवजय की नहीं, बिल्क प्र े म की परीक्षा की कहानी है। यह उन िरश्तां का दस्तावेज़ है जो समय, समाज, ओकषर्ण और मृत्यु की कठोर परीक्षाओं से गुजरते हैं। इसक े प्र त् येक अध्याय मं मानवीय मन की जिटलताओं, सामािजक पूवार्ग्रहां और भावनात्मक संघषार्ं की परतं खुलती हैं। यिद इस कहानी को पढ़ते समय ओप िकसी पात्र से सहमत हां, तो अगले ही क्ष ण संभव है िक ओप उसी पात्र से असहमत भी हो जाऐँ। यही इस कथा का उद्द े श् य है — िनणर्य सुनाना नहीं, बिल्क मनुष्य को उसकी सम्पूणर् जिटलता मं समझना। ओशा है िक यह उपन्यास पाठकां को क े वल ऐक कहानी नहीं, बिल्क प्र े म, िवश्वास, क्ष मा और मानवीय दु बर्लताओं पर गहन िचंतन का अवसर प्र दान करेगा। — Rupesh Ranjan लेखक के बारे में Rupesh Ranjan रू पेश रंजन एक स् वतंत्र लेखक, शोधकतार् और सामािजक िवषयां क े गंभीर अध्येता हैं। उनकी लेखन- यात्रा मानवीय भावनाओं, सामािजक यथाथर्, इितहास, राजनीित, दशर्न और समकालीन जीवन की जिटलताओं को समझने और अिभव्यक्त करने क े प्र यास से प्र े िरत है। उनकी रचनाओं मं मनुष्य क े भीतर चलने वाले संघषर्, प्र े म और िवश्वास क े द्व ं द्व , सामािजक पूवार्ग्रह, नैितक प्र श्न तथा बदलते मानवीय संबंधां की गहरी पड़ताल देखने को िमलती है। वे मानते हैं िक सािहत्य क ेवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बिल्क समाज और मानव- मन क े दपर्ण क े रू प मं भी कायर् करता है। "उसका आिख़री प्र े म" उनक े उन प्र यासां मं से एक है, िजसमं प्र े म, िवश्वास, िवश्वासघात, अपराधबोध, क्ष मा और मानवीय दु बर्लताओं को संवेदनशीलता और यथाथर् क े साथ प्र स् तुत िकया गया है। यह उपन्यास िकसी व्य िक्त या वगर् का िनणर्य नहीं करता, बिल्क पाठकां को मानवीय संबंधां की जिटलताओं पर िवचार करने क े िलए ओमंित्रत करता है। लेखन क े अितिरक्त, रू पेश रंजन इितहास, राजनीित, भारतीय समाज, िशक्षा, दशर्न तथा समसामियक िवषयां पर अध्ययन और लेखन मं रु िच रखते हैं। उनकी दृ िष्ट मं हर मनुष्य की कहानी अपने भीतर एक उपन्यास िछपाए रहती है, और सािहत्य का उद्द े श् य उन अनकही कहािनयां को ओवाज़ देना है। उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, सामािजक चेतना और िवचारशीलता क े समन्वय का प्र यास हैं। वे एेसे सािहत्य क े पक्षधर हैं जो पाठकां को क ेवल कथा न दे, बिल्क ओत्मिचंतन का अवसर भी प्र दान करे। लेखक: Rupesh Ranjan संपकर् ईर्मेल: rupesh30091988@gmail.com पुस्तक के बारे में क् या प्र े म िकसी व्य िक्त क े अतीत से बड़ा हो सकता है? क् या सम्मान और अपनापन िकसी टूटे हु ए जीवन को सचमुच नया जन्म दे सकते हैं? और यिद िवश्वास एक बार टूट जाए, तो क् या प्र े म िफर भी जीिवत रह सकता है? "उसका आिख़री प्र े म" एक गहन सामािजक- यथाथर्वादी, मनोवैज्ञािनक और भावनात्मक उपन्यास है, जो प्र े म, िवश्वास, िवश्वासघात, अपराधबोध, क्ष मा और मानवीय कमजोिरयां की जिटल परतां को संवेदनशीलता क े साथ उद्घािटत करता है। कहानी एक एेसे युवक की है जो समाज की उपेक्षा और ितरस्कार की परवाह िकए िबना एक वेश्यालय मं रहने वाली युवती से प्र े म करता है। वह उसे क ेवल उसक े अतीत से नहीं, बिल्क उसक े व्य िक्तत्व और मानवीय गिरमा से पहचानता है। िववाह क े बाद दोनां एक नया जीवन शुरू करते हैं। समय क े साथ उनका घर बसता है, दो बच्चां का जन्म होता है, और एेसा लगता है िक अतीत की सारी पीड़ाए ँ पीछे छूट गईर् हैं। लेिकन जीवन हमेशा सीधी रेखा मं नहीं चलता। एक पड़ोसी क े आगमन क े साथ िरश्तां मं अनकहे बदलाव शुरू होते हैं। संदेह, आकषर्ण, मौन, टूटता िवश्वास और सामािजक दबाव धीरे- धीरे दो पिरवारां की दु िनया को बदल देते हैं। जब सत्य सामने आता है, तब क ेवल एक िववाह ही नहीं, बिल्क कईर् जीवन भीतर से िबखर जाते हैं। िफर एक िदन मृत्यु दस्तक देती है। क ैंसर से जूझते उस व्य िक्त की अंितम साँसां क े बीच एक एेसी ईच्छा जन्म लेती है, जो प्र े म, पीड़ा और क्ष मा की सभी सीमाआं को चुनौती देती है। एक पित अपनी पत्नी को उसक े अंितम िमलन तक स् वयं लेकर जाता है। उस मौन मुलाक़ात मं कोईर् िवजय नहीं होती, कोईर् पराजय नहीं होती — िसफ़ र् मनुष्य होने की गहरी और कभी- कभी असहनीय सच्चाई र् सामने आती है। यह उपन्यास िकसी पात्र को पूणर्तः िनदार्ष या दोषी घोिषत नहीं करता। यह पाठक को मानवीय संबंधां की उन जिटलताआं से पिरिचत कराता है, जहाँ प्र े म और आकषर्ण, िनष्ठा और भूल, क्ष मा और अपराधबोध एक साथ उपिस्थत रहते हैं। "उसका आिख़री प्र े म" क े वल एक प्र े म- कथा नहीं, बिल्क उन भावनात्मक संघषार्ं की कथा है िजनसे गुजरते हु ए मनुष्य स् वयं को, अपने िरश्तां को और प्र े म क े वास्तिवक अथर् को नए िसरे से समझता है। यिद आप एेसे सािहत्य की तलाश मं हैं जो क े वल कहानी न सुनाए, बिल्क मन को झकझोर दे और लंबे समय तक िवचार करने क े िलए िववश करे, तो यह उपन्यास आपक े िलए है। उपन्यास का शीषर्क "उसका आिख़री प्र े म" एक प्र े म, जो समाज से जीता... लेिकन िवश्वास से हार गया। लेखक: RUPESH RANJAN अनुक्रमिणका (34 अध्याय) भाग– 1 : अँधेरी गिलयां मं जन्मा प्र े म (अध्याय 1– 8) अध्याय 1. वह रात िजसने मेरी िज़ंदगी बदल दी अध्याय 2. कोठे की सीिढ़यां पर पहली मुलाक़ात अध्याय 3. उसकी मुस्कान क े पीछे िछपा हु आ नरक अध्याय 4. एक ग्र ाहक नहीं, एक इंसान अध्याय 5. उसका अतीत — िबक चुकी बचपन की कहानी अध्याय 6. धीरे- धीरे जन्म लेता प्र े म अध्याय 7. समाज क े िवरुद्ध िलया गया िनणर्य अध्याय 8. कोठे से िववाह- मंडप तक भाग– 2 : प्र े म, पिरवार और नया जीवन (अध्याय 9– 16) अध्याय 9. नइर् दु ल् हन का पहला कदम अध्याय 10. मोहल्ले की नफ़रत अध्याय 11. अपना घर बनाने की िजद अध्याय 12. एक माँ का जन्म अध्याय 13. पहले बच्चे की िकलकारी अध्याय 14. दू सर े बच्चे का आगमन अध्याय 15. बीते हु ए अतीत की परछाइयाँ अध्याय 16. एक सामान्य पिरवार बनने की कोिशश भाग– 3 : दरारं (अध्याय 17– 24) अध्याय 17. पड़ोसी का हमारे जीवन मं आना अध्याय 18. छोटी- छोटी मुलाक़ातं अध्याय 19. मोहल्ले की कानाफ ू सी अध्याय 20. मैंने िकसी की बात पर िवश्वास नहीं िकया अध्याय 21. बदलती हु इ र् आँखं अध्याय 22. वह िदन जब सच सामने आया अध्याय 23. टूटता हु आ िवश्वास अध्याय 24. दो पिरवारां की िबखरती दु िनया भाग– 4 : प्र े म, अपराधबोध और मृत्यु (अध्याय 25– 30) अध्याय 25. पड़ोसी की पत्नी का मौन अध्याय 26. हर िदन एक नया झगड़ा अध्याय 27. बच्चां की टूटती हु इ र् दु िनया अध्याय 28. क ैंसर की िरपोटर् अध्याय 29. मृत्यु क े सामने खड़ा प्र े म अध्याय 30. एक अधूरी मोहब्बत का अंत भाग– 5 : आिख़री मुलाक़ात (अध्याय 31– 34) अध्याय 31. "क्या मैं उसे आिख़री बार देख सकती हू ँ ?" अध्याय 32. मैं उसे उसक े प्र े मी क े पास ले गया अध्याय 33. मृत्युशैया पर तीन लोगां का मौन अध्याय 34. िजसे मैंने सबसे अिधक प्र े म िकया उपसंहार: प्र े म क ेवल पाने का नाम नहीं। कभी- कभी प्र े म का सबसे किठन रू प वह होता है, जब टूटे हु ए हृ दय क े साथ भी कोइर् दू सर े क े अंितम क्ष णां का सम्मान करता है। यह कहानी प्र े म, िवश्वास, क्ष मा और मानवीय कमजोिरयां की एेसी यात्रा है, जहाँ कोइर् पूणर्तः नायक या खलनायक नहीं — िसफ़ र् इंसान हैं। अध्याय 1 वह रात िजसने मेरी िज़ंदगी बदल दी उस रात शहर पर बािरश ऐेसे बरस रही थी, मानो आकाश वषार्ं से दबाऐ हु ऐ अपने दु ःख को ऐक साथ धरती पर उड़ेल देना चाहता हो। सड़कां पर पसरा अँधेरा िबजली की चमक से क्ष ण- भर क े िलऐ उजाला बनता और िफर पहले से भी अिधक गहरा हो जाता। हवा मं भीगी िमट्टी की गंध थी, लेिकन शहर क े पुराने िहस्से मं पहु ँ चते- पहु ँ चते वह गंध सस्ती शराब, िसगरेट क े धुऐँ और टूटे हु ऐ सपनां की गंध मं बदल गई;। मैं वहाँ जाना नहीं चाहता था। कम- से- कम अपने मन से तो िबल्क ु ल नहीं। ऑिफस की ऐक पाटीर् देर रात तक चली थी। क ुछ सहकमीर् िज़द करक े मुझे शहर क े उस बदनाम ईलाक े की ओर ले आऐ, जहाँ सभ्य लोग िदन क े उजाले मं भी अपना चेहरा िछपाकर गुजरते थे। उनक े िलऐ वह क ेवल मनोरंजन की जगह थी। मेरे िलऐ वह ऐक ऐेसा संसार था िजसक े बारे मं मैंने क ेवल कहािनयाँ सुनी थीं। संकरी गिलयां मं लाल और पीली रोशिनयाँ िटमिटमा रही थीं। क ुछ िखड़िकयाँ आधी खुली थीं, िजनसे हँसी की आवाज़ं बाहर आतीं और अगले ही पल िकसी अनकहे दद; मं बदल जातीं। कहीं ढोलक की थाप थी, कहीं पुराने िफ़ल्मी गीत, और कहीं ऐेसा मौन जो िकसी भी शोर से अिधक भयावह था। मेरे िमत्र आगे बढ़ गऐ। मैं पीछे रह गया। न जाने क् यां मेरे कदम भारी हो गऐ थे। उसी समय मेरी नज़र ऐक पुराने मकान की दू सरी मंिज़ल पर पड़ी। लकड़ी की जज;र बालकनी मं ऐक युवती खड़ी थी। उसक े चेहरे पर हल्की रोशनी पड़ रही थी। उसने कोई; बनावटी मुस्कान नहीं ओढ़ रखी थी। उसकी आँखं नीचे सड़क की ओर नहीं, कहीं बहुत दू र देख रही थीं — जैसे वह उस दु िनया को खोज रही हो, जहाँ से उसे कभी छीन िलया गया था। उसकी आँखां मं ऐक अजीब- सी शांित थी, और उसी शांित क े भीतर अथाह थकान। मैं क ुछ क्ष ण उसे देखता रह गया। तभी पीछे से ऐक आवाज़ आई; — “साहब, ऊपर आईऐ... अक े ले नहीं लौटंगे।” मैं चाैंक गया। मेरे साथी हँस रहे थे। िकसी ने मेरा हाथ पकड़कर सीिढ़यां की ओर बढ़ा िदया। मैं मना करता रहा, लेिकन उनकी िज़द क े आगे हार गया। लकड़ी की पुरानी सीिढ़याँ हर कदम पर चरमराती थीं। दीवारां का रंग उतर चुका था। ऊपर पहु ँ चकर ऐक बड़ा कमरा िदखाई; िदया, जहाँ तेज़ संगीत बज रहा था। कई; लोग बैठे थे। क ुछ हँस रहे थे, क ुछ क ेवल हँसने का अिभनय कर रहे थे। मैं उस भीड़ मं अपने आपको िबल्क ु ल अजनबी महसूस कर रहा था। तभी वही युवती धीरे- धीरे कमरे मं आई;। उसने हल्क े रंग की साड़ी पहन रखी थी। चेहरे पर साधारण- सा श्र ृ ं गार था, लेिकन उसकी आँखां की उदासी िकसी भी साज- सज्जा से नहीं िछप सकती थी। वह मेरे सामने आकर िठठकी। “पहली बार आऐ हैं?” उसका स् वर धीमा था। मैंने िसर िहलाया। “जी... शायद आिख़री बार भी।” मेरे उत्तर पर उसक े हांठां पर ऐक फीकी मुस्कान आई;। “यहाँ आने वाले लगभग सभी लोग यही कहते हैं।” मैं क ुछ नहीं बोला। क ुछ देर तक दोनां क े बीच मौन पसरा रहा। िफर उसने पानी का िगलास मेरी ओर बढ़ाया। “घबराईऐ मत। कभी- कभी क े वल बात करना भी काफी होता है।” उस ऐक वाक्य ने मुझे भीतर तक छू िलया। मैंने पहली बार महसूस िकया िक मेरे सामने खड़ी स् त्र ी क े वल ऐक चेहरा नहीं, बिल्क ऐक पूरा जीवन है — िजसक े अपने सपने रहे हांगे, अपना बचपन रहा होगा, अपने िरश्ते रहे हांगे। मैंने पूछा, “तुम्हारा नाम?” वह क ुछ क्ष ण चुप रही। िफर बोली — “यहाँ लोग मुझे नैना कहते हैं। मेरा असली नाम... अब शायद िकसी को याद नहीं।” उसकी आवाज़ मं िशकायत नहीं थी। क ेवल स् वीकार था। कमरे क े बाहर बािरश अब भी लगातार हो रही थी। मैं िखड़की क े पास जाकर खड़ा हो गया। नीचे सड़क पर पानी बह रहा था। मुझे लगा, जैसे शहर अपने पाप धोने की कोिशश कर रहा हो, लेिकन क ुछ दाग़ ऐेसे होते हैं िजन्हं क ेवल बािरश नहीं िमटा सकती। उस रात मैंने उससे उसक े अतीत क े बारे मं क ुछ नहीं पूछा। उसने भी मेरे बारे मं क ुछ नहीं जानना चाहा। िफर भी, उन क ुछ िमनटां की बातचीत मं ऐक ऐेसा मौन िवश्वास जन्म ले चुका था, िजसे हम दोनां उस समय समझ नहीं पाऐ। जब मैं लौटने लगा तो उसने क ेवल ईतना कहा — “अगर कभी िफर आओ... तो िकसी सौदे क े िलऐ मत आना।” मैंने उसकी ओर देखा। उसकी आँखां मं पहली बार उम्मीद की हल्की- सी चमक िदखाई; दी। मैंने िबना क ु छ कहे िसर िहला िदया। मुझे तब नहीं पता था िक यह छोटी- सी मुलाक़ात मेरी पूरी िज़ंदगी की िदशा बदल देगी। मैं उस रात उस गली से बाहर तो िनकल आया, लेिकन सच यह था िक मेरा ऐक िहस्सा वहीं, उस पुरानी बालकनी और उन उदास आँखां क े पास रह गया था। बािरश थम चुकी थी। लेिकन मेरे भीतर ऐक ऐेसी कहानी शुरू हो चुकी थी, िजसका अंत मुझे वषार्ं बाद ऐक मृत्युशैया क े सामने जाकर समझ मं आने वाला था। अध्याय 2 कोठे की सीिढ़यां पर पहली मुलाक़ात उस रात क े बाद कई िदन तक मैं अपने भीतर चल रहे शोर को शांत नहीं कर पाया। ऑिफस की फाईलें सामने खुली रहतीं, लेिकन आँखाें क े सामने वही पुरानी बालकनी आ जाती। क ंप् यूटर की स् क्र ीन पर शब्द बदलते रहते, पर मन में क ेवल एक चेहरा िस्थर था — वह चेहरा, िजसकी आँखाें में एक अजीब- सी उदासी थी। वह उदासी अिभनय नहीं थी; वह वषार्ं की चुप्पी का बोझ थी। मैं स् वयं से बार- बार पूछता — आिख़र उस लड़की में एेसा क् या था? वह असाधारण रू प से सुंदर थी, यह बात सच थी। पर क ेवल सुंदरता िकसी को ईस तरह बेचैन नहीं करती। उसकी आँखाें में जो थकान थी, िजसने मुझे अपनी ओर खींचा था, वह शायद िकसी टूटे हु ए जीवन का ईितहास थी। लगभग एक सप्ताह तक मैंने उस ओर जाने का िवचार दबाए रखा। िफर एक शाम, िबना िकसी िनिश्चत िनण य क े, मेरे कदम उसी पुराने मोहल्ले की ओर मुड़ गए। सूरज ढल चुका था। गिलयाें में पीली रोशनी फ ै लने लगी थी। दु कानाें पर बैठे लोग अपनी- अपनी दु िनया में व्य स् त थे। क ुछ चेहरे उत्सुकता से आने- जाने वालाें को देखते, क ुछ एेसे थे िजन्हें मानो िकसी से कोई मतलब ही न हो। मैं उसी पुराने मकान क े सामने जाकर रु क गया। आज मेरे साथ कोई िमत्र नहीं था। कोई िज़द नहीं थी। कोई मजबूरी नहीं थी। मैं अपने िनण य से वहाँ आया था। लकड़ी की सीिढ़याें पर पहला कदम रखते ही मेरे भीतर एक अजीब- सा संकोच भर गया। हर सीढ़ी मानो पूछ रही थी — क् या तुम सचमुच यहाँ आना चाहते हो? ऊपर पहु ँ चकर मैंने देखा िक वही बड़ा कमरा आज भी रोशनी और शोर से भरा हु आ था। एक अधेड़ उम्र की मिहला ने मुझे देखते ही मुस्कराकर कहा, "आईए साहब... िकससे िमलना है?" मैं क ुछ क्ष ण चुप रहा। िफर धीमे स् वर में बोला, "उस लड़की से... जो िपछले हफ़्ते िखड़की क े पास खड़ी थी।" मिहला ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी आँखाें में वषार्ं का अनुभव था। वह हल्का- सा मुस्कराई । "नैना?" मैंने पहली बार उसका नाम िकसी और क े मुँह से सुना। "जी..." मिहला ने भीतर िकसी को आवाज़ दी। क ुछ ही क्ष ण बाद वह सामने आ गई । आज उसने हल्क े नीले रंग का सूती सलवार- क ुता पहन रखा था। चेहरा पहले की तरह शांत था, लेिकन मुझे देखते ही उसकी आँखाें में आश्चय उतर आया। "आप?" मैंने मुस्कराकर कहा, "मैंने कहा था... अगर आया, तो िकसी सौदे क े िलए नहीं आऊ ँ गा।" वह क ुछ क्ष ण मुझे देखती रही। िफर पहली बार उसक े चेहरे पर सच्ची मुस्कान उभरी। "लोग यहाँ वादे करक े भूल जाते हैं।" "मैं भूल नहीं पाया।" हम दोनाें बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की क ु िसर्याें पर बैठ गए। नीचे सड़क पर लोगाें की आवाजाही जारी थी। क ुछ देर तक हम दोनाें चुप रहे। िफर मैंने पूछा, "क्या तुम यहाँ हमेशा से हो?" उसने मेरी ओर देखा, िफर नज़र ें झुका लीं। "क ुछ सवालाें क े जवाब जल्दी नहीं िदए जाते।"